सपने में बस्ती देखा


सपनों में बस्ती देखा
1. सपने में ही सही लेकिन आज मैं अपनी बस्ती को देखा,
तिनके से बनी डूबती हुई कश्ती को देखा।
जिन गलियों में मैं खड़ा हूँ उन गलियों से,
उस बस्ती में जाते हुए एक हस्ती को देखा।
2. सारे आरज़ू बंद डिब्बे में पड़े रह जाते हैं,
खुशियों के दामन भी सिमट के रह जाते हैं।
जिस नाम पर हम इतना लुभाते हैं,
वह नाम भी एक दिन ख़ाक में मिला दिए जाते हैं।
3. जिस गली से मुझे गुज़रना है उसे देख रहा हूँ,
अनोखी तेरी काया के साथ यह काया भी देख रहा हूँ।
हल मेरा भी होना है उन कलियों के जैसा,
इसलिए अपने दिल के आईने में तुझे देख रहा हूँ।
4. पैमाने देखकर मुझे भी डर लगता है इस कदर,
अहले उल्फ़त के पहले फ़िज़ा मुरझाये जिधर।
अब तो बस तुझे हर घड़ी देखने की चाहत है,
तू रहे या न रहे बस तेरी चाहत रहे मेरे जिगर।
5. तू उस बस्ती के बीच में इस कश्ती के बीच में,
तू जाने जिगर में तू ही हर नज़र में।
तेरा पता तू खुद जाने मुझे क्या करना,
हाँ डरना है तो खुद से तेरे बिना कैसे सँवरना।
6. करबद्ध हो जाऊँ आबद्ध हो जाऊँ,
खुशी या ग़म के साथ समबद्ध हो जाऊँ।
किनारे में खड़ा हूँ इस पार तेरी रहनुमाई के सहारे,
ऐसी लगन लग जाये मुझे बस अपार हो जाऊँ।

काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • कश्ती = नाव / नौका
  • हस्ती = महान व्यक्ति / प्रतिष्ठित चरित्र
  • आरज़ू = इच्छा / कामना / अभिलाषा
  • ख़ाक = मिट्टी / धूल
  • काया = शरीर / तन
  • अहले उल्फ़त = प्रेम करने वाले / सच्चे प्रेमी
  • फ़िज़ा = वातावरण / माहौल / हवा
  • करबद्ध = हाथ जोड़ना / विनम्र होना
  • आबद्ध = बंधा हुआ / जुड़ा हुआ
  • रहनुमाई = मार्गदर्शन / रास्ता दिखाना / छत्रछाया

📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत गंभीर, मर्मस्पर्शी और सूफियाना गहराई से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की नश्वरता, इच्छाओं के अधूरेपन, सांसारिक कूटनीति से दूर सच्चे प्रेम के समर्पण और विधाता के मार्गदर्शन को बड़े ही मार्मिक शब्दों में उकेरा है। कवि कहते हैं कि मैंने रात की नींद में, अपने सपनों के संसार में अपनी उस पुरानी और सादी 'बस्ती' को देखा है, जहाँ मैंने कमज़ोर तिनकों से बनी एक लाचार नाव (कश्ती) को बीच समंदर में डूबते हुए देखा। यह डूबती नाव इंसानी ज़िन्दगी के संघर्षों का प्रतीक है। कवि कहते हैं कि जिन तंग गलियों में मैं आज अकेला खड़ा हूँ, उन्हीं रास्तों से गुज़रकर मैंने एक बहुत बड़ी और नामचीन हस्ती (महान पुरुष) को उस साधारण बस्ती की ओर जाते देखा है, जो यह सिखाता है कि महानता सादगी में ही वास करती है। इस संसार का यह कड़वा नियम है कि इंसान के मन की सारी बड़ी-बड़ी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ (आरज़ू) वक़्त बदलने पर बंद डिब्बे में ही धरी की धरी रह जाती हैं और खुशियों का आँचल भी सिमट कर रह जाता है। जिस झूठी शोहरत, पैसे और नाम के पीछे इंसान जीवनभर भागता और लुभाता रहता है, मौत का क्रूर पहिया आते ही वह सारा घमंड और नाम एक दिन मिट्टी (ख़ाक) में मिला दिया जाता है।
कवि आत्मबोध के मार्ग पर बढ़ते हुए कहते हैं कि जीवन के जिस कठिन रास्ते से मुझे गुज़रना है, मैं आज जागती आँखों से उस डगर को देख रहा हूँ। ईश्वर की बनाई इस अनोखी और सुंदर सृष्टि (काया) के साथ मैं अपने इस क्षणभंगुर शरीर की वास्तविकता को भी परख रहा हूँ। जैसे बाग़ की सुंदर कलियाँ खिलने के बाद एक दिन मुरझाकर मिट्टी में गिर जाती हैं, ठीक वैसा ही अंत एक दिन मेरा भी होना तय है। इसी सत्य को स्वीकार करके मैं अपने दिल के साफ़ आईने में उस परमेश्वर की सत्ता को निहार रहा हूँ। संसार के भौतिक सुखों और कूटनीतिक चालों के बड़े-बड़े पैमाने देखकर आज मेरा मन इस कदर डर जाता है कि जहाँ प्रेम करने वाले लोगों (अहले उल्फ़त) के आने से पहले ही नफ़रत के कारण वहाँ का वातावरण (फ़िज़ा) मुरझा जाता है। अब इस मतलबी जहान से मेरा मोह पूरी तरह भंग हो चुका है और मेरे अंतर्मन में हर घड़ी केवल उस ईश्वर के पावन दर्शन की चाहत बची है। यह संसार रहे या न रहे, परिस्थितियाँ बदले या न बदले, लेकिन उस परमात्मा के प्रति जो निश्छल भक्ति की चाहत है, वह मेरे हृदय (जिगर) में हमेशा अमर रहनी चाहिए।
कवि पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित होते हुए कहते हैं कि हे विधाता, तू ही इस समूची बस्ती के केंद्र में है और मझधार में फँसी मेरी इस जीवन रूपी कश्ती को पार लगाने वाला भी केवल तू ही है। तू मेरे अंतःकरण की गहराई में भी बसा है और मेरी हर एक नज़र में भी केवल तेरी ही छवि दिखाई देती है। तेरा वास्तविक पता और भेद क्या है, यह केवल तू ही जानता है, मुझे संसार के इन पाखंडी रास्तों से क्या लेना-देना। मनुष्य को इस दुनिया के कूटनीतिक बंधनों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है; उसे डरना है तो केवल खुद के भीतर के विकारों और पापों से डरना चाहिए, क्योंकि ईश्वर की कृपा के बिना इंसान का यह आंतरिक जीवन कभी सुंदर रूप से सँवर नहीं सकता। कवि अंत में हाथ जोड़कर (करबद्ध) होकर प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु, मैं पूरी तरह से तेरी भक्ति के पावन बंधन में बंधकर (आबद्ध) हो जाऊँ और जीवन में मिलने वाली हर खुशी या ग़म को एक समान भाव से स्वीकार करके पूरी तरह समबद्ध हो जाऊँ। मैं इस संसार के दुखों के किनारे पर पूरी तरह अकेला खड़ा हूँ और मेरी यह नैया केवल तेरी दया व सच्चे मार्गदर्शन (रहनुमाई) के सहारे ही टिकी हुई है। मेरे भीतर ईश्वर के प्रति एक ऐसी अनूठी और सच्ची लगन लग जाए कि मैं इस भवसागर से पार होकर मोक्ष की असीम ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकूँ। इस महान रचना का मुख्य संदेश यही है कि संसार के झूठे नाम, पैसे और अहंकार का त्याग करके, जीवन की नश्वरता को समझना चाहिए। विधाता के पावन मार्गदर्शन को अपनाकर, मन को निर्मल रखते हुए सच्चे प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलना ही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ और अंतिम सत्य है 

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