1.
जब मैं छोटा था तो कितना अच्छा था,
दादी की लोरी, माँ की टकोरी,
दीदी का प्यार और भाभी का पकवान कितना अच्छा था।
जब मैं छोटा था तो कितना अच्छा था,
दादी की लोरी, माँ की टकोरी,
दीदी का प्यार और भाभी का पकवान कितना अच्छा था।
2.
आंटी की डांट, पापा की मार,
दोस्तों की मस्ती, मुकेश की मटरगश्ती,
दादा जी का ज्ञान और नया अंजाम कितना अच्छा था।
आंटी की डांट, पापा की मार,
दोस्तों की मस्ती, मुकेश की मटरगश्ती,
दादा जी का ज्ञान और नया अंजाम कितना अच्छा था।
3.
मैडम की डांट, स्कूल का मैदान,
छोटों का लड़कपन, बड़ों का बड़प्पन,
और मैदान की प्लेइंग टू नॉटी बातें कितना अच्छा था।
मैडम की डांट, स्कूल का मैदान,
छोटों का लड़कपन, बड़ों का बड़प्पन,
और मैदान की प्लेइंग टू नॉटी बातें कितना अच्छा था।
🎨 काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- टकोरी = माँ के हाथों से मिलने वाला दुलार / हल्का सा थपथपाना
- मटरगश्ती = मौज-मस्ती करना / दोस्तों के साथ घूमना
- अंजाम = परिणाम / जीवन का नया अनुभव
- लड़कपन = बचपन का भोलापन / नासमझी
- बड़प्पन = बड़ों की महानता / उदारता
- प्लेइंग टू नॉटी = खेलते समय की जाने वाली सादी और प्यारी शैतानियाँ
- प्रपंच = दिखावा / सांसारिक चालाकी
- भ्रमजाल = मायाजाल / कलयुगी छलावा
- मल्हार = परम आनंद का संगीत / सावन का राग
- अनुराग = गहरा प्रेम / आत्मीय स्नेह
- इस कविता का सरल भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस कविता के माध्यम से कवि ने बचपन के उन खूबसूरत, बेफ़िक्र और पावन दिनों को याद किया है, जो आज के इस मशीनी जीवन की चकाचौंध में कहीं पीछे छूट गए हैं। बचपन का वो दौर कितना अद्भुत था जब दादी माँ की प्यार भरी लोरी, माँ के हाथ की बनी स्वादिष्ट टकोरी, दीदी का निश्छल दुलार और भाभी के हाथों के पकवान ही जीवन की सबसे बड़ी खुशियाँ हुआ करती थीं। उस सादे समय में न तो कोई बनावटी प्रपंच था और न ही इंटरनेट का कोई भ्रमजाल था। आंटी की हल्की सी डांट, पापा की कड़क मार, दोस्तों के साथ मिलकर की गई वो अल्हड़ मस्ती और मुकेश की मटरगश्ती में जो सच्चा आनंद था, वह आज के इस कंक्रीट के जंगल में बड़े-बड़े महलों में भी मयस्सर नहीं होता। दादा जी से मिलने वाला अमूल्य ज्ञान और हर दिन एक नया अंजाम जीवन को उमंग से भर देता था। स्कूल में मैडम की वो प्यारी सी डांट, छोटों का लड़कपन, बड़ों का बड़प्पन और मैदान की मिट्टी में सने पैर—ये सब बातें दिल को एक असीम सुक़ून से भर देती हैं।
इस रचना से यह अंतिम सीख मिलती है कि मनुष्य आज भले ही कितना भी बड़ा हो जाए या कितना भी धन बटोर ले, लेकिन जो वास्तविक और पावन सुख बचपन के उस निश्छल लड़कपन में था, वह इस दुनिया के किसी भी बाज़ार में दोबारा खरीदा नहीं जा सकता।