बेमिशाल नेता जी


बेमिसाल नेता जी

1.
मौसम बदला, मिज़ाज बदला,
आई जब चुनावी बहार यहाँ।
फिर न दिखा वो चेहरा पावन,
सूना पड़ा रहा बाज़ार यहाँ।
2.
दावे बड़े थे, कसमें बड़ी थीं,
झूठे संकल्पों की कतार खड़ी थी।
कुर्सी का वो आलीशान सुख पाते ही,
जनता बेचारी रास्तों पर खड़ी थी।
3.
पल में भूल गए वो सारे वादे,
मग्न हुए वो अपने राजसी ठाठ में।
हम उम्मीदों के कोरे पन्नों को समेटे,
डूबे रह गए ज़िन्दगी के इस दलदल में।
4.
मंच पे चढ़ के नेता जी जब,
जनता को नया भाषण भी देंगे।
और सरकारी योजनाओं का,
सारा पैसा चुपके से खुद को ही देंगे।
5.
संकट के समय जो कहते थे,
हम दिन-रात जनता के साथ खड़े।
वो भूल गए अपने वादे,
कुर्सी मिलते ही अहंकार में डूबे पड़े।
6.
बड़ी रैलियों के उस मजमे में,
वो विकास का लंबा भाषण भी देंगे।
पर भीतर ही भीतर मिलकर वो,
तिजोरी का सारा पैसा खुद को ही देंगे।
7.
अब आम लोग डरते हैं मिलने से उनसे,
जाने क्या घमंड की कड़वी भाषा वो बोलेंगे।
छल-कपट का ऐसा चक्रव्यूह रचा कि,
डाले थे वोट हमने जिसके पावन नाम में।
8.
भाषण की बहती हुई मीठी सरिता में,
कह दिया था कितना कुछ इस सीधे गाँव में।
फिर भी नेता जी ने दानवीरता का स्वांग रचाकर,
मुзра का पुरस्कार उछाला था इस इनाम में।
9.
जब लोकतंत्र का यह महापर्व फिर आया है,
तो चमचों का एक नया सैलाब आया है।
नेता जी को मजबूरी में हम याद आये फिर,
इस धूल से भरे और प्यासे से गाँव में।
10.
पर सजग मतदाता भी अब समझदार है,
समझता है उनकी चाल इस राजनीतिक मैदान में।
अबकी बार यह पीड़ित और शोषित जनता अपना,
हक लिखकर दिखाएगी इस संपूर्ण जहान में।

📖 काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):

  • मिज़ाज = स्वभाव / मन की स्थिति / रुख बदलना
  • संकल्प = पक्का वादा / दृढ़ प्रतिज्ञा
  • मजमे = लोगों की भारी भीड़ / रैलियों का जमावड़ा
  • चक्रव्यूह = राजनीति की ऐसी चाल जिसमें भोली जनता फँस जाए
  • स्वांग रचाकर = झूठा नाटक करके / दिखावा करना
  • मुद्रा = धन / पैसा / सिक्के
  • महापर्व = बहुत बड़ा त्योहार (यहाँ चुनावी महापर्व)
  • सैलाब = बाढ़ / चमचों की उमड़ती हुई भारी भीड़
  • शोषित = जिसका हक मारा गया हो / सताया हुआ
  • सजग = जागा हुआ / पूरी तरह सावधान और सतर्क
  • जहान = संसार / दुनिया / पूरा 

शीर्षक "बेमिसाल नेता जी

📜 इस कविता का सरल भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस कविता के माध्यम से कवि ने 'बेमिसाल नेता जी' के उसी चुनावी मिज़ाज और उनके कड़वे पाखंड पर सीधा प्रहार किया है, जो हर पाँच साल में जनता के सामने देखने को मिलता है। जब चुनाव का मौसम आता है, तो ये नेता जी बड़ी-बड़ी रैलियों के भारी मजमे में विकास का लंबा-लंबा भाषण देते हैं, वादों की झड़ी लगाते हैं और दानवीरता का झूठा स्वांग रचते हैं। लेकिन कुर्सी मिलते ही उनका अहंकार इतना ऊँचा हो जाता है कि वे सीधे-साधे ग्रामीणों को पूरी तरह भूल जाते हैं और सरकारी योजनाओं का सारा असली माल व पैसा चुपके से अपनी तिजोरी में बंद कर लेते हैं। इस रचना का मुख्य संदेश यही है कि जब तक देश का प्रबुद्ध मतदाता इन नेता जी की कूटनीति की चालों को समझकर अपने वोट की सही चोट करना नहीं सीखेगा, तब तक शोषित जनता ऐसे ही रास्तों पर खड़ी रहेगी। नेता जी के इस प्रपंच को नकारकर अपने हक के लिए सीना तानकर खड़ा होना ही इस व्यवस्था का असली सुधार है 




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