चार लाइन जिन्दगी के
1.
चार लाइन जिंदगी के कुछ इस तरह लिख रहा हूँ,
वक्त की इस धूप में थोड़ा-थोड़ा तप रहा हूँ।
जो कल तक सिर्फ एक अनसुना सा ख्वाब था,
आज उसी ख्वाब को हकीकत में बदल रहा हूँ।
2.
बचपन की वो बेफ़िक्री न जाने कहाँ खो गई,
जिम्मेदारियों की चादर अब कंधों पर सो गई।
कागज़ के चंद टुकड़ों को कमाने की चाह में,
मासूम सी वो मुस्कान भी अब पराई हो गई।
3.
लोग मिलते हैं यहाँ बस ज़रूरत के हिसाब से,
चेहरे बदल जाते हैं यहाँ नकाब के पीछे नकाब से।
कोई नहीं पूछता कि तुम्हारे दिल का हाल क्या है,
सब तौलते हैं तुम्हें बस कामयाबी के पैमाने से।
4.
शिकवा करें भी तो भला किस शख्स से करें हम,
जब अपने ही दे जाते हैं आँखों में यहाँ नम।
इस झूठी नुमाइश के बाज़ार में अब तो गुरु,
खामोशी को ही अपना हमसफ़र बना चुके हैं हम।
5.
माना कि राहों में मुश्किलें और अँधेरा घना है,
मगर थक कर बैठ जाना भी तो यहाँ मना है।
तू हौसलों के पंख फैलाकर ज़रा उड़ तो सही,
यह पूरा आसमान सिर्फ तेरे ही लिए बना है।
6.
वक्त का ये पहिया कभी किसी के लिए रुकता नहीं,
सच्चा मुसाफ़िर हालातों के आगे कभी झुकता नहीं।
जो लड़ता है तूफ़ानों से सीना तान कर सदा,
उसका नाम इतिहास के पन्नों से कभी मिटता नहीं।
7.
पैसों की इस अंधी दौड़ में जो सुकून पीछे छूट गया,
अपनों से बात करने का वो हँसता सा सिलसिला टूट गया।
बड़े आलीशान मकान तो बना लिए इंसानों ने यहाँ,
मगर मिट्टी के उस घर का वो प्यारा सा आँगन रूठ गया।
8.
आईने के सामने जब भी खुद को अकेला पाते हैं,
बीते हुए कल के वो सुनहरे पल याद आते हैं।
जब रिश्तों में कोई चालाकी और दिखावा नहीं था,
वो सादे दिन ही दिल को आज भी बहुत रुलाते हैं।
9.
ये जीवन एक रंगमंच है जहाँ हर कोई अदाकार है,
कोई जीत रहा बाज़ी तो कोई यहाँ लाचार है।
पर घमंड किस बात का करे यह माटी का पुतला,
अंत में तो होना सिर्फ मिट्टी का ही संसार है।
10.
अब न कोई अधूरी आस है न दिल में कोई मलाल,
खुदा की रज़ा में ही ढूंढ लिया है हर सवाल।
जो मिला उसे प्रसाद समझकर गले से लगा लिया,
जो छूट गया उसे भूलकर संभल गया मेरा हाल।
11.
अब भी वक्त है ऐ राही ज़रा ठहर और विचार कर,
दूसरों की नज़रों में सही बनने की ज़िद को ढेर कर।
चार दिन की ये ज़िंदगी है खुलकर जी ले इसे तू,
नफ़रत के इस लंबे सफ़र को अब यहीं ख़त्म कर।
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- नुमाइश = दिखावा / प्रदर्शन
- हमसफ़र = साथ चलने वाला / साथी
- सच्चा मुसाफ़िर = सच्चा राही / अडिग पथिक
- सदा = हमेशा / हर पल
- सिलसिला = क्रम / ज़रिया
- अदाकार = कलाकार / अभिनय करने वाला
- लाचार = बेबस / मजबूर
- मलाल = पछतावा / अफ़सोस
- रज़ा = मर्जी / इच्छा
- प्रसाद = आशीर्वाद / कृपा
- पैमाने = नापने का तरीक़ा / मापदंड
इस अत्यंत मर्मस्पर्शी, ओजस्वी और दार्शनिक गहराई से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन के बदलते हुए मूल्यों, बचपन के खोने के दर्द, आज की भौतिकवादी अंधी दौड़, रिश्तों के खोखलेपन और विधाता की मर्ज़ी के आगे आत्म-समर्पण के परम सत्य को ११ सुंदर पैराग्राफों में बहुत ही सजीवता से उकेरा है। कविता की शुरुआत एक पक्के कर्मयोगी के संकल्प से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि मैं अपने जीवन के कड़वे अनुभवों को निचोड़कर अपनी ज़िन्दगी की कहानी लिख रहा हूँ। समय की इस कड़ी धूप और कठिन संघर्षों की भट्टी में मैं थोड़ा-थोड़ा तपने लगा हूँ ताकि मेरा व्यक्तित्व निखर सके। जो बातें कल तक केवल एक अनसुना और अनूठा सपना (ख्वाब) लगती थीं, आज मैं कड़े पुरुषार्थ के बल पर उसी कल्पना को धरातल पर लाकर हक़ीक़त में बदल रहा हूँ। परंतु इस सफलता के सफ़र में मनुष्य को बहुत कुछ खोना भी पड़ता है। कवि बचपन की यादों में भावुक होकर कहते हैं कि जीवन के इस मोड़ पर आकर बचपन की वह सादी बेफ़िक्री न जाने कहाँ गुम हो गई है और कंधों पर सांसारिक ज़िम्मेदारियों का एक भारी बोझ आकर टिक गया है। कागज़ के चंद टुकड़ों यानी इस धन-दौलत और पैसे को कमाने की अंधी चाहत में इंसान की वह मासूम और सच्ची मुस्कान भी आज पराई व ग़ायब हो चुकी है।