हे प्रभु
1. हे प्रभु! इस जीवन की नैया को अब तेरे ही सहारे छोड़ दिया,
जग की इस झूठी माया से मैंने अपना मुखड़ा मोड़ दिया।
अंधकार भरा था चारों तरफ, राह कोई सूझती न थी,
जब से थामा दामन तेरा, मन का हर बंधन तोड़ दिया।
जग की इस झूठी माया से मैंने अपना मुखड़ा मोड़ दिया।
अंधकार भरा था चारों तरफ, राह कोई सूझती न थी,
जब से थामा दामन तेरा, मन का हर बंधन तोड़ दिया।
2. मैं क्या लेकर आया जग में, और क्या लेकर जाऊँगा,
अहंकार की इस अंधी दौड़ में, केवल खुद को खोऊँगा।
माटी का पुतला हूँ भगवान, एक दिन माटी में मिलना है,
तेरी चौखट पर आकर ही, मैं असली सुकूँ पाऊँगा।
अहंकार की इस अंधी दौड़ में, केवल खुद को खोऊँगा।
माटी का पुतला हूँ भगवान, एक दिन माटी में मिलना है,
तेरी चौखट पर आकर ही, मैं असली सुकूँ पाऊँगा।
3. ऐ मालिक! बस तेरी रज़ा रहे, मन में तेरा ही वास रहे,
दुनिया छूटे तो छूट जाए, बस तेरा अटूट विश्वास रहे।
खुशी मिले या ग़म का दरिया, हर हाल में मैं मुस्कुराऊँ,
सांसों की इस वीणा पर, बस राम नाम का राग रहे।
दुनिया छूटे तो छूट जाए, बस तेरा अटूट विश्वास रहे।
खुशी मिले या ग़म का दरिया, हर हाल में मैं मुस्कुराऊँ,
सांसों की इस वीणा पर, बस राम नाम का राग रहे।
4. सोचा तुम्हारी इस अमानत को, तुम्हारी नज़रों के सामने रख दूँ,
हृदय के सूने मंदिर में, बस भक्ति का एक दीप जगा दूँ।
लौटना तो तय है एक दिन, इस आत्मा को तुम्हारे पास,
इस छोटी सी ज़िंदगी को, क्यों न तेरी सेवा में लगा दूँ।
हृदय के सूने मंदिर में, बस भक्ति का एक दीप जगा दूँ।
लौटना तो तय है एक दिन, इस आत्मा को तुम्हारे पास,
इस छोटी सी ज़िंदगी को, क्यों न तेरी सेवा में लगा दूँ।
5. लोग ढूंढते हैं तुमको मस्जिद में, कोई मंदिर जाता है,
कोई तीर्थ की राह पकड़कर, मन को व्यर्थ थकाता है।
पर जो साफ़ दिल से आँखें मूँदकर, तेरा ध्यान लगाता है,
वो अपने ही भीतर पल भर में, तुझको बैठा पाता है।
कोई तीर्थ की राह पकड़कर, मन को व्यर्थ थकाता है।
पर जो साफ़ दिल से आँखें मूँदकर, तेरा ध्यान लगाता है,
वो अपने ही भीतर पल भर में, तुझको बैठा पाता है।
6. खुली आँखों का ये संसार, एक सुंदर सा छलावा है,
यहाँ हर रिश्ते के पीछे छिपा, एक नया दिखावा है।
स्वार्थ की इस नगरी में कोई, अंत तक साथ निभाता नहीं,
सच्चा तो बस एक तेरा नाम, बाकी सब बुलावा है।
यहाँ हर रिश्ते के पीछे छिपा, एक नया दिखावा है।
स्वार्थ की इस नगरी में कोई, अंत तक साथ निभाता नहीं,
सच्चा तो बस एक तेरा नाम, बाकी सब बुलावा है।
7. होनी ही होकर रहती है, फिर ये पागल मन क्यों अकुलाए,
आपन करम-धरम राखुही, क्यों उलझन में जियरा घबराए।
तू ही रखवाला है सबका, तू ही सबका दाता है,
फिर क्यों इंसान व्यर्थ की चिंता में, अपनी रातें गँवाए।
आपन करम-धरम राखुही, क्यों उलझन में जियरा घबराए।
तू ही रखवाला है सबका, तू ही सबका दाता है,
फिर क्यों इंसान व्यर्थ की चिंता में, अपनी रातें गँवाए।
8. गैरों की इस महफ़िल से तो, कब के दूर हो गए हम,
दूसरों को खुश करने की होड़ में, बहुत सह चुके हैं ग़म।
अब तो बस खुद से खुद की, मुलाकात का अहसास है,
तेरी शरण में आकर प्रभु, सारे घाव हो गए कम।
दूसरों को खुश करने की होड़ में, बहुत सह चुके हैं ग़म।
अब तो बस खुद से खुद की, मुलाकात का अहसास है,
तेरी शरण में आकर प्रभु, सारे घाव हो गए कम।
9. जिस काया और वैभव पर, इंसान इतना इतराता है,
अंत समय में वह सब कुछ, यहीं धरा रह जाता है।
सिकंदर जैसे शाह भी आख़िर, खाली हाथ ही विदा हुए,
बस इंसान की अच्छी करनी ही, उसके साथ जाती है।
अंत समय में वह सब कुछ, यहीं धरा रह जाता है।
सिकंदर जैसे शाह भी आख़िर, खाली हाथ ही विदा हुए,
बस इंसान की अच्छी करनी ही, उसके साथ जाती है।
10. अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में,
जीत तुम्हारे हाथों में है, और हार तुम्हारे हाथों में।
जो मिला उसे प्रसाद समझकर, सिर माथे पर लगा लिया,
अब कोई शिकवा-गिला नहीं, बहा इन जज़्बातों में।
जीत तुम्हारे हाथों में है, और हार तुम्हारे हाथों में।
जो मिला उसे प्रसाद समझकर, सिर माथे पर लगा लिया,
अब कोई शिकवा-गिला नहीं, बहा इन जज़्बातों में।
11. जब तक ये सांसें जारी हैं, मुख पर बस तेरा ध्यान रहे,
मिट्टी का पुतला हूँ, मन में न कोई अभिमान रहे।
जी लूँ कुछ पल खुद के लिए और तेरी भक्ति के लिए,
हे प्रभु! मेरी इस रूह को, बस तेरा ही पैग़ाम रहे।
मिट्टी का पुतला हूँ, मन में न कोई अभिमान रहे।
जी लूँ कुछ पल खुद के लिए और तेरी भक्ति के लिए,
हे प्रभु! मेरी इस रूह को, बस तेरा ही पैग़ाम रहे।
📖 कविता में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- नेया = नाव / नैया
- माया = भ्रम / सांसारिक दिखावा
- अहंकार = घमंड / गुरूर
- चौखट = द्वार / प्रभु का दर
- रज़ा = मर्जी / इच्छा
- अमानत = धरोहर / सौंपी हुई वस्तु
- छलावा = धोखा / वहम
- होनी = भाग्य / तक़दीर / जो होना तय हो
- अकुलाए = व्याकुल होना / बेचैन होना
- जियरा = दिल / मन / हृदय
- वैभव = धन-दौलत / ऐश्वर्य
- प्रसाद = आशीर्वाद / कृपा
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत भव्य, दार्शनिक और अनन्य भक्ति रस से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की नश्वरता, सांसारिक कूटनीति के पाखंड, कर्मों की महत्ता और ईश्वर के चरणों में पूर्ण आत्म-समर्पण का एक परम पावन संदेश दिया है। कवि अपने आराध्य प्रभु को पुकारते हुए कहते हैं कि हे परमात्मा, मैंने अपनी इस जीवन रूपी नाव (नैया) का पूरा भार अब पूरी तरह से केवल और केवल तेरे ही भरोसे छोड़ दिया है। इस संसार के जितने भी झूठे दिखावे, स्वार्थ और मायाजाल (माया) हैं, उनसे मैंने अपना मुख मोड़ लिया है। जब तक मैं इस भौतिक संसार के चक्रव्यूह में उलझा हुआ था, तब तक चारों ओर अज्ञानता का घोर अंधकार था और मुझे शांति का कोई मार्ग सूझ नहीं रहा था; परंतु हे प्रभु, जब से मैंने पूरी श्रद्धा के साथ तेरा पावन दामन थामा है, तब से मेरे अंतर्मन के सारे सांसारिक और कूटनीतिक बंधन सदा के लिए टूट गए हैं। मनुष्य को यह वैचारिक सत्य स्वीकार करना ही होगा कि वह इस मृत्युलोक में खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही चला जाएगा। पैसे, नाम और पद की इस अंधी होड़ में भागकर मनुष्य केवल अपने आत्मिक सत्य को खो देता है। हमारा यह शरीर महज़ मिट्टी का एक पुतला है, जिसे एक न एक दिन इसी माटी में विलीन हो जाना है; इसलिए सच्चा सुकूँ और परम आनंद किसी राज-दरबार में नहीं, बल्कि विधाता की पावन चौखट (द्वार) पर आकर ही प्राप्त होता है।
इस अत्यंत भव्य, दार्शनिक और अनन्य भक्ति रस से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की नश्वरता, सांसारिक कूटनीति के पाखंड, कर्मों की महत्ता और ईश्वर के चरणों में पूर्ण आत्म-समर्पण का एक परम पावन संदेश दिया है। कवि अपने आराध्य प्रभु को पुकारते हुए कहते हैं कि हे परमात्मा, मैंने अपनी इस जीवन रूपी नाव (नैया) का पूरा भार अब पूरी तरह से केवल और केवल तेरे ही भरोसे छोड़ दिया है। इस संसार के जितने भी झूठे दिखावे, स्वार्थ और मायाजाल (माया) हैं, उनसे मैंने अपना मुख मोड़ लिया है। जब तक मैं इस भौतिक संसार के चक्रव्यूह में उलझा हुआ था, तब तक चारों ओर अज्ञानता का घोर अंधकार था और मुझे शांति का कोई मार्ग सूझ नहीं रहा था; परंतु हे प्रभु, जब से मैंने पूरी श्रद्धा के साथ तेरा पावन दामन थामा है, तब से मेरे अंतर्मन के सारे सांसारिक और कूटनीतिक बंधन सदा के लिए टूट गए हैं। मनुष्य को यह वैचारिक सत्य स्वीकार करना ही होगा कि वह इस मृत्युलोक में खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही चला जाएगा। पैसे, नाम और पद की इस अंधी होड़ में भागकर मनुष्य केवल अपने आत्मिक सत्य को खो देता है। हमारा यह शरीर महज़ मिट्टी का एक पुतला है, जिसे एक न एक दिन इसी माटी में विलीन हो जाना है; इसलिए सच्चा सुकूँ और परम आनंद किसी राज-दरबार में नहीं, बल्कि विधाता की पावन चौखट (द्वार) पर आकर ही प्राप्त होता है।
कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे जगत के मालिक, मेरे जीवन में केवल तेरी ही इच्छा (रज़ा) सर्वोपरि रहे और मेरे हृदय में सदा तेरा ही वास बना रहे। चाहे इस संसार के सारे मतलबी रिश्ते मुझसे छूट जाएँ, परंतु तेरे प्रति जो मेरा अटूट विश्वास है, वह कभी डगमगाना नहीं चाहिए। नियति मुझे जीवन में खुशियाँ दे या दुखों का गहरा समंदर, मैं हर हाल में मुस्कुराते हुए उसे स्वीकार करूँ और मेरी इस अंतिम सांस तक मेरी वाणी पर केवल परमात्मा के नाम का मधुर राग गूँजता रहे। यह मानव जीवन ईश्वर की दी हुई एक अत्यंत पवित्र धरोहर (अमानत) है; इसलिए कवि कहते हैं कि मैं अपने इस सूने हृदय रूपी मंदिर में केवल तेरी भक्ति का अखंड दीपक जलाना चाहता हूँ और इस छोटी सी ज़िन्दगी को पूरी तरह तेरी ही सेवा में लगाना चाहता हूँ। अज्ञानी लोग ईश्वर को खोजने के लिए मंदिर, मस्जिद और बड़े-बड़े तीर्थों की यात्राओं में भटककर अपने मन और शरीर को व्यर्थ थकाते रहते हैं, जबकि परम सत्य तो यह है कि जो भी मनुष्य पूरी सादगी और निर्मल मन से अपनी आँखें मूँदकर अंतर्मन में ध्यान लगाता है, वह साक्षात् परमात्मा को अपने ही भीतर विराजमान पाता है।
खुली आँखों से दिखाई देने वाला यह समूचा जहान महज़ एक सुंदर धोखा (छलावा) और स्वार्थ का बाज़ार है, जहाँ हर एक रिश्ते के पीछे दिखावे का पाखंड छिपा हुआ है। इस कूटनीतिक नगरी में कोई भी जीव अंत तक सच्चा साथ नहीं निभाता; यहाँ केवल और केवल परमेश्वर का नाम ही परम सत्य है। जो भाग्य में होना तय (होनी) है, वह होकर ही रहता है; फिर यह अज्ञानी मन व्यर्थ में क्यों व्याकुल (अकुलाए) होता है? मनुष्य को केवल अपने पावन कर्म और धर्म के मार्ग पर अडिग रहना चाहिए और बेकार की चिंताओं में अपनी रातें बर्बाद नहीं करनी चाहिए। कवि कहते हैं कि दूसरों को खुश करने की झूठी होड़ और मतलबी दुनिया की महफ़िलों से मैं कब का दूर हो चुका हूँ, क्योंकि वहाँ केवल दुख ही मिलते हैं। ईश्वर की पावन शरण में आते ही अंतर्मन के सारे पुराने ज़ख्म और घाव पूरी तरह भर जाते हैं। जिस धन-दौलत (वैभव) और सुंदर शरीर पर इंसान इतना घमंड करता है, मौत का प्रहार होते ही वह सब कुछ यहीं धरा रह जाता है। इतिहास गवाह है कि समूची दुनिया को जीतने वाला महान सम्राट सिकंदर जैसा शाह भी अंत में दोनों हाथ खाली उठाकर ही इस विदा हुआ; मनुष्य के साथ केवल उसकी अच्छी करनी (नेक कर्म) ही परलोक जाती है। अंत में, कवि अपने जीवन का सर्वस्व ईश्वर को सौंपते हुए कहते हैं कि मेरी जीत और हार सब अब तेरे ही हाथों में है। जीवन में जो भी सुख-दुख मिले, उसे प्रभु का पावन आशीर्वाद (प्रसाद) समझकर सिर माथे पर लगा लेना और बिना किसी शिकवे-गिले के अपनी रूह को केवल परमात्मा की भक्ति के पावन संदेश (पैग़ाम) में लीन कर देना ही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ और अंतिम मोक्ष है