ये भी तो एक बात है


ये भी तो एक बात है
1. कहीं तुमने बातों को बात करते हुए देखा है,
या फिर कहीं तुमने मार करते हुए देखा है बात को।
बातों को आपस में मसला करते हुए देखा है,
या फिर अच्छा काम करते हुए देखा है बात को।
2. बातों के कोई आकार या स्वाद भी होते हैं,
किस रंग के होते कैसे होते ये बात।
मैं तो हैरान हूँ क्या बातें भी विचार करतीं,
मज़हब या रंग भेद में क्या उपजती है बात।
3. होता तो कुछ ज़रूर है इसके भी कुछ अस्तित्व हैं,
वरना इस ज़माने में न होती किसी विरले की बात।
देखा तो नहीं जाता पर अनुभव में आ जाता,
इन्हीं बातों के दम पर लोग देते हैं दूसरों को मात।
4. जो भी है जैसा भी है फिर भी अपने आप में है,
एक वजूद भी है एक अस्तित्व भी है ऐसा है यह बात।
नहीं देखा क्या तुमने इस ज़माने को थोड़ा ही सही,
इस ज़माने को पढ़ने के लिए भी चाहिए एक बात।
5. कहीं भी चले जाओ जमघट में होती है कुछ तो बात,
अच्छी ना सही बुरी ना सही दोनों सही मगर होती बात।
तुम चुप भी रहो या खामोश रहो,
फिर भी किसी तरह सुनने को मिलती है बात।
6. मुझे तो लगता है ये बात ही हमारे आधार हैं,
इसके बिना ऐसा समझो बिन नौका के पतवार हैं।
अच्छी या बुरी लेकिन होती है खुद सबकी अपनी बात,
मैं तो यह जानता हूँ ये रेत भी आपस में करती है बात।
7. मैं और तू जो करते हैं वह भी तो है एक बात,
गुरु व शिष्य के बीच बिन बातों के कैसे होती बात।
हर बातों की भी एक बात है उसके बिना कुछ न होती बात,
चोरी छिपे हर लोग करते हैं अपने प्रियतम से बात।
8. ये बात है कोई अमृत नहीं जो ख़त्म हो जाये,
है ये अज़ीज़ इसके बिना किसी से रहा भी न जाये।
ये वक़्त की भी अपना कभी-कभी तक़ाज़ा करते,
हर किसी की बात बन जाये ऐसा लोग प्रयत्न करते।
9. सब जगह देखो कहीं न कहीं हर जगह कुछ तो है बात,
देखो तुम गीता को ये भी तो है अर्जुन और कृष्ण की बात।
देख तू रामायण को ये भी तो है शिव और पार्वती की बात,
चाहे अमृत भरी हो या विष भरी हो तो भी सिर्फ रहेगी एक बात।
10. बातों से रामायण हुए बातों से महाभारत,
हर युद्धों के मूल कारण होती है एक छोटी सी बात।
ये बात ही है जो कभी-कभी हृदय में चुभती है,
हम सबको भी सींचती है ये बात।
11. बात है सदियों से लेकिन करते हम इस पर अपना राज,
ये ख़त्म होने वाली चीज़ नहीं ऐसी है अनोखी बात।
पैदा हुए हैं बड़े हो जायेंगे एक दिन मर जायेंगे,
अंत में होगा सिर्फ एक मोटा-मोटी बात।
12. बात तो सब करते हैं सुनी कोई जाती एक बात,
सुनकर गुनकर जो अच्छा लगता वही हृदय में आ जाती बात।
साहस के साथ संघर्ष किया जाए तो,
जीवन का उत्कर्ष करती है ये बात।
13. मेरे मन में तेरे मन में जो भी है वह भी एक बात,
जो पढ़ सकता है तू वो भी किसी के है बात।
सोच ले समझ ले चाहे जितना प्रयास करले,
निष्कर्ष जो भी निकले वह भी रहेगी बस एक बात।
14. बातों से अगर काम बन जाये तो सिर्फ तू कर ले बात,
आओ मेरे पास तुम तुमको बताऊँ एक राज की बात।
होती है सब व्यर्थ निराधार इधर उधर की बात,
सच तो सच होती उत्थान भी करती है सच बात।
15. दुनिया में बड़ी बड़ी बातें हुईं तुमने भी देखा मैंने भी देखा,
काश वह सुक़ून दे सबको ऐसी हो वह बात।
बातों ही बातों में मैं उठा और लिखने को तैयार हुआ,
थोड़ा ही सही लेकिन देख यहाँ मैं लिखा हूँ मेरे दिल की बात।

काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • मसला = हल करना / विचार-विमर्श करना
  • मजहब = धर्म / संप्रदाय
  • विरले = दुर्लभ / बहुत कम मिलने वाला / अनोखा
  • वजूद = अस्तित्व / पहचान
  • जमघट = भीड़ / समूह
  • तक़ाज़ा = मांग / समय की मांग
  • उत्कर्ष = उन्नति / प्रगति / विकास
  • निराधार = बिना किसी आधार के / व्यर्थ / बेबुनियाद

📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत विशाल, ओजस्वी और दार्शनिक गहराई से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन, समाज, इतिहास और अध्यात्म में 'बात' (संवाद) के असीम महत्व, उसके अदृश्य अस्तित्व और उसकी विनाशात्मक व रचनात्मक शक्तियों का १५ सुंदर पैराग्राफों में बेहद व्यापक विश्लेषण किया है। कवि आश्चर्य प्रकट करते हुए कहते हैं कि क्या तुमने कभी शब्दों और बातों को खुद आपस में बात करते या किसी कूटनीति के तहत एक-दूसरे पर वार (मार) करते देखा है? ये बातें अदृश्य होकर भी आपस में बड़े-बड़े गंभीर मसलों को हल कर देती हैं और समाज में बड़े-बड़े महान कार्यों को अंजाम देती हैं। भौतिक रूप से बातों का कोई निश्चित आकार, रंग या स्वाद नहीं होता, इसके बावजूद ये मानव मन पर सबसे गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। कवि चकित होकर सोचते हैं कि क्या ये बातें भी इंसानों की तरह विचार करने की क्षमता रखती हैं, या फिर समाज में फैले धर्म (मज़हब) और रंग-भेद की कड़वाहट से इन बातों का कोई वास्ता है? सच तो यह है कि बातों का अपना एक साफ़ व स्वतंत्र अस्तित्व (वजूद) ज़रूर होता है, वरना इस स्वार्थी संसार में किसी विरले और ज्ञानी महापुरुष की बात को सदियों तक याद नहीं रखा जाता। भले ही बातें आँखों से देखी नहीं जा सकतीं, परंतु इन्हें अंतर्मन से पूरी तरह महसूस (अनुभव) किया जा सकता है। इस कूटनीतिक दुनिया में लोग केवल अपनी बातों के जाल और कड़वे तर्कों के दम पर ही दूसरों को परास्त (मात) कर देते हैं।
कवि संवाद की सर्वव्यापकता को उघाड़ते हुए कहते हैं कि इस ज़माने की कड़वी हक़ीक़त को पढ़ने और समझने के लिए भी इंसान को किसी न किसी बात का सहारा लेना ही पड़ता है। दुनिया के किसी भी कोने में चले जाओ, लोगों की भीड़ (जमघट) में हमेशा बातों का कोलाहल गूँजता रहता है; चाहे वह बात अच्छी हो या बुरी, पर संवाद कभी रुकता नहीं। यदि कोई मनुष्य पूरी तरह मौन धारण कर ले या खामोश हो जाए, तो भी उसके अंतर्मन में विचारों की बातें चलती रहती हैं और बाहर समाज की बातें उसके कानों तक पहुँचती ही हैं। यह बातें ही मानव जीवन और हमारे समाज का असली आधार हैं, जिनके बिना हमारी स्थिति बिना पतवार की उस नाव जैसी हो जाएगी जो लहरों में खो जाती है। कुदरत का कण-कण बात करता है; यहाँ तक कि रेगिस्तान की बेजान रेत भी हवा के झोंकों के साथ आपस में बातें करती है। इंसानी रिश्तों का ताना-बाना केवल बातों पर टिका है। गुरु और शिष्य का पावन संबंध भी ज्ञान की बातों के बिना संभव नहीं है, और इस संसार में हर प्रेमी चोरी-छिपे अपने प्रियतम से मन की बातें करने के लिए व्याकुल रहता है। बातें कोई समाप्त होने वाला अमृत नहीं हैं; यह अनंत हैं। समय और वक़्त की मांग (तक़ाज़ा) के अनुसार बातों का स्वरूप बदल जाता है और हर इंसान समाज में अपनी बात मनवाने का कड़ा प्रयत्न करता है।
इतिहास और अध्यात्म के शिखर पर चोट करते हुए कवि कहते हैं कि सनातन धर्म का सबसे महान ग्रंथ 'श्रीमद्भगवद्गीता' भी वास्तव में कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच हुई ज्ञान की बात ही है। रामायण की पावन कथा की शुरुआत भी भगवान शिव और माता पार्वती के बीच हुए संवाद की बात से होती है। बातें चाहे अमृत जैसी मीठी हों या विष जैसी कड़वी, पर उनका वजूद अमर रहता है। एक छोटी सी कड़वी बात के कारण ही त्रेतायुग में रामायण का युद्ध हुआ और द्वापर युग में महाभारत का महा-विनाश हुआ; संसार के जितने भी भयानक युद्ध हुए हैं, उनके मूल में हमेशा अहंकार से उपजी एक छोटी सी बात ही होती है। यह बात जब कड़वी होकर किसी के हृदय में चुभती है तो जीवन तबाह कर देती है, और जब प्रेम की वाणी बनकर बहती है तो पूरे समाज को ज्ञान से सींच देती है। सदियों से मानव सभ्यता पर बातों का ही राज रहा है। इंसान इस धरती पर जन्म लेता है, बड़ा होता है और एक दिन मरकर मिट्टी में मिल जाता है; अंत में उसके जीवन का निष्कर्ष केवल एक मोटा-मोटी बात बनकर ही रह जाता है। दुनिया में रोज़ लाखों बातें की जाती हैं, परंतु इतिहास में केवल वही बात अमर होती है जो सत्य की कसौटी पर खरी उतरती है और जिसे समाज गहराई से सुनता और गुनता है। यदि मनुष्य साहस के साथ अपनी रचनात्मक बातों पर संघर्ष करे, तो यह बातें ही उसके जीवन का उत्कर्ष (महान उन्नति) कर देती हैं।
कवि कहते हैं कि मेरे मन में और तेरे मन में जो भी वैचारिक द्वंद्व चल रहा है, वह भी एक बात ही है। दुनिया चाहे जितने भी कूटनीतिक प्रयास कर ले, अंत में जीवन का निष्कर्ष केवल एक परम सत्य की बात पर ही आकर टिकेगा। इसलिए यदि बातों के माध्यम से समाज का कल्याण और काम बन सकता है, तो इंसान को हमेशा मीठे संवाद करने चाहिए। व्यर्थ की इधर-उधर की कड़वी बातें पूरी तरह निराधार (बेबुनियाद) होती हैं जो समाज में केवल नफ़रत फैलाती हैं; जबकि सत्य की बात ही मनुष्य का वास्तविक उत्थान और प्रगति करती है। इस दुनिया में बड़े-बड़े दार्शनिकों ने बड़ी-बड़ी बातें की हैं, परंतु सच्ची बात वही है जो अशांत जनमानस को आंतरिक सुक़ून और शांति दे सके। अंत में, कवि अपनी लेखनी के यथार्थ को प्रकट करते हुए कहते हैं कि समाज के इस कड़वे सच और बातों की महिमा को देखकर मेरा अंतर्मन जाग उठा और मैं कागज़-कलम लेकर कविता लिखने को तैयार हुआ। भले ही यह रचना संक्षिप्त है, परंतु इसमें मैंने किसी कूटनीति के बिना, सीधे अपने पूरे खुले दिल की बात को पन्नों पर उतार दिया है। इस महान रचना का मुख्य संदेश यही है कि वाणी ही मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण और शक्ति है; कड़वी और व्यर्थ की बातों का त्याग करके हमेशा सत्य, प्रेम और कल्याण की बातें करना ही मानव जीवन का सर्वोच्च धर्म और सच्ची सार्थकता है 

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