वही राम कहाते हैं
1.
सांसों का पंछी उड़ रहा, तू कुछ तो इसका ख्याल कर,
यह वक़्त हाथ से फिसल रहा, यूँ न इससे मज़ाक कर।
बेतहाशा इस भीड़ में यहाँ, कुछ भी नहीं है मिलता,
जो डूबकर भी हर बड़ी मुश्किल को हँसकर पाल लेते हैं।2.
वक़्त न तुझको कम मिला, न मुझे कतरा भर ज्यादा,
फ़िक्र में कल की खो दिया, तूने आज का जीवन आधा।
हाशिये पर खड़ा होकर भी, झूठा ये अभिमान कैसा,
जो तोड़कर इस घमंड के बंधन को खुद को तार लेते हैं।3.
सत्य का पता है सबको, पर यकीन यहाँ कुछ भी नहीं,
इस झूठे जग के मेले में, कोई किसी के साथ नहीं।
ज़िद भी बड़ी अजीब है इस माटी के नादान पुतले की,
जो इस शून्य के भीतर भी सच्चाई का दीदार कर लेते हैं।4.
कल यही अंत मेरा होगा, एक बार ठंडे मन से सोच,
जो कीमती दौर गुज़र रहा, तू ठहर कर उसे अभी रोक।
न कुछ तेरे बस में यहाँ, न मेरा ही बस चलता है,
जो इस चंचल मन की विकलता को चुपके से थाम लेते हैं।5.
मेरा वजूद क्या है जग में, कल रहूँ न रहूँ बातें आएँगी,
जुदा होने के बाद मेरी, यादें तेरे ग़म को बढ़ाएँगी।
ये रसों से भरे सुंदर उपवन, ये हँसती कलियाँ भी कल,
जो सूने दिल के किसी कोने में एक गहरी याद बन जाते हैं।6.
अक्सर पिछली रात की बातें, सुबह हमें याद नहीं आतीं,
कुछ तो बात है इस दिल में, जो फिर वो धुन जगातीं।
इन मासूम आँखों ने कभी, कोई छल-कपट नहीं देखा,
जो इस मतलबी दुनिया के हर एक फ़रेब को पहचान लेते हैं।7.
माया के इस कोलाहल में, हर कोई अपने में चूर है,
समझ न सका कोई इस खेल को, हर राही यहाँ मजबूर है।
पर जो झुका देता है सिर अपना, उस सच्चे प्रभु के दर पर,
उसी के सूने हृदय में भक्ति का अनुपम नूर जगमगाते हैं।8.
अहंकार की भारी चादर, उतार कर मन साफ़ कर लें,
औरों की कमियाँ छोड़ अब, पहले खुद को माफ़ कर लें।
चार दिन की मिली है जिंदगी, क्यों न चरणों में अर्पण कर दें,
जो नफ़रत के इस लंबे सफ़र का आज ही इंसाफ़ कर देते हैं।9.
जिस सुंदर काया और वैभव पर, इंसान दिन-रात इतराता है,
अंतिम बेला में वो सब कुछ, इसी ज़मीन पर रह जाता है।
सिकंदर जैसे बलशाली शाह भी, खाली हाथ ही विदा हुए,
जो इस मिटती खाक में भी अपनी नेकी का नाम छोड़ जाते हैं।10.
अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में,
जीत तुम्हारे हाथों में प्रभु, और हार तुम्हारे हाथों में।
इन आँखों ने क्या नहीं देखा, फिर भी ये इठलाती हैं,
जो गुज़र गए उन लकीरों से, बस वही राम कहाते हैं।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):- ख्याल = ध्यान / सोच
- बेतहाशा = बहुत ज़्यादा / असीमित
- अभिमान = घमंड / अहंकार
- हाशिये = किनारे पर / उपेक्षित स्थान
- जनाज़ा = शवयात्रा / अंतिम यात्रा
- विकलता = बेचैनी / व्याकुलता
- वजूद = अस्तित्व / होना
- उपवन = बगीचा / बाग़
- कोलाहल = शोर-शराबा / माया का शोर
- नूर = प्रकाश / पावन चमक
- वैभव = धन-दौलत / ऐश्वर्य
- बलशाली = ताक़तवर / शक्तिशाली
- दयानिधान = दया के सागर (प्रभु)
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत ओजस्वी, मर्मस्पर्शी और अगाध दार्शनिक चेतना से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की क्षणभंगुरता, समय के निरंतर बहते पहिये, सांसारिक इच्छाओं के झूठे भ्रम, अहंकार का कड़ा विसर्जन और अंततः साक्षात् प्रभु श्री राम के चरणों में सर्वस्व सौंपकर मोक्ष पद प्राप्त करने के परम सिद्धांत को १० अत्यंत विशाल व सुंदर अंतरों में बहुत ही दिव्य प्रकाश के साथ उकेरा है। कविता की शुरुआत जीवन के अमूल्य क्षणों को पहचानने की सीख से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि इस नश्वर शरीर के भीतर जीवन की सांसों का पंछी हर पल उड़ रहा है; ऐ अज्ञानी जीव, तू होश में आकर कुछ तो इसकी आत्मिक रक्षा का ध्यान (ख्याल) कर। समय की यह कीमती पूँजी रेत की भाँति तेरे हाथों से फिसलती जा रही है, तू प्रपंचों में पड़कर यूँ इस अमूल्य जीवन से कोई मज़ाक मत कर। इस मतलबी दुनिया की अंधी दौड़ और बेतहाशा (असीमित) भीड़ के बीच भटकने से कभी किसी को शांति नहीं मिलती; परंतु जो भाग्यशाली मनुष्य प्रभु की भक्ति के रस में पूरी तरह डूबकर जीवन की हर एक बड़ी चुनौती और मुश्किल को मुस्कुराकर सह लेता है, विधाता स्वयं उसके योग-क्षेम का वहन करते हैं। विधाता ने इस संसार में कर्म करने के लिए न तो तुझे वक़्त कम दिया है और न ही मुझे एक कतरा (बूंद) भर समय ज़्यादा दिया है; सबको एक समान उम्र मिली है। परंतु मनुष्य ने आने वाले कल की कड़वी चिंताओं और कूटनीति के चक्कर में पड़कर अपनी आज की पावन ज़िन्दगी का आधा हिस्सा व्यर्थ ही गँवा दिया है। वक़्त के श्मशान घाट रूपी किनारे (हाशिये) पर बेबस खड़ा होने के बावजूद मनुष्य के भीतर यह झूठा घमंड और अहंकार (अभिमान) न जाने कैसा है; सत्य तो यह है कि जो मनुष्य समय रहते इस अहंकार के कड़वे बंधन को तोड़ देता है, वह अपनी आत्मा का उद्धार करके खुद को भवसागर से तार लेता है।कवि सत्य के व्यावहारिक रूप को उघाड़ते हुए आगे कहते हैं कि किताबी तौर पर तो सत्य का पता संसार के हर एक इंसान को है, परंतु उस सत्य पर वास्तविक अटूट विश्वास (यकीन) यहाँ किसी के भीतर नहीं दिखाई देता। इच्छाओं के इस झूठे सांसारिक मेले में कोई भी जीव किसी दूसरे का स्थाई साथी नहीं है, सब स्वार्थ के संगी हैं। मिट्टी से बने इस हाड़-मांस के नादान पुतले (मनुष्य) की ज़िद भी बड़ी विस्मयकारी है, जो कूटनीति के वश होकर इस मायावी शून्य के भीतर भी साक्षात् अविनाशी परमात्मा की सच्चाई का दीदार करने का झूठा दम्भ भरता है, जबकि सत्य केवल अंतर्मुखी होकर ही मिलता है। ऐ इंसान, तू ज़रा एकांत में शांत होकर ठंडे मन से विचार कर कि एक दिन यही अंत और मौत का जनाज़े का पल मेरा और तेरा भी होना पूरी तरह निश्चित है। समय का जो यह सबसे कीमती दौर बीत रहा है, तू कूटनीति की अंधी दौड़ को ठहरकर अभी रोक। इस जहान के बाज़ार में न तो कुछ तेरे वश में है और न ही इस संसार पर मेरा कोई ज़ोर चलता है; सब कुछ साक्षात् उसी सर्वशक्तिमान विधाता की मर्जी से चल रहा है, जो ध्यान में लीन रहने वाले संतों के इस चंचल मन की बेचैनी (विकलता) को पल भर में चुपके से शांत करके थाम लेते हैं।कवि आत्मा के अमरत्व और संसार की नश्वरता को उघाड़ते हुए आगे कहते हैं कि इस विशाल जहान में मेरा और तेरा भौतिक वजूद (अस्तित्व) ही क्या है; कल जब मैं इस धरा पर नहीं रहूँगा, तो केवल मेरी बातें ही समाज की स्मृतियों में रह जाएँगी। इस संसार से हमेशा के लिए विदा (जुदा) होने के बाद, मेरी ये सादी यादें प्रेमियों के दिल के ग़म को और बढ़ाएँगी। खुशियों के रसों से भरे ये जो सुंदर बगीचे (उपवन) दिखाई दे रहे हैं और मुस्कुराती हुई ये जो सुंदर कलियाँ खिली हैं, कल वक़्त बदलते ही ये सब सूने दिल के किसी कोने में महज़ एक गहरी याद बनकर सिमट जाएँगे, इनका कोई भौतिक रूप स्थाई नहीं रहेगा। जैसे रात बीत जाने पर पिछली रात की साधारण बातें सुबह मनुष्य के दिमाग से पूरी तरह उतर जाती हैं और याद नहीं रहतीं, ठीक वैसे ही इस संवेदनशील दिल के भीतर कोई तो विधाता की पावन धुन जागृत है, जो बार-बार आत्मा को उसका असली लक्ष्य याद दिलाती रहती है। जिन मासूम बच्चों की आँखों ने कभी संसार का कोई छल-कपट नहीं देखा, वे अपनी सादगी और निश्छल चेतना के बल पर ही इस मतलबी दुनिया के हर एक प्रपंच और फ़रेब को पल भर में पहचान लेते हैं।कवि माया के प्रभाव और अहंकार विसर्जन का परम उपदेश देते हुए कहते हैं कि इस सांसारिक मोह-माया के भयानक शोर-शराबे (कोलाहल) में हर एक इंसान वासनाओं के मद में अंधा होकर अपने ही झूठे घमंड में चूर है। विधाता के इस अलौकिक खेल के रहस्य को आज तक कोई कूटनीतिज्ञ अपनी चालाकी से नहीं समझ सका, और इच्छाओं की गुलामी के कारण इस मार्ग का हर एक राहगीर यहाँ पूरी तरह मजबूर है। परंतु जो सरल हृदय मनुष्य अहंकार को त्यागकर अपना सिर साक्षात् उस परमेश्वर के पावन दर पर झुका देता है, दया के सागर (दयानिधान) प्रभु उसी के सूने अंतःकरण में अपनी भक्ति का एक ऐसा अलौकिक प्रकाश (अनुपम नूर) जगमगा देते हैं जिसके सामने ब्रह्मांड का सारा अंधेरा मिट जाता है। इसलिए समय रहते अपने मन पर चढ़ी अहंकार की इस भारी और मैली चादर को उतार कर फेंक दो और अपने अंतःकरण को पूरी तरह साफ़ कर लो; दूसरों के अवगुणों और कमियों को ढूंढना छोड़कर, पहले दयालु बनकर अपनी अंतरात्मा को उसकी पुरानी भूलों के लिए माफ़ करना सीखो। विधाता की तरफ से यह जो चार दिनों की सादी ज़िन्दगी मिली है, क्यों न इसे पूरी आत्मीयता से साक्षात् प्रभु के पावन चरणों में अर्पण कर दें, जो नफ़रत और कूटनीति के इस लंबे व कष्टकारी सांसारिक सफ़र का आज ही सदा के लिए इंसाफ़ करके मोक्ष दे देते हैं।कविता के अंतिम सोपान में, कवि इतिहास की अमर गवाही देकर संपूर्ण आत्म-समर्पण की घोषणा करते हैं। वे कहते हैं कि जिस सुंदर हाड़-मांस की काया और धन-दौलत के वैभव (ऐश्वर्य) पर मनुष्य रात-दिन घमंड में इतराता फिरता है, मृत्यु की अंतिम बेला आते ही वह सब कुछ इसी सादी ज़मीन की मिट्टी पर ज्यों का त्यों धरा रह जाता है। इतिहास गवाह है कि समूची दुनिया को जीतने का घमंड रखने वाला सिकंदर जैसा महान पराक्रमी और शक्तिशाली (बलशाली) सम्राट भी जब इस जहान से विदा हुआ, तो उसके दोनों हाथ पूरी तरह खाली थे, वह मिट्टी में विलीन हो गया। परंतु महान केवल वे ही सच्चे संत और कर्मवीर होते हैं, जो इस नश्वर मिट्टी की खाक में विलीन होने के बाद भी संसार में केवल अपनी नेकी, परोपकार और पवित्र नाम की अमर धरोहर छोड़ जाते हैं। अंत में, कवि निष्काम कर्मयोग की पराकाष्ठा पर पहुँचकर पुकारते हैं कि हे मेरे पालनहार विधाता, अब मैंने अपने इस जीवन का समूचा भार और उत्तरदायित्व पूरी तरह केवल तेरे ही पावन हाथों में सौंप दिया है। अब मेरे जीवन में मिलने वाली हर एक सफलता की जीत भी तेरे ही पावन हाथों में समर्पित है, और दुखों की हर एक हार भी पूरी तरह तेरे ही हाथों में है; मैं लाभ-हानि के इस द्वंद्व से मुक्त हूँ। इन आँखों ने संसार के न जाने कितने प्रपंचों और उतार-चढ़ावों को देख लिया है, फिर भी ये अज्ञानता के कारण झूठी कूटनीति में इठलाती रहती हैं। परंतु जो दिव्य पुरुष संसार के इस सुख-दुख के द्वंद्व और प्रारब्ध की पुरानी लकीरों से पूरी तरह ऊपर उठकर विधाता की चेतना में लीन हो जाते हैं, वास्तव में वे ही इस ब्रह्मांड के कण-कण में वास करने वाले साक्षात् राम कहलाते हैं। इस संपूर्ण अमर रचना का मुख्य संदेश यही है कि सांसारिक मोह-माया, धन-दौलत के वैभव, काया के झूठे अभिमान और कूटनीति के बाज़ार का पूरी तरह परित्याग कर देना चाहिए। सिकंदर जैसे शक्तिशाली सम्राटों की नश्वरता को पहचानकर, अहंकार की चादर उतारकर अपने अंतःकरण को साफ़ करना, और विधाता (श्री राम) के चरणों में सर्वस्व सौंपकर सादगी व नेकी के साथ जीना ही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ और अंतिम शाश्वत मोक्ष है
सांसों का पंछी उड़ रहा, तू कुछ तो इसका ख्याल कर,
यह वक़्त हाथ से फिसल रहा, यूँ न इससे मज़ाक कर।
बेतहाशा इस भीड़ में यहाँ, कुछ भी नहीं है मिलता,
जो डूबकर भी हर बड़ी मुश्किल को हँसकर पाल लेते हैं।
वक़्त न तुझको कम मिला, न मुझे कतरा भर ज्यादा,
फ़िक्र में कल की खो दिया, तूने आज का जीवन आधा।
हाशिये पर खड़ा होकर भी, झूठा ये अभिमान कैसा,
जो तोड़कर इस घमंड के बंधन को खुद को तार लेते हैं।
सत्य का पता है सबको, पर यकीन यहाँ कुछ भी नहीं,
इस झूठे जग के मेले में, कोई किसी के साथ नहीं।
ज़िद भी बड़ी अजीब है इस माटी के नादान पुतले की,
जो इस शून्य के भीतर भी सच्चाई का दीदार कर लेते हैं।
कल यही अंत मेरा होगा, एक बार ठंडे मन से सोच,
जो कीमती दौर गुज़र रहा, तू ठहर कर उसे अभी रोक।
न कुछ तेरे बस में यहाँ, न मेरा ही बस चलता है,
जो इस चंचल मन की विकलता को चुपके से थाम लेते हैं।
मेरा वजूद क्या है जग में, कल रहूँ न रहूँ बातें आएँगी,
जुदा होने के बाद मेरी, यादें तेरे ग़म को बढ़ाएँगी।
ये रसों से भरे सुंदर उपवन, ये हँसती कलियाँ भी कल,
जो सूने दिल के किसी कोने में एक गहरी याद बन जाते हैं।
अक्सर पिछली रात की बातें, सुबह हमें याद नहीं आतीं,
कुछ तो बात है इस दिल में, जो फिर वो धुन जगातीं।
इन मासूम आँखों ने कभी, कोई छल-कपट नहीं देखा,
जो इस मतलबी दुनिया के हर एक फ़रेब को पहचान लेते हैं।
माया के इस कोलाहल में, हर कोई अपने में चूर है,
समझ न सका कोई इस खेल को, हर राही यहाँ मजबूर है।
पर जो झुका देता है सिर अपना, उस सच्चे प्रभु के दर पर,
उसी के सूने हृदय में भक्ति का अनुपम नूर जगमगाते हैं।
अहंकार की भारी चादर, उतार कर मन साफ़ कर लें,
औरों की कमियाँ छोड़ अब, पहले खुद को माफ़ कर लें।
चार दिन की मिली है जिंदगी, क्यों न चरणों में अर्पण कर दें,
जो नफ़रत के इस लंबे सफ़र का आज ही इंसाफ़ कर देते हैं।
जिस सुंदर काया और वैभव पर, इंसान दिन-रात इतराता है,
अंतिम बेला में वो सब कुछ, इसी ज़मीन पर रह जाता है।
सिकंदर जैसे बलशाली शाह भी, खाली हाथ ही विदा हुए,
जो इस मिटती खाक में भी अपनी नेकी का नाम छोड़ जाते हैं।
अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में,
जीत तुम्हारे हाथों में प्रभु, और हार तुम्हारे हाथों में।
इन आँखों ने क्या नहीं देखा, फिर भी ये इठलाती हैं,
जो गुज़र गए उन लकीरों से, बस वही राम कहाते हैं।
- ख्याल = ध्यान / सोच
- बेतहाशा = बहुत ज़्यादा / असीमित
- अभिमान = घमंड / अहंकार
- हाशिये = किनारे पर / उपेक्षित स्थान
- जनाज़ा = शवयात्रा / अंतिम यात्रा
- विकलता = बेचैनी / व्याकुलता
- वजूद = अस्तित्व / होना
- उपवन = बगीचा / बाग़
- कोलाहल = शोर-शराबा / माया का शोर
- नूर = प्रकाश / पावन चमक
- वैभव = धन-दौलत / ऐश्वर्य
- बलशाली = ताक़तवर / शक्तिशाली
- दयानिधान = दया के सागर (प्रभु)
इस अत्यंत ओजस्वी, मर्मस्पर्शी और अगाध दार्शनिक चेतना से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की क्षणभंगुरता, समय के निरंतर बहते पहिये, सांसारिक इच्छाओं के झूठे भ्रम, अहंकार का कड़ा विसर्जन और अंततः साक्षात् प्रभु श्री राम के चरणों में सर्वस्व सौंपकर मोक्ष पद प्राप्त करने के परम सिद्धांत को १० अत्यंत विशाल व सुंदर अंतरों में बहुत ही दिव्य प्रकाश के साथ उकेरा है। कविता की शुरुआत जीवन के अमूल्य क्षणों को पहचानने की सीख से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि इस नश्वर शरीर के भीतर जीवन की सांसों का पंछी हर पल उड़ रहा है; ऐ अज्ञानी जीव, तू होश में आकर कुछ तो इसकी आत्मिक रक्षा का ध्यान (ख्याल) कर। समय की यह कीमती पूँजी रेत की भाँति तेरे हाथों से फिसलती जा रही है, तू प्रपंचों में पड़कर यूँ इस अमूल्य जीवन से कोई मज़ाक मत कर। इस मतलबी दुनिया की अंधी दौड़ और बेतहाशा (असीमित) भीड़ के बीच भटकने से कभी किसी को शांति नहीं मिलती; परंतु जो भाग्यशाली मनुष्य प्रभु की भक्ति के रस में पूरी तरह डूबकर जीवन की हर एक बड़ी चुनौती और मुश्किल को मुस्कुराकर सह लेता है, विधाता स्वयं उसके योग-क्षेम का वहन करते हैं। विधाता ने इस संसार में कर्म करने के लिए न तो तुझे वक़्त कम दिया है और न ही मुझे एक कतरा (बूंद) भर समय ज़्यादा दिया है; सबको एक समान उम्र मिली है। परंतु मनुष्य ने आने वाले कल की कड़वी चिंताओं और कूटनीति के चक्कर में पड़कर अपनी आज की पावन ज़िन्दगी का आधा हिस्सा व्यर्थ ही गँवा दिया है। वक़्त के श्मशान घाट रूपी किनारे (हाशिये) पर बेबस खड़ा होने के बावजूद मनुष्य के भीतर यह झूठा घमंड और अहंकार (अभिमान) न जाने कैसा है; सत्य तो यह है कि जो मनुष्य समय रहते इस अहंकार के कड़वे बंधन को तोड़ देता है, वह अपनी आत्मा का उद्धार करके खुद को भवसागर से तार लेता है।