वही राम कहाते है


जीवन निकल रहा है, कुछ तो ख्याल कर,

वक्त भी फिसल रहा है, यूं न मजाक कर।

बेतहाशा, बेइंतहा यहाँ कुछ भी नहीं मिलता,

बस ठहर! क्या चाहिए तुझे? ये खुद से सवाल कर।


वक्त न तुझे कम मिला, न मुझे कतरा भर ज्यादा,

क्या होगा कल, फिक्र में किया जीवन आधा।

हाशिये पर होकर अभिमान न जाने किसका,

कौन रहे किसके लिए, न जाने कितना किया वादा।


पता तो सबको है, यकीन भी कुछ कम नहीं,

यहाँ न कोई किसी का, किसी के साथ नहीं।

ज़िद भी अजीब, मेरा होना भी कुछ कम नहीं,

जो जनाज़ा अभी जा रहा है, मुझे उसका भी ग़म नहीं।


कल ये मेरे साथ भी होगा, एक बार ज़रा सोच,

जो गुज़रा दौर है, ज़रा उसे भी जाके रोक।

न कुछ तेरे बस में, न कुछ मेरे बस में, ये भी तो सोच,

ये याद आएगा गुज़रा कल, अपने मन को ज़रा टोक।


मेरा क्या, मैं रहूँ या न रहूँ, मेरी बातें तुझे याद आएँगी,

थोड़ा ही सही, लेकिन ग़म का एक हिस्सा ज़रूर खाएँगी।

ये रस भरे उपवन भी तुझे तड़पाएँगे,

कुछ याद के कोने से एक पिछली याद आएगी।


अक्सर पिछली रात की बात हमें याद नहीं आती है,

कुछ तो बात है हममें, फिर हम वही राग दोहराते हैं।

इन आँखों ने क्या नहीं देखा, फिर भी ये इठलाती हैं,

जो गुज़र गए उन लकीरों से, बस वही राम कहाते हैं,

बस वही राम कहाते हैं।

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