बेहतर की तलाश और चार दिन की ज़िंदगी

बेहतर की तलाश और चार दिन की ज़िंदगी

1.
चार दिन की जिंदगी है, दो दिन बातों में निकल गए,
जो कल तक अपने थे, वो बेहतर की तलाश में बदल गए।
गुरूर किस बात का करें हम, इस मिट्टी के जिस्म पर,
यहाँ बड़े-बड़े सिकंदर भी, आख़िर मिट्टी में मिल गए।
2.
हम क्या थे और क्या हो गए, कुछ नया पाने की चाह में,
वक्त का पहिया बदल गया, हम भटक गए अनजान राह में।
जो कल तक अपनी दुनिया थी, वो पल भर में छूट गई,
आज हम बदल गए पूरी तरह, इस बदलती दुनिया की पन्नाह में।
3.
वो मासूम सा बचपन और, वो बेफ़िक्री की रातें कहाँ गईं,
जो दिल में साफ़ छुपी थी, वो सीधी-सरल बातें कहाँ गईं।
कागज़ के चंद टुकड़ों को, कमाने की इस अंधी दौड़ में,
न जाने कितनी हँसती-खेलती, वो पुरानी मुलाकातें कहाँ गईं।
4.
जिसे हम तरक्की कहते हैं, वो एक छलावा सी लगती है,
हर नई कामयाबी अब तो, दिल को नया घाव देती है।
महफ़िल में हँसते हैं हम केवल, दुनिया को दिखाने के लिए,
पर अकेले में यही तन्हाई, हमें अंदर ही अंदर खाती है।
5.
कोई नहीं पूछता यहाँ आकर, कि तुम्हारे दिल का हाल क्या है,
सब बस यही देखते हैं कि इस बाज़ार में तुम्हारा मुकाम क्या है।
इस झूठी नुमाइश के मेले में, हम इस कदर खो से गए,
कि खुद से ही बिछड़ गए, अब बचा कोई नया अरमान क्या है।
6.
कभी फ़ुरसत में बैठ कर, खुद को भी हम पहचान न पाए,
आईने में जो खड़ा है अक्स, उसे अपना कह कर बुला न पाए।
गैरों की पसंद के सांचे में, खुद को ऐसा ढाल लिया हमने,
कि अपनी ही रूह की चीख को, हम चाहकर भी सुन न पाए।
7.
वक्त ने जब भी पलटी करवट, एक नया सबक ही सिखाया,
जिसे अपना समझा था दिल से, उसने ही पल भर में पराया बनाया।
बहुत देर से समझ आया, इस अनजानी जिंदगी का असली गणित,
कि जितना हमने यहाँ खोया, उतना तो कभी कमा भी न पाया।
8.
अब भी वक्त है ऐ मुसाफ़िर, ज़रा ठहर और गौर कर,
दूसरों को खुश करने की, इस बेकार ज़िद को अब ढेर कर।
मिट्टी का पुतला है तू आख़िर, एक दिन मिट्टी में ही सो जाना है,
जी ले कुछ पल खुद के लिए, अब नफ़रत का ये सफ़र ख़त्म कर।
9.
कागज़ की इस खामोशी में ही, अब जीवन का हर सार छुपा है,
जो बीत गया सो बीत गया, अब बस आने वाला कल बाकी है।
वक्त का यही फलसफा है, कि जाने के बाद इस दुनिया से,
न धन-दौलत साथ जाएगी, बस इंसान के कर्मों की पहचान बाकी है।
10.
दिखावे की इस झूठी दुनिया से, अब तो ये जियरा घबराता है,
स्वार्थ की इस घनेरी नगरी में, हर चेहरा यहाँ बदल जाता है।
खो दिया हमने खुद को ही, औरों को सदा हँसाने में,
पर जो तन्हाई मिली है बदले में, वो दर्द हमेशा सताता है।
11.
अब समेट कर अपने टूटे अरमानों को, हम नया रास्ता बनाते हैं,
ज़माने की इस अंधी होड़ से, हम खुद का दामन छुड़ाते हैं।
जब तक सांसें जारी हैं, इस माटी के नादान पुतले में,
इस चार दिन की जिंदगी का, हर लम्हा सुकून से बिताते हैं।

📖 कविता में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):

  • गुरूर = घमंड / अहंकार
  • जिस्म = शरीर / काया
  • ज़ेहन = दिमाग / मन / बुद्धि
  • मकाम = पद / दर्जा / स्थान
  • नुमाइश = दिखावा / प्रदर्शन
  • अरमान = इच्छा / इच्छाएँ / चाहत
  • अक्स = परछाईं / आईने में दिखने वाला रूप
  • करवट = बदलाव / दशा का बदलना
  • गणित = हिसाब-किताब / लेखा-जोखा
  • सार = असली निचोड़ / मतलब / अर्थ
  • फलसफा = जीवन का गहरा सच / सिद्धांत / दर्शन
  • जियरा = हृदय / दिल / मन
  • पन्नाह = शरण / आसरा / छाँव


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