वो मुझे मिली थी अभी अभी
1. फ़लक से उतर कर जो ज़मीं पर आई थी,
वह न जाने कहाँ खो गयी अभी-अभी।
उसको देखते ही सारी कायनात थम सी गयी,
वह ख़ुदा की रूह न जाने कहाँ गयी अभी-अभी।
मेरी ख़ुदा वो ख़ुदा की ख़ुदाया वो,
रब की रबनबी मेरी ज़िंदगी वो।
उसके आते ही जिस्म में जान आ गया अभी-अभी,
मेरी जान तो थी यहीं पर कहीं खो गयी अभी-अभी।
मेरी तमन्ना एक मेरी आरज़ू वो,
मेरी मुश्किल वो मेरी मंज़िल वो।
उसे देखते ही एक जुनूनियत आ गयी अभी-अभी,
उसे पाने की फ़ितूर छा गयी अभी-अभी।
उसके आते ही फ़िज़ा में बहार आ गये,
अनायास ही सब फूलों की बगिया खिल गये।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
वह न जाने कहाँ खो गयी अभी-अभी।
उसको देखते ही सारी कायनात थम सी गयी,
वह ख़ुदा की रूह न जाने कहाँ गयी अभी-अभी।
मेरी ख़ुदा वो ख़ुदा की ख़ुदाया वो,
रब की रबनबी मेरी ज़िंदगी वो।
उसके आते ही जिस्म में जान आ गया अभी-अभी,
मेरी जान तो थी यहीं पर कहीं खो गयी अभी-अभी।
मेरी तमन्ना एक मेरी आरज़ू वो,
मेरी मुश्किल वो मेरी मंज़िल वो।
उसे देखते ही एक जुनूनियत आ गयी अभी-अभी,
उसे पाने की फ़ितूर छा गयी अभी-अभी।
उसके आते ही फ़िज़ा में बहार आ गये,
अनायास ही सब फूलों की बगिया खिल गये।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
2. थी हूर कोई एक लाजवाब,
चौदहवीं का चाँद एक आफ़ताब।
स्वागत करने आसमा उतरी अभी-अभी,
वह जाने कहाँ गयी मेरी जान अभी-अभी।
प्रेम की मूरत है मेरी ही सूरत है,
मेरे ख्वाबों को उसकी ही ज़रूरत है।
आई ख्वाबों से निकल कर मेरे अभी-अभी,
थी यही न जाने कहाँ गयी अभी-अभी।
वो पूनम की एक खामोश रात है,
ख़ुदा कसम उसमें कुछ तो बात है।
जिस चाँद को मैं जान से ज़्यादा चाहता था,
वह चाँद भी छुप गया अभी-अभी।
उसे देखकर एक मकसद मिल गया अभी-अभी,
बंजर ज़मीं में गुल खिल गया अभी-अभी।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
चौदहवीं का चाँद एक आफ़ताब।
स्वागत करने आसमा उतरी अभी-अभी,
वह जाने कहाँ गयी मेरी जान अभी-अभी।
प्रेम की मूरत है मेरी ही सूरत है,
मेरे ख्वाबों को उसकी ही ज़रूरत है।
आई ख्वाबों से निकल कर मेरे अभी-अभी,
थी यही न जाने कहाँ गयी अभी-अभी।
वो पूनम की एक खामोश रात है,
ख़ुदा कसम उसमें कुछ तो बात है।
जिस चाँद को मैं जान से ज़्यादा चाहता था,
वह चाँद भी छुप गया अभी-अभी।
उसे देखकर एक मकसद मिल गया अभी-अभी,
बंजर ज़मीं में गुल खिल गया अभी-अभी।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
3. हाथ तेरे याद के सिवा कुछ भी नहीं,
पर तेरे बिना मेरी ज़िंदगी कुछ भी नहीं।
जिन सपनों को मैं सदियों से संजो रहा था,
वह खूबसूरत सपना भी टूट गया अभी-अभी।
हम जल नहीं रहे तुझे याद कर रहे हैं,
तुझसे ही तेरी फ़रियाद कर रहे हैं।
जिन आइनों में मैं तेरी तस्वीर देख रहा था,
वह शीशा भी एक खनक के साथ बिखर गया अभी-अभी।
तुझे मैं ढूँढ रहा था की आया झट याद,
तू तारों में होगी इस जहाँ के बाद।
जिस तारे को मैं कब से देख रहा था,
वह तारा भी टूटकर बिसर गया अभी-अभी।
तुझे खोने के बाद मैं बढ़ता हूँ इस कदर,
जैसी तेरी मंज़िल की मुझे हो पहले से ख़बर।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
पर तेरे बिना मेरी ज़िंदगी कुछ भी नहीं।
जिन सपनों को मैं सदियों से संजो रहा था,
वह खूबसूरत सपना भी टूट गया अभी-अभी।
हम जल नहीं रहे तुझे याद कर रहे हैं,
तुझसे ही तेरी फ़रियाद कर रहे हैं।
जिन आइनों में मैं तेरी तस्वीर देख रहा था,
वह शीशा भी एक खनक के साथ बिखर गया अभी-अभी।
तुझे मैं ढूँढ रहा था की आया झट याद,
तू तारों में होगी इस जहाँ के बाद।
जिस तारे को मैं कब से देख रहा था,
वह तारा भी टूटकर बिसर गया अभी-अभी।
तुझे खोने के बाद मैं बढ़ता हूँ इस कदर,
जैसी तेरी मंज़िल की मुझे हो पहले से ख़बर।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
4. तू रहेगी जहाँ वह मेरा प्यार होगा,
उन हवाओं को भी मुझपे ही नाज़ होगा।
तेरी गली का झोका मुझे छुआ तो था अभी-अभी,
न जाने व हवा भी किस गली से निकल गया अभी-अभी।
उस वादियों को तुम्हारा ही इंतज़ार था,
ऐसा लगता है जैसे कोई और बेकरार था।
जी चाहता है तुझे अपने बाहो में भर लूँ,
पर तू बाहे छुड़ाकर चली जाएगी अभी-अभी।
तुझे भूलने का अनोखा जतन कर रहा हूँ,
खुले मौसम में उलझे रहने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
वो मौसम जो तेरे पास से होकर आ रही मेरे पास,
तेरी ही याद देकर वो मौसम भी चली गयी अभी-अभी।
मैं होता तो हर जमघट में औरों के साथ,
करता भी हूँ सबसे हर समय दिल्लगी की बात।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
उन हवाओं को भी मुझपे ही नाज़ होगा।
तेरी गली का झोका मुझे छुआ तो था अभी-अभी,
न जाने व हवा भी किस गली से निकल गया अभी-अभी।
उस वादियों को तुम्हारा ही इंतज़ार था,
ऐसा लगता है जैसे कोई और बेकरार था।
जी चाहता है तुझे अपने बाहो में भर लूँ,
पर तू बाहे छुड़ाकर चली जाएगी अभी-अभी।
तुझे भूलने का अनोखा जतन कर रहा हूँ,
खुले मौसम में उलझे रहने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
वो मौसम जो तेरे पास से होकर आ रही मेरे पास,
तेरी ही याद देकर वो मौसम भी चली गयी अभी-अभी।
मैं होता तो हर जमघट में औरों के साथ,
करता भी हूँ सबसे हर समय दिल्लगी की बात।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
5. मिला था कहाँ तुझसे यह याद न आ रही,
ऐसा लग रहा मेरी जान जा रही।
है वो मेरी आख़िरी दम तक मेरी ही रहेगी,
लो देखो फिर वो मेरे ख्वाब में आ गयी अभी-अभी।
एक पल जो बीत गये थे साथ तेरे,
वो पल भी नहीं रहे अब पास मेरे।
तेरी जुल्फ़ों को जो छुआ था तेरी आगोश में,
मेरे हाथो से उसकी खुशबू आ रही है अभी-अभी।
उसे देखकर चाँद तारे शर्माते हैं,
उसके दीदार को वक्त भी तरसाते हैं।
फलक से उतर कर वो घटा पर आती कभी-कभी,
वो मुझे भी दिखी थी बस अभी-अभी।
ऐसा तो हुआ नहीं था मेरे साथ कभी भी,
एक लम्हा थम सा गया अभी-अभी।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
ऐसा लग रहा मेरी जान जा रही।
है वो मेरी आख़िरी दम तक मेरी ही रहेगी,
लो देखो फिर वो मेरे ख्वाब में आ गयी अभी-अभी।
एक पल जो बीत गये थे साथ तेरे,
वो पल भी नहीं रहे अब पास मेरे।
तेरी जुल्फ़ों को जो छुआ था तेरी आगोश में,
मेरे हाथो से उसकी खुशबू आ रही है अभी-अभी।
उसे देखकर चाँद तारे शर्माते हैं,
उसके दीदार को वक्त भी तरसाते हैं।
फलक से उतर कर वो घटा पर आती कभी-कभी,
वो मुझे भी दिखी थी बस अभी-अभी।
ऐसा तो हुआ नहीं था मेरे साथ कभी भी,
एक लम्हा थम सा गया अभी-अभी।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
6. ऐसा लग रहा है मुझे कुछ तो हो गया,
किसी के यादो में मैं एकदम गुम सा हो गया।
पानी की लहरे शांत हुयी है अभी-अभी,
वह चांदनी भी पिघल गयी अभी-अभी।
उसका चेहरा मेरे आखो के आगे है,
अपना ही जिस्म मुझे मुर्दा लागे है।
यही पर एक वादिया थी उसके साथ,
उसके जाते ही वादिया किधर गयी अभी-अभी।
वह छू गयी दिल को कैसेहौले से,
कैद करके रखा था दिल को न जाने कब से।
सोया था मैं गहरी नींद में अभी-अभी,
आखे खुलते ही स्वप्न बिखर गया अभी-अभी।
अब तो सोने के लिये बस एक बहाना चाहिये,
उसका हँसता हुआ चेहरा याद आना चाहिये।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
किसी के यादो में मैं एकदम गुम सा हो गया।
पानी की लहरे शांत हुयी है अभी-अभी,
वह चांदनी भी पिघल गयी अभी-अभी।
उसका चेहरा मेरे आखो के आगे है,
अपना ही जिस्म मुझे मुर्दा लागे है।
यही पर एक वादिया थी उसके साथ,
उसके जाते ही वादिया किधर गयी अभी-अभी।
वह छू गयी दिल को कैसेहौले से,
कैद करके रखा था दिल को न जाने कब से।
सोया था मैं गहरी नींद में अभी-अभी,
आखे खुलते ही स्वप्न बिखर गया अभी-अभी।
अब तो सोने के लिये बस एक बहाना चाहिये,
उसका हँसता हुआ चेहरा याद आना चाहिये।
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
7. जहाँ-जहाँ जाता हूँ उसकी याद आती है,
हर साये में उसकी चेहरा ही दिख जाती है।
जैसे बदली थी धूप हो ही गयी अभी-अभी,
उसके जाने से सच ये क्या हो गया अभी-अभी।
वो थी कुछ ऐसी थी वो कुछ ऐसी,
बहारो में फूलो की जैसी फूलो की जैसी।
उसको सच में मैं समझा ही था अभी-अभी,
ऐसा लग रहा मेरा सब कुछ लुट गया अभी-अभी।
न आह निकले न वाह निकले,
उसको आगे साडी जहाँ फीका लागे।
उसके आते ही मैं ज़िंदा हुआ था अभी-अभी,
जाते ही जिस्म से जान निकल गया अभी-अभी।
उसके जाने की खबर मुझे मिला अभी-अभी,
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
हर साये में उसकी चेहरा ही दिख जाती है।
जैसे बदली थी धूप हो ही गयी अभी-अभी,
उसके जाने से सच ये क्या हो गया अभी-अभी।
वो थी कुछ ऐसी थी वो कुछ ऐसी,
बहारो में फूलो की जैसी फूलो की जैसी।
उसको सच में मैं समझा ही था अभी-अभी,
ऐसा लग रहा मेरा सब कुछ लुट गया अभी-अभी।
न आह निकले न वाह निकले,
उसको आगे साडी जहाँ फीका लागे।
उसके आते ही मैं ज़िंदा हुआ था अभी-अभी,
जाते ही जिस्म से जान निकल गया अभी-अभी।
उसके जाने की खबर मुझे मिला अभी-अभी,
था तो मैं यहीं पर उसे ही देख रहा था,
पर शायद हूँ अब नहीं अब नहीं।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- फ़लक = आकाश / आसमान
- कायनात = समूची सृष्टि / ब्रह्मांड
- आरज़ू = तीव्र इच्छा / कामना / अभिलाषा
- फ़ितूर = पागलपन / गहरा जुनून / मानसिक सवार
- फ़िज़ा = वातावरण / माहौल / वायुमंडल
- आफ़ताब = सूर्य / सूरज
- फ़रियाद = दुहाई / प्रार्थना / गुहार लगाना
- बिसर गया = भूल गया / ओझल हो जाना
- जतन = प्रयास / कोशिश
- आगोश = गोद / आलिंगन / शरण
- दीदार = दर्शन / देखना / मुखड़ा देखना
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत ओजस्वी, सूफ़ियाना हुस्न से परिपूर्ण और विरह की अगाध गहराई को समेटे हुए महा-कविता के माध्यम से कवि ने अलौकिक प्रेम की प्राप्ति, प्रियतम के अचानक ओझल होने का कड़वा दर्द, यादों की कसक और सांसारिक कूटनीति से दूर केवल मोहब्बत के रूहानी अहसास को ७ अत्यंत लंबे व विराट अंतरों में बहुत ही सजीवता से उकेरा है। कविता की शुरुआत एक अलौकिक सौंदर्य के वर्णन से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि साक्षात् आसमान (फ़लक) से उतर कर जो हुस्न की परी इस ज़मीन पर आई थी, वह न जाने अचानक कहाँ ओझल हो गई। उसका रूप इतना दिव्य था कि उसे देखते ही इस समूची सृष्टि (कायनात) की रफ़्तार पल भर के लिए थम सी गई। वह साक्षात् ईश्वर की पावन रूह के समान पवित्र थी। वह मेरी रूहानी दुनिया का ईश्वर थी, रब की इबादत थी और मेरी पूरी ज़िन्दगी का एकमात्र सहारा थी। उसके समीप आते ही मेरे इस बेजान शरीर (जिस्म) में जीवन की नई सांसें लौट आई थीं, परंतु अफ़सोस कि जिसे मैं अपनी जान मानता था, वह अभी-अभी कहीं खो गई। प्रियतम ही मेरी अंतिम कामना (आरज़ू), मेरी जीवन की मुश्किल और मेरी आख़िरी मंज़िल थी। उसे देखते ही मन में प्रेम का एक पावन पागलपन (फ़ितूर) और जुनून जाग उठा था। उसके आगमन से उदास वातावरण (फ़िज़ा) में वसंत की बहार लौट आई थी और बिना किसी प्रयास के अंतर्मन के सूने बाग़ में उम्मीदों के फूल खिल गए थे। मैं एक टक वहीं खड़ा होकर केवल उसी के दर्शन कर रहा था, परंतु उसके जाते ही मेरा अपना वजूद ही समाप्त हो गया, मानो मैं अब वहाँ रहकर भी जीवित नहीं हूँ।
इस अत्यंत ओजस्वी, सूफ़ियाना हुस्न से परिपूर्ण और विरह की अगाध गहराई को समेटे हुए महा-कविता के माध्यम से कवि ने अलौकिक प्रेम की प्राप्ति, प्रियतम के अचानक ओझल होने का कड़वा दर्द, यादों की कसक और सांसारिक कूटनीति से दूर केवल मोहब्बत के रूहानी अहसास को ७ अत्यंत लंबे व विराट अंतरों में बहुत ही सजीवता से उकेरा है। कविता की शुरुआत एक अलौकिक सौंदर्य के वर्णन से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि साक्षात् आसमान (फ़लक) से उतर कर जो हुस्न की परी इस ज़मीन पर आई थी, वह न जाने अचानक कहाँ ओझल हो गई। उसका रूप इतना दिव्य था कि उसे देखते ही इस समूची सृष्टि (कायनात) की रफ़्तार पल भर के लिए थम सी गई। वह साक्षात् ईश्वर की पावन रूह के समान पवित्र थी। वह मेरी रूहानी दुनिया का ईश्वर थी, रब की इबादत थी और मेरी पूरी ज़िन्दगी का एकमात्र सहारा थी। उसके समीप आते ही मेरे इस बेजान शरीर (जिस्म) में जीवन की नई सांसें लौट आई थीं, परंतु अफ़सोस कि जिसे मैं अपनी जान मानता था, वह अभी-अभी कहीं खो गई। प्रियतम ही मेरी अंतिम कामना (आरज़ू), मेरी जीवन की मुश्किल और मेरी आख़िरी मंज़िल थी। उसे देखते ही मन में प्रेम का एक पावन पागलपन (फ़ितूर) और जुनून जाग उठा था। उसके आगमन से उदास वातावरण (फ़िज़ा) में वसंत की बहार लौट आई थी और बिना किसी प्रयास के अंतर्मन के सूने बाग़ में उम्मीदों के फूल खिल गए थे। मैं एक टक वहीं खड़ा होकर केवल उसी के दर्शन कर रहा था, परंतु उसके जाते ही मेरा अपना वजूद ही समाप्त हो गया, मानो मैं अब वहाँ रहकर भी जीवित नहीं हूँ।
कवि प्रियतम की तुलना जन्नत की अप्सरा से करते हुए कहते हैं कि वह हूर जैसी लाजवाब थी, जिसका मुखड़ा चौदहवीं के चाँद और साक्षात् सूर्य (आफ़ताब) की ओजस्वी चमक जैसा था। उसके स्वागत के लिए स्वयं आकाश ज़मीन पर झुक आया था, परंतु वह न जाने कहाँ विलीन हो गई। वह साक्षात् प्रेम की पावन मूरत थी, जिसे मेरे सपनों को हर पल ज़रूरत रहती है। वह अभी-अभी मेरे ख़यालों की दुनिया से निकल कर हक़ीक़त में सामने आई थी और पल भर में गायब हो गई। वह पूनम की एक शांत और रहस्यमयी रात जैसी सुंदर थी, ख़ुदा की कसम उसके रूप में कोई तो जादुई बात थी। जिस चाँद को मैं अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता था, वह बादलों की ओट में छिप गया। उसे देखने के बाद मेरे दिशाहीन जीवन को एक नया मक़सद और आधार मिल गया था, और मेरी बंजर हो चुकी ज़िन्दगी की मिट्टी में खुशियों के सुंदर फूल खिल गए थे। परंतु उसके जाते ही वक़्त का पहिया ऐसा घूमा कि सब कुछ सूना हो गया।
कवि विरह के कड़वे यथार्थ को उघाड़ते हुए आगे कहते हैं कि अब इस अकेलेपन में प्रियतम की यादों के सिवा मेरे हाथों में संसार का कोई सुख नहीं बचा है, और उसके बिना यह जीवन पूरी तरह व्यर्थ है। जिन सुंदर सपनों को मैं सदियों से अपने दिल में संजो रहा था, वह ख़ूबसूरत महल पल भर में टूटकर बिखर गया। मैं दुखों की आग में जल नहीं रहा, बल्कि एकांत में केवल प्रियतम को याद कर रहा हूँ और स्वयं उसी से उसकी जुदाई की गुहार (फ़रियाद) लगा रहा हूँ। जिन आईनों में मैं कूटनीति के दिखावे से दूर उसकी पावन तस्वीर देखता था, वह शीशा भी एक दर्दनाक खनक के साथ चकनाचूर हो गया। जब मैं निराश होकर उसे आसमान में ढूंढने लगा, तो दिल ने गवाही दी कि वह इस मतलबी दुनिया को छोड़कर ज़रूर तारों के पार दिव्य लोक में चली गई होगी; परंतु अफ़सोस कि जिस सुंदर तारे को मैं उम्मीद से टकटकी लगाए देख रहा था, वह तारा भी अचानक टूटकर आँखों से ओझल (बिसर) गया। उसे खोने के बाद भी मेरा यह प्रेमी मन उसी की मंज़िल की ओर निरंतर कदम बढ़ा रहा है।
कवि प्रकृति के माध्यम से अपनी विरह वेदना बयाँ करते हुए कहते हैं कि प्रियतम तू ब्रह्मांड के जिस कोने में रहेगी, वहीं मेरा सच्चा प्रेम वास करेगा और वहाँ बहने वाली पुरवाई हवाओं को भी मेरे इस पवित्र समर्पण पर नाज़ होगा। तेरी गली से आने वाला हवा का एक झोंका अभी-अभी मुझे छूकर गुज़रा था, परंतु न जाने वह हवा भी किस मतलबी रास्ते पर निकल गई। उन शांत वादियों को भी केवल तेरा ही इंतज़ार था, जहाँ हर एक जर्रा बेकरार था। मन करता है कि तुझे पूरी आत्मीयता से गले लगा लूँ, परंतु कूटनीति की यह दुनिया इतनी क्रूर है कि तू बाँहें छुड़ाकर तुरंत दूर चली जाएगी। मैं तुझे भुलाने का लाख प्रयास (जतन) कर रहा हूँ और खुले मौसम के कामों में खुद को उलझाए रखने की कोशिश कर रहा हूँ; परंतु जो हवा तेरे पास से होकर गुज़रती है, वह मेरे पास आकर मुझे तेरी ही कड़वी यादें देकर चली जाती है। मैं समाज की भीड़ (जमघट) में औरों के साथ बैठकर दिखावे के लिए दिल्लगी और हँसने-बोलने का नाटक तो करता हूँ, परंतु अंतर्मन से मैं पूरी तरह केवल तेरे ही ध्यान में डूबा रहता हूँ।
कवि मिलन के उन पलों को याद करके कहते हैं कि मुझे अब यह भी याद नहीं रहा कि मैं तुझसे पहली बार कहाँ मिला था, क्योंकि तेरी जुदाई में ऐसा लगता है मानो मेरे प्राण ही निकल रहे हों। वह मेरी आख़िरी सांस तक केवल मेरी ही रहेगी, और लो देखो, वह अभी-अभी दोबारा मेरे सपनों में लौट आई है। जो सुंदर पल मैंने उसके साथ बिताए थे, वे अब मेरे पास नहीं रहे; परंतु उसकी गोद (आगोश) में बैठकर जब मैंने उसकी रेशमी जुल्फ़ों को छुआ था, मेरे हाथों से उसकी पावन खुशबू आज भी आ रही है। उसके रूप को देखकर चाँद-तारे भी लज्जित हो जाते हैं और उसके एक मुखड़े को देखने (दीदार) के लिए वक़्त भी तरस जाता है। वह साक्षात् आसमान से उतर कर कभी-कभी बादलों की घटा पर मुस्कुराती है, और वह अलौकिक छवि मुझे अभी-अभी साफ़ दिखाई दी थी। ऐसा विस्मयकारी अनुभव मेरे जीवन में पहले कभी नहीं हुआ था; उसे देखते ही वक़्त का एक-एक लम्हा वहीं थम गया था।
कविता के अंत में, कवि वैराग्य की पराकाष्ठा को प्रकट करते हुए कहते हैं कि मुझे ऐसा अहसास हो रहा है मानो मैं किसी के प्यार की यादों में पूरी तरह गुम हो चुका हूँ। सावन के पानी की लहरें अब शांत हो चुकी हैं और रात की वह चाँदनी भी दर्द के मारे पिघल गई है। उसका हँसता हुआ चेहरा चौबीसों घंटे मेरी आँखों के सामने रहता है, जिसके सामने मुझे अपना ही जीवित शरीर एक निर्जीव मुर्दे के समान प्रतीत होता है। जहाँ कभी उसके साथ खुशियों की हँसती हुई वादियाँ थीं, उसके जाते ही वे वादियाँ न जाने कहाँ विलीन हो गईं। उसने मेरे दिल को इतनी सादगी और हौले से छुआ था कि जिसे मैंने न जाने कब से कूटनीति के बंधनों में क़ैद करके रखा था, वह पल भर में उसका ग़ुलाम हो गया। मैं अज्ञानता की गहरी नींद में सोया हुआ था, परंतु जैसे ही मेरी आँखें खुलीं, वह जागती आँखों का सुंदर स्वप्न बिखर गया। अब तो इस अभागे प्रेमी को रात में सोने के लिए केवल एक ही झूठा बहाना चाहिए कि नींद आते ही ख़्वाबों में उसका हँसता हुआ चेहरा दोबारा दिखाई दे। मैं जहाँ भी जाता हूँ, मुझे हर एक साये और परछाई में केवल उसी का रूप दिखाई देता है। उसके जाने से जीवन में दुखों की ऐसी धूप छा गई है मानो मेरा सब कुछ लुट गया हो। अब मुख से न कोई आह निकलती है और न कोई वाह; उसके रूप के आगे समूचे ज़माने का वैभव बिल्कुल फीका और तुच्छ लगता है। उसके आने से ही मेरे भीतर जीवन की नई शुरुआत हुई थी, और उसके जाते ही शरीर से प्राण निकल गए। इस संपूर्ण अमर रचना का मुख्य संदेश यही है कि सांसारिक दिखावे, कूटनीति के रिश्तों और धन-दौलत के घमंड का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए। सच्चा प्रेम ईश्वर का ही दूसरा रूप है; प्रियतम (परमात्मा) के विरह की तड़प में तपककर अपने अंतःकरण को निर्मल रखना और उसके चरणों में सर्वस्व न्योछावर करके सादगी से जीना ही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ और अंतिम मोक्ष है