बोल मीठा बोल
1. बड़ी महंगी जिंदगानी रे फिर सस्ती क्यों है जवानी रे,
न रहेगा रूप तन इसे माटी में ना रोल बोल मीठा बोल।
न रहेगा रूप तन इसे माटी में ना रोल बोल मीठा बोल।
2. सोचो ज़रा करो विचार मानव जन्म नहीं हर बार,
अहंकार दे अपने छोड़ साधुबानी बोल बोल मीठा बोल।
अहंकार दे अपने छोड़ साधुबानी बोल बोल मीठा बोल।
3. मौज-ए-फ़िज़ा ये शमा भी तेरे काम न आयेगी,
दो बूंद अश्क से आराम न आयेगी।
गम को दे अपने छोड़ फिर कोई ना हो मन झोल बोल मीठा बोल।
दो बूंद अश्क से आराम न आयेगी।
गम को दे अपने छोड़ फिर कोई ना हो मन झोल बोल मीठा बोल।
4. देख ज़रा हालत अपनी भूली बिसरी यादों जैसी,
कौन क्या है कैसा सबको पैसों से न कर मोल बोल मीठा बोल।
कौन क्या है कैसा सबको पैसों से न कर मोल बोल मीठा बोल।
5. अपना-अपना करता है सपना सब हो जायेगा,
एक चादर चार कन्धों से चार पग देगे छोड़ बोल मीठा बोल।
एक चादर चार कन्धों से चार पग देगे छोड़ बोल मीठा बोल।
6. हिंदू ना मुसलमान कोई नािक्ख ना ईसाई,
रगों में लहू एक रंग की सब मानव धर्म बोल बोल मीठा बोल।
रगों में लहू एक रंग की सब मानव धर्म बोल बोल मीठा बोल।
7. यह दुनिया बेगाना रे इसे छोड़ तुझो अपने घर को जाना रे,
निर्मल वाणी बोल इसे तराजू से तोल बोल मीठा बोल।
निर्मल वाणी बोल इसे तराजू से तोल बोल मीठा बोल।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- जिंदगानी = जीवन / पूरी ज़िन्दगी
- साधुबानी = सज्जनों जैसी साफ़ और मीठी भाषा / मधुर वचन
- मौज-ए-फ़िज़ा = मौसम का आनंद / दुनिया की रंगीनी
- शमा = महफ़िल की रौनक / दीपक
- अश्क = आँसू / नीर
- झोल = विकार / मन का मैल / कपट
- लहू = ख़ून / रक्त
- निर्मल वाणी = पवित्र और मीठी आवाज़
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत गंभीर और आध्यात्मिक कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की नश्वरता, समाज में फैले झूठे भेदभाव और मीठी वाणी के महत्व पर बहुत ही सुंदर प्रकाश डाला है। कवि कहते हैं कि ईश्वर का दिया हुआ यह मानव जीवन बहुत अनमोल और महंगा है, इसलिए अपनी इस जवानी और जीवन के अमूल्य समय को फालतू के प्रपंचों में बर्बाद नहीं करना चाहिए। हमारा यह हाड़-मांस का सुंदर शरीर एक दिन इसी माटी में विलीन हो जाना है, इसलिए मन से सारे घमंड और अहंकार को छोड़कर हमेशा सबके साथ मधुर और मीठे वचन बोलने चाहिए। दुनिया की यह झूठी रंगीनी, मौसम का आनंद और महफ़िल की रौनक अंत समय में किसी के काम नहीं आती और न ही बाद में बहाए गए दो बूंद आँसू इंसान को कोई आराम दे पाते हैं।
इस अत्यंत गंभीर और आध्यात्मिक कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की नश्वरता, समाज में फैले झूठे भेदभाव और मीठी वाणी के महत्व पर बहुत ही सुंदर प्रकाश डाला है। कवि कहते हैं कि ईश्वर का दिया हुआ यह मानव जीवन बहुत अनमोल और महंगा है, इसलिए अपनी इस जवानी और जीवन के अमूल्य समय को फालतू के प्रपंचों में बर्बाद नहीं करना चाहिए। हमारा यह हाड़-मांस का सुंदर शरीर एक दिन इसी माटी में विलीन हो जाना है, इसलिए मन से सारे घमंड और अहंकार को छोड़कर हमेशा सबके साथ मधुर और मीठे वचन बोलने चाहिए। दुनिया की यह झूठी रंगीनी, मौसम का आनंद और महफ़िल की रौनक अंत समय में किसी के काम नहीं आती और न ही बाद में बहाए गए दो बूंद आँसू इंसान को कोई आराम दे पाते हैं।
कवि समाज को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि आज का मनुष्य इतना अंधा हो चुका है कि वह हर रिश्ते और इंसान की कीमत केवल पैसों और दौलत से आंकने लगा है। लोग दिन-रात 'मेरा-मेरा' और 'अपना-अपना' करने के झूठे सपने में खोए हैं, जबकि कड़वा सच यह है कि अंत में केवल सफ़ेद चादर और चार कन्धों के सहारे ही चार कदम की अंतिम यात्रा पूरी होनी है। जाति, धर्म, हिंदू, मुसलमान, सिक्ख या ईसाई के नाम पर आपस में लड़ना पूरी तरह बेमायने है, क्योंकि कुदरत ने हर एक इंसान की रगों में एक ही लाल रंग का लहू (ख़ून) दौड़ाया है। हम सब का असली धर्म केवल मानवता है। यह संसार एक मुसाफ़िरखाने की तरह बेगाना है, जहाँ से एक दिन सबको अपने असली घर यानी मौत के बाद परम सत्ता के पास लौट जाना है। इसलिए अपने मन के मैल और कपट को साफ़ करके, हमेशा अपनी वाणी को सत्य और प्रेम की तराजू में तोलकर ही बोलना चाहिए। इस रचना का मुख्य संदेश यही है कि आपस के कड़वे वाद-विवाद छोड़कर इंसानियत के सादे और पावन मार्ग को गले लगाना ही जीवन का अंतिम सच है