हमारे प्रिय नेता जी


हमारे प्रिय नेता जी
शुरू हो गयी दौरा नेता जी आये हैं अब गाँव में,
लिख गए समस्या ले गए नम्बर तो अपने धाम में।
जाने न लोग जो नीति बतियाते हैं उनसे राजनीति में,
होती है अब सौदाबाज़ी लोगों से गाँव के मझार में।
सुनते हैं वो उसी का जो रहते हैं उनके बायें हाथ में,
अब उन्हें फ़ुर्सत कहाँ वो लगे हैं पैसों के विकास में।
गए जो उनके पास हम कुछ हुआ बात तो आ गये अपने शान में,
देश का पैसा देश के लिए हम गाते हैं केवल मचान में।
मीठी है उनकी बात क्योंकि खाते हैं मीठा पान अम्बानी के दुकान में,
नज़र न मिलाते हमसे वो है जो गरीबी हमारे पास में।
राजा का ना प्रतिनिधि करते दिये हैं जो वोट लगे हैं उन्ही के विकास में,
अपनी सेवा पहले करते भूखे मरे या जाये जनता भाड़ में।
आज जो मिली सीट छोड़ फ़िकर सीट बचाना है अगले चुनाव में,
अगले चुनाव को देखकर वो काम करते पैसा जुटाते जनता के आड़ में।

काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • दौरा = चुनावी भ्रमण / क्षेत्र का चक्कर लगाना
  • मझार = बीच में / मंझधार / राजनीति का चक्रव्यूह
  • मचान = ऊँचा स्थान / मंच / दिखावे का ढांचा
  • आड़ में = ओट में / बहाने से / छिपाकर
  • फ़िकर = चिंता / परवाह
  • प्रतिनिधि = जनता की आवाज़ उठाने वाला / नुमाइंदा

राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह कविता आधुनिक लोकतंत्र के भीतर पनप रहे 'क्रोनी कैपिटलिज्म' (Crony Capitalism) यानी नेता-पूंजीपति सांठगांठ के कड़वे सच को उजागर करती है। जब कवि पंक्तियों में लिखते हैं कि "खाते हैं मीठा पान अम्बानी के दुकान में", तो यह सीधे तौर पर उस आर्थिक कूटनीति की ओर इशारा है जहां नीतियां आम जनता की भलाई के लिए नहीं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट घरानों और उद्योगपतियों के मुनाफे को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। आज की राजनीति केवल सेवा का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह एक अरबों रुपये का चुनावी उद्योग (Electoral Industry) बन चुकी है। चुनाव जीतने के लिए जिस भारी-भरकम धन की आवश्यकता होती है, उसे जुटाने के लिए राजनेता पर्दे के पीछे से बड़े पूंजीपतियों से हाथ मिलाते हैं और सत्ता में आने के बाद देश के प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों को उन्हीं के हाथों में सौंप देते हैं।


इस रचना में ग्रामीण समाज के उस मर्म और छलावे को भी बहुत सजीवता से दिखाया गया है, जहां "गरीबी हमारे पास में" होने के कारण नेता जी जनता से नजरें चुराने लगते हैं। लोकतंत्र में वोट डालते समय देश का सबसे गरीब और वंचित नागरिक लाइनों में सबसे आगे खड़ा होता है, लेकिन जब विकास के फायदों को बांटने की बात आती है, तो उसे सबसे पीछे धकेल दिया जाता है। चुनाव खत्म होते ही नेताओं की प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल जाती हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य जनसेवा नहीं, बल्कि "अगले चुनाव को देखकर पैसा जुटाना" और अपनी सत्ता की सीट को सुरक्षित रखना बन जाता है। इस प्रक्रिया में आम जनता का बुनियादी विकास, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे जरूरी मुद्दे पूरी तरह से ओझल हो जाते हैं।


यह ब्लॉग पोस्ट पाठकों को यह गंभीर संदेश देती है कि केवल पांच साल में एक बार मतदान कर देने से नागरिकों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। लोकतंत्र को जीवित और पारदर्शी बनाए रखने के लिए जनता को अपने प्रतिनिधियों से लगातार उनके कार्यों का हिसाब मांगना होगा। जब तक मतदाता मुफ्त के चुनावी वादों और झूठे भाषणों के छलावे को समझकर नीतिगत मुद्दों (Policy-based issues) पर जवाबदेही तय नहीं करेंगे, तब तक देश की बागडोर इसी तरह स्वार्थी तत्वों के हाथों में रहेगी।


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