मशाल जलनी चाहिए
1. खुदा या भगवान नही तू भला इंसान सही,
कोई शिकवा या गिला ये ताप जलनी चाहिए।
कोई शिकवा या गिला ये ताप जलनी चाहिए।
2. तेरे लहू से नही तो मेरे लहू से सही,
हर मंजर में झूठी पहचान जलनी चाहिए।
हर मंजर में झूठी पहचान जलनी चाहिए।
3. महलों की दिवारों से नफ़रत की आंधी उठे भले ही,
झोपड़ियों के हक की वो आज तान जलनी चाहिए।
झोपड़ियों के हक की वो आज तान जलनी चाहिए।
4. मेरी धरम से नही सब धर्मों से ही सही,
भाई से हो भाई चारा ऐसी मिसाल बननी चाहिए।
भाई से हो भाई चारा ऐसी मिसाल बननी चाहिए।
5. बिका हुआ हो चाहे यहाँ इंसाफ का तराजू भी,
अदालत के उस पाखंड का आज मान जलनी चाहिए।
अदालत के उस पाखंड का आज मान जलनी चाहिए।
6. जुल्म की लाठियों से डरेगी न अब ये जवानी,
सत्ताओं के घमंड का वो सारा गुमान जलनी चाहिए।
सत्ताओं के घमंड का वो सारा गुमान जलनी चाहिए।
7. तू अपने लिये ना जी अपनों के लिये ही सही,
हम मरे या जिये ये मशाल जलनी चाहिए।
हम मरे या जिये ये मशाल जलनी चाहिए।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- मशाल = क्रांति का दीपक / चेतना का प्रकाश
- शिकवा या गिला = शिकायत या मनमुटाव
- ताप = दुखों का संताप / कष्टों की आग / बुराई
- लहू = ख़ून / रक्त
- मंजर = नज़ारा / दृश्य / समाज की स्थिति
- भाईचारा = आपस का प्रेम / सद्भाव
- मिसाल = उदाहरण / नज़ीर
- गुमान = झूठा अहंकार / घमंड
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत ओजस्वी और क्रांतिकारी कविता के माध्यम से कवि ने समाज में फैले पाखंड, आपसी भेदभाव और वैचारिक गुलामी को मिटाकर मानवता की एक नई अलख जगाने का बुलंद आह्वान किया है। कवि कहते हैं कि यदि तू खुद को बहुत बड़ा भगवान या खुदा नहीं मान सकता, तो कोई बात नहीं, कम से कम एक अच्छा और सच्चा इंसान बनना ही सबसे बड़ी सार्थकता है। हमारे मन में जो भी एक-दूसरे के प्रति शिकवा-शिकायत या कड़वाहट का संताप (ताप) सुलग रहा है, उसे पूरी तरह जलकर भस्म हो जाना चाहिए। समाज की इस सोई हुई व्यवस्था को जगाने के लिए चाहे तेरे ख़ून (लहू) का बलिदान हो या मेरे ख़ून का, यह मायने नहीं रखता। सबसे ज़रूरी बात यह है कि आज के इस युग में जो लोग चेहरे पर मुखौटा लगाकर घूम रहे हैं, समाज के हर एक दृश्य (मंज़र) से वह झूठी पहचान और पाखंड पूरी तरह जलकर ख़त्म होना चाहिए।
इस अत्यंत ओजस्वी और क्रांतिकारी कविता के माध्यम से कवि ने समाज में फैले पाखंड, आपसी भेदभाव और वैचारिक गुलामी को मिटाकर मानवता की एक नई अलख जगाने का बुलंद आह्वान किया है। कवि कहते हैं कि यदि तू खुद को बहुत बड़ा भगवान या खुदा नहीं मान सकता, तो कोई बात नहीं, कम से कम एक अच्छा और सच्चा इंसान बनना ही सबसे बड़ी सार्थकता है। हमारे मन में जो भी एक-दूसरे के प्रति शिकवा-शिकायत या कड़वाहट का संताप (ताप) सुलग रहा है, उसे पूरी तरह जलकर भस्म हो जाना चाहिए। समाज की इस सोई हुई व्यवस्था को जगाने के लिए चाहे तेरे ख़ून (लहू) का बलिदान हो या मेरे ख़ून का, यह मायने नहीं रखता। सबसे ज़रूरी बात यह है कि आज के इस युग में जो लोग चेहरे पर मुखौटा लगाकर घूम रहे हैं, समाज के हर एक दृश्य (मंज़र) से वह झूठी पहचान और पाखंड पूरी तरह जलकर ख़त्म होना चाहिए।
कवि धार्मिक और सामाजिक संकीर्णता पर गहरी चोट करते हुए कहते हैं कि बात केवल मेरे अकेले के धर्म की नहीं है, बल्कि दुनिया के सभी धर्मों का यही असली निचोड़ होना चाहिए कि भाई का भाई के साथ सच्चा प्रेम और भाईचारा स्थापित हो। महलों में बैठी कूटनीतिक सत्ताएँ चाहे नफ़रत की कितनी भी आंधियाँ चला लें, लेकिन आज देश की शोषित झोपड़ियों के हक की आवाज़ बुलंद होनी चाहिए। जब अदालतों की चौखट और कानून की ज़ंजीरें बिकाऊ हो जाएँ, तब व्यवस्था के उस पाखंड का घमंड टूटना बेहद ज़रूरी है। आज की युवा पीढ़ी दमन की लाठियों और जेल भेजने की धमकियों से डरने वाली नहीं है, बल्कि वह सत्ताओं के इस झूठे अहंकार (गुमान) को जड़ से मिटाने का हौसला रखती है। हमें पूरे जहान के सामने सामाजिक एकता का एक ऐसा अनूठा उदाहरण पेश करना चाहिए जिसे देखकर नफ़रत की दीवारें बिखर जाएँ।
आज का स्वार्थी मनुष्य केवल अपने निजी सुख और स्वार्थ के लिए जी रहा है। कवि उसे झकझोरते हुए संदेश देते हैं कि खुद के लिए जीना भी कोई जीना है, जीना है तो अपने समाज और बेबस अपनों के हक के लिए सीना तानकर जीना सीखो। हम इस संघर्ष में चाहें जीवित रहें या न रहें, लेकिन समाज में चेतना, न्याय और क्रांति की यह पावन मशाल कभी बुझनी नहीं चाहिए। इस रचना का मुख्य संदेश यही है कि अपनी सोचने की तार्किक क्षमता को भीड़ के पैरों तले रौंदने से बचाना और मानवता के स्वाभिमान के लिए हमेशा डटे रहना ही इस जीवन का अंतिम मक़ाम है ।