जय हो जय हो तेरी जय हो

                                                                                           

जय हो जय हो तेरी जय हो
जय हो, जय हो, तेरी जय हो,
जय हो, जय हो, तेरी जय हो।
ये नदिया, ये दरिया सब तेरी ही काया,
हर क्षण तुझको देखा, हर क्षण तुझको पाया।
जय हो... ”
ये गुलशन, ये डालियाँ सबको हैं भाया,
इस सुंदर बगिया को तूने ही सजाया।
जय हो... ”
ये सूरज का चमकना, ये चिड़ियों का गाना,
इस सुंदर छटा को तूने ही बनाया।
जय हो... ”
ये तारों की खूबसूरत, ये चाँदनी नज़ारा,
इस रंगीन दुनिया को तूने ही संवारा।
जय हो... ”
ये सांसों का चलना, ये दिलों का धड़कना,
इस एहसास को तूने कैसे रच डाला।
जय हो... ”

काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • काया = शरीर / कुदरत का रूप / अस्तित्व
  • क्षण = पल / समय का छोटा हिस्सा
  • गुलशन = बाग़ / बगीचा / सुंदर उपवन
  • बगिया = छोटा बगीचा / संसार रूपी उपवन
  • छटा = सुंदरता / नज़ारा / दृश्य
  • एहसास = महसूस होना / रूहानी अनुभव

📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस रूहानी और दार्शनिक कविता के माध्यम से कवि ने उस परमपिता परमेश्वर, अलौकिक शक्ति और कुदरत के प्रति अपनी अगाध कृतज्ञता और आस्था को बहुत ही पावन शब्दों में पिरोया है। कवि का मानना है कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी गतिमान है, वह सब उसी परम सत्ता का ही बनाया हुआ एक बेमिसाल और सुंदर कौतूहल है। नदियों का कल-कल बहना, दरिया का असीम विस्तार, बाग़-बगीचों में खिली हुई सुंदर डालियाँ और महकता हुआ गुलशन—ये सब उस ईश्वर की अनूठी कलाकारी के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। जब हम अपनी अंतरात्मा की आँखें खोलकर इस जहान की अद्भुत छटा को देखते हैं, तो सुबह सूरज का पूरे तेज के साथ चमकना और भोर के समय चिड़ियों का मधुर गान सीधे हमारे अंतर्मन को एक असीम सुकूँ से भर देता है।
रात के सन्नाटे में आकाश में टिमटिमाते तारों की अद्भुत खूबसूरत महफ़िल और चारों तरफ बिखरी चाँदनी का सुंदर नज़ारा इस रंगीन दुनिया के अस्तित्व को और भी ज़्यादा रूहानी बना देता है। कवि जीवन के सबसे कड़वे और शाश्वत सत्य को उघाड़ते हुए कहते हैं कि हमारे भीतर चलने वाली एक-एक सांस का आना-जाना और सीने में दिल का धड़कना भी महज़ एक जैविक क्रिया नहीं है, बल्कि यह उस विधाता का दिया हुआ सबसे पावन उपहार है, जिसे मनुष्य अपने झूठे अहंकार, अना और तकब्बुर के नशे में अंधा होकर पूरी तरह विस्मृत कर बैठता है। इस रचना का मुख्य संदेश यही है कि आधुनिक युग की इस अंधी और मशीनी दौड़ से थोड़ा ठहरकर, मनुष्य को कुदरत के इस बेमिसाल एहसास को पहचानना चाहिए। अपनी खुदी का अक्स देखना और ईश्वर के इस हुस्न-ए-अमल के प्रति हर क्षण कृतज्ञ रहना ही जीवन का अंतिम मक़ाम और आत्मबोध है 


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