चार लाइन इंदिरा के नाम
इतिहास अब रचेगी वो जब १९ जनवरी १९६६ में पीएम बनी
1. बेटा है की बेटी कुछ समझ में न आये मोती,
बेटा समझा वर मुबारक अली के जीने की सांस हो गयी छोटी।
एक तरफ विश्वयुद्ध की इबारत खड़ी थी,
दूसरी तरफ दूर देश में सफल हो रही थी रूस की क्रांति।
अपने देश में राजनीतिक क्षितिज पर गांधी का सूरज चमक रही थी,
१९ नवम्बर १९१७ को जन्म ली मोती की नन्ही पोती।
बेटा समझा वर मुबारक अली के जीने की सांस हो गयी छोटी।
एक तरफ विश्वयुद्ध की इबारत खड़ी थी,
दूसरी तरफ दूर देश में सफल हो रही थी रूस की क्रांति।
अपने देश में राजनीतिक क्षितिज पर गांधी का सूरज चमक रही थी,
१९ नवम्बर १९१७ को जन्म ली मोती की नन्ही पोती।
2. बचपन होती है क्या नया शायद उसने जाना नहीं,
माँ बाप जब हों जेल में वह रह जाती घर में अकेली।
सब छोड़ दिया मोती ने इंदु को तोड़ दिया मोती ने,
६ फरवरी १९३१ क्या कम था,
जो २८ फरवरी १९३६ का दिन आया।
और उस भगवान ने उसकी प्यारी माँ को दुनिया से उठा लाया।
माँ बाप जब हों जेल में वह रह जाती घर में अकेली।
सब छोड़ दिया मोती ने इंदु को तोड़ दिया मोती ने,
६ फरवरी १९३१ क्या कम था,
जो २८ फरवरी १९३६ का दिन आया।
और उस भगवान ने उसकी प्यारी माँ को दुनिया से उठा लाया।
3. जीवन की गाड़ी आगे बढ़ी २६ मार्च १९४२ में उसकी शादी पड़ी,
२० अगस्त १९४४ में इंदिरा ने एक रत्न राजीव को जन्म दी।
खुशियों से दामन भरी प्रसन्नता में डूब रही,
१४ दिसम्बर १९४६ में संजय ने अवतार ली।
बाल किलकारियों के आगे सूरज की लाली भी फीकी पड़ी,
फिर भी देश सेवा में दिन रात लगी रही।
२० अगस्त १९४४ में इंदिरा ने एक रत्न राजीव को जन्म दी।
खुशियों से दामन भरी प्रसन्नता में डूब रही,
१४ दिसम्बर १९४६ में संजय ने अवतार ली।
बाल किलकारियों के आगे सूरज की लाली भी फीकी पड़ी,
फिर भी देश सेवा में दिन रात लगी रही।
4. कशमकश बढ़ने लगी तो धरती भी रो पड़ी,
३० जनवरी १९४८ को धर्म पिता गांधी भी छोड़ चले।
पत्थर भी रो रहे अब यही सोच रही सम्भलना है देश के लिए,
जिंदगी के कदम बढ़ रहे सफलता कदम चूम रहे।
पता नहीं मुझे भी ऊपर वाले क्या खिलवाड़ कर रहे,
और ८ सितम्बर १९६० पति फिरोज़ भी जीवन लीला समाप्त करके जा रहे।
३० जनवरी १९४८ को धर्म पिता गांधी भी छोड़ चले।
पत्थर भी रो रहे अब यही सोच रही सम्भलना है देश के लिए,
जिंदगी के कदम बढ़ रहे सफलता कदम चूम रहे।
पता नहीं मुझे भी ऊपर वाले क्या खिलवाड़ कर रहे,
और ८ सितम्बर १९६० पति फिरोज़ भी जीवन लीला समाप्त करके जा रहे।
5. सिने में ज्वाला जल रही पत्थर भी अब पिघल रही,
जीना है किसके लिए इंदिरा अब सोच रही।
कदम अब डगमगा रहा कुछ भी समझ न आ रहा,
दो बेटा और पिता के सहारे अब भी जीवन कट रही।
क्या पता मौत की देवी नेहरू की अंतिम सांस गिन रही,
२७ मई १९६४ के प्यारे पिता नेहरू की अर्थी सज रही।
जीना है किसके लिए इंदिरा अब सोच रही।
कदम अब डगमगा रहा कुछ भी समझ न आ रहा,
दो बेटा और पिता के सहारे अब भी जीवन कट रही।
क्या पता मौत की देवी नेहरू की अंतिम सांस गिन रही,
२७ मई १९६४ के प्यारे पिता नेहरू की अर्थी सज रही।
6. आखों से सब कुछ देख रही पर मुख से कभी उफ़ ना कही,
वह साधारण नहीं शेरनी सही तभी तो सब कुछ झेल रही।
भगवान से वह लड़ पड़ी अग्नि परीक्षा देने के लिए ज़िद पर अड़ी,
संघर्ष का पतवार लेकर आग की नदी में कूद पड़ी।
इस रंग मंच के नाटक में अहम भूमिका निभा रही,
इतिहास अब रच दी जब १९ जनवरी १९६६ में पीएम बनी।
वह साधारण नहीं शेरनी सही तभी तो सब कुछ झेल रही।
भगवान से वह लड़ पड़ी अग्नि परीक्षा देने के लिए ज़िद पर अड़ी,
संघर्ष का पतवार लेकर आग की नदी में कूद पड़ी।
इस रंग मंच के नाटक में अहम भूमिका निभा रही,
इतिहास अब रच दी जब १९ जनवरी १९६६ में पीएम बनी।
7. उस समय दिसम्बर १९७१ की घटना भी याद आ पड़ी,
न चाहते हुए भी भारत पाकिस्तान से युद्ध छिड़ी,
और इस चौदह दिन के संग्राम में इंदिरा युद्ध जीत गयी।
सदमा उसको तब लगी आहत होकर गिर पड़ी,
२३ जून १९८० में संजय ने विदा ली बहू मेनका घर से निकल पड़ी।
दिल होता तो रोना आता पर दिल आँखें पत्थर बन गयी।
न चाहते हुए भी भारत पाकिस्तान से युद्ध छिड़ी,
और इस चौदह दिन के संग्राम में इंदिरा युद्ध जीत गयी।
सदमा उसको तब लगी आहत होकर गिर पड़ी,
२३ जून १९८० में संजय ने विदा ली बहू मेनका घर से निकल पड़ी।
दिल होता तो रोना आता पर दिल आँखें पत्थर बन गयी।
8. जाते-जाते उसने हम दो हमारे दो का नारा छोड़ा,
प्यारे दादा की लाड़ली पोती ने आनंद भवन को देश के लिए छोड़ा।
पर सच ये है कि उसका साथ बारी-बारी से सबने छोड़ा,
जीवन ने तन्हाई के साथ उसको गम दिया थोड़ा-थोड़ा।
प्यार करती थी जिस देश को ३१ अक्टूबर १९८४ को उसने छोड़ा,
सच में काश वह बुधवार का अभागा दिन आया ही न होता।
प्यारे दादा की लाड़ली पोती ने आनंद भवन को देश के लिए छोड़ा।
पर सच ये है कि उसका साथ बारी-बारी से सबने छोड़ा,
जीवन ने तन्हाई के साथ उसको गम दिया थोड़ा-थोड़ा।
प्यार करती थी जिस देश को ३१ अक्टूबर १९८४ को उसने छोड़ा,
सच में काश वह बुधवार का अभागा दिन आया ही न होता।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- इबारत = लिखावट / इतिहास का पन्ना / लेख
- क्षितिज = वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिलते प्रतीत होते हैं
- दामन = आंचल / झोली
- कशमकश = मानसिक उलझन / खींचतान / दुविधा
- जीवन लीला = जीवन की कहानी / मृत्यु होना
- संग्राम = महा-युद्ध / भारी लड़ाई
- आहत = चोट खाया हुआ / दुखी / ज़ख्मी
- अभागा = बदकिस्मत / दुर्भाग्यपूर्ण
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत विशाल, मर्मस्पर्शी और ऐतिहासिक महा-कविता के माध्यम से कवि ने भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (इंदु) के व्यक्तिगत दुखों, पारिवारिक त्रासदियों और उनके अदम्य राजनैतिक साहस के पूरे सफरनामे को ८ गंभीर पैराग्राफों में उकेरा है। कविता की शुरुआत उनके जन्म के समय की वैश्विक परिस्थितियों से होती है। सन १९१७ में जब पूरी दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका झेल रही थी और रूस में महान क्रांति सफल हो रही थी, ठीक उसी समय भारत के राजनीतिक पटल पर महात्मा गांधी का उदय हो रहा था। १९ नवंबर १९१७ को पंडित मोतीलाल नेहरू के घर उनकी नन्हीं पोती इंदिरा का जन्म हुआ। राजनीति में सक्रिय नेहरू परिवार के कारण इंदिरा का बचपन आम बच्चों की तरह बेफ़िक्र नहीं रहा; माता-पिता के बार-बार जेल जाने के कारण उन्होंने बचपन की तन्हाई को बहुत करीब से देखा। १९३१ में दादा मोतीलाल नेहरू और १९३६ में अपनी प्रिय माँ कमला नेहरू के असमय निधन ने उनके कोमल मन को झकझोर कर रख दिया।
इस अत्यंत विशाल, मर्मस्पर्शी और ऐतिहासिक महा-कविता के माध्यम से कवि ने भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (इंदु) के व्यक्तिगत दुखों, पारिवारिक त्रासदियों और उनके अदम्य राजनैतिक साहस के पूरे सफरनामे को ८ गंभीर पैराग्राफों में उकेरा है। कविता की शुरुआत उनके जन्म के समय की वैश्विक परिस्थितियों से होती है। सन १९१७ में जब पूरी दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका झेल रही थी और रूस में महान क्रांति सफल हो रही थी, ठीक उसी समय भारत के राजनीतिक पटल पर महात्मा गांधी का उदय हो रहा था। १९ नवंबर १९१७ को पंडित मोतीलाल नेहरू के घर उनकी नन्हीं पोती इंदिरा का जन्म हुआ। राजनीति में सक्रिय नेहरू परिवार के कारण इंदिरा का बचपन आम बच्चों की तरह बेफ़िक्र नहीं रहा; माता-पिता के बार-बार जेल जाने के कारण उन्होंने बचपन की तन्हाई को बहुत करीब से देखा। १९३१ में दादा मोतीलाल नेहरू और १९३६ में अपनी प्रिय माँ कमला नेहरू के असमय निधन ने उनके कोमल मन को झकझोर कर रख दिया।
जीवन के दूसरे पड़ाव में जब २६ मार्च १९४२ को फिरोज़ गांधी के साथ उनका विवाह हुआ, तो जीवन में खुशियों की नई बहार आई। १९४४ में राजीव गांधी और १९४६ में संजय गांधी के जन्म ने आनंद भवन को बाल किलकारियों से गुंजायमान कर दिया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। ३० जनवरी १९४८ को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या ने पूरे देश के साथ इंदिरा को भी अनाथ कर दिया। दुखों का पहाड़ यहीं नहीं रुका; ८ सितंबर १९६० को उनके पति फिरोज़ गांधी भी उन्हें अकेला छोड़कर चले गए। सीने में दुखों की ज्वाला लिए इंदिरा अभी संभल ही रही थीं कि २७ मई १९६४ को उनके मार्गदर्शक और पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू का साया भी उनके सिर से उठ गया। अपने बेटों के सहारे जीवन काट रही इंदिरा ने इन तमाम व्यक्तिगत त्रासदियों के बाद भी मुख से कभी 'उफ़' तक नहीं कहा। वे एक साधारण महिला नहीं, बल्कि एक फौलादी शेरनी की तरह हर संघर्ष को झेलती रहीं।
१९ जनवरी १९६६ को जब वे देश की प्रधानमंत्री बनीं, तो उन्होंने इतिहास की धारा को ही मोड़ दिया। दिसंबर १९७१ में जब पाकिस्तान ने भारत पर संकट खड़ा किया, तो इंदिरा ने एक कुशल सेनापति की तरह महज़ १४ दिनों के संग्राम में पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और बांग्लादेश को आज़ाद कराकर एक नया इतिहास रच डाला। परंतु नियति का क्रूर खेल जारी रहा; २३ जून १९८० को एक विमान दुर्घटना में उनके छोटे बेटे संजय गांधी की असामयिक मृत्यु ने उनकी आँखों को पूरी तरह पत्थर बना दिया। जीवन ने उन्हें कदम-कदम पर अकेलेपन और तन्हाई का कड़वा गम दिया। देश की एकता के लिए काम करते हुए अंततः ३१ अक्टूबर १९८४ के उस काले और दुर्भाग्यपूर्ण बुधवार के दिन उन्होंने इस देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इस महान रचना का मुख्य संदेश यही है कि एक सच्चा नेता और कर्मवीर वही है जो अपने व्यक्तिगत दुखों के विशाल पहाड़ को अपने भीतर दफ़्न करके, देश की सुरक्षा और जनसेवा के लिए अपनी अंतिम सांस तक सीना तानकर खड़ा रहे। इंदिरा जी का यह त्यागमयी जीवन आज भी हर नागरिक के भीतर साहस और राष्ट्रप्रेम की एक अमर मशाल जलाता है