चलना है


चलना है
चलना है मुझे चलना है मिलो मुझे चलना
1. चलता है सूर्य जैसे अपने साथ किरण लेकर,
नभ मण्डल में तरंग लेकर अपने साथ नव प्रचंड लेकर।
जैसे रोज़ नया पाठ पढ़ाता मंद-मंद बढ़ता जाता,
नव विहंग सब कैसे इतराते इसको देख सब झूमते गाते।
चलना है मुझे चलना है मिलो मुझे चलना।
2. चलती है जैसे नदियां अपने साथ प्रवाह लेकर,
धीरे चले या होले  अपने साथ शीतल मंद मुस्कान लिये।
चल रही कई वर्षों से जैसे सागर से मिलन न हुयी हो कई जन्मो से,
नदियों की एक आस है जैसे सागर उनका प्यास है।
चलना है मुझे चलना है मिलो मुझे चलना।
3. चलते हैं जैसे प्रेम के पथिक अपने साथ दो बात लिए,
त्याग और बलिदान के सिवा ये कुछ न जाने।
मस्ती में झूमते गाते और प्रेम की भाषा सबको सिखलाते,
प्रेम के डोर में बंधे धरती चाँद सितारे चले आ रहे शादियों से।
चलना है मुझे चलना है मिलो मुझे चलना।
4. राहों के इन काँटों से घबरा कर तू रुक मत जाना,
मुश्किलें तो इम्तिहान हैं इनसे डर कर शीश झुकाना।
हौसलों के तरकश में तू जीत का एक तीर सजा ले,
हर अँधेरी रात को चीर कर तू नया सवेरा ला दे।
चलना है मुझे चलना है मिलो मुझे चलना।
5. जब तक सीने में सांसें हैं कदम थमने न पाएँ,
मंज़िलें खुद झुक जाएँगी चाहे जितने तूफ़ान आएँ।
हार को भी अपनी मेहनत से तू जीत बना कर दिखला दे,
कर्मवीर की इस पावन माटी पर अपनी साख बना दे।
चलना है मुझे चलना है मिलो मुझे चलना।
6. भटक रहे है हम इधर-उधर आशा की विश्वास लेकर,
तड़प रहे हम कई जन्मों से नदियाँ सी प्यास लेकर।
जीवन को हम सुखद सुन्दर और स्वच्छ बनाये,
आओ हम मिलकर चले साथ में यह संसार लेकर।
चलना है मुझे चलना है मिलो मुझे चलना।

काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • नभ मण्डल = आकाश / ब्रह्मांड / गगन
  • प्रचंड = अत्यधिक तेज़ / ऊर्जा / प्रताप
  • नव विहंग = नए पक्षी / गगन के परिंदे
  • प्रवाह = बहाव / रफ़्तार / गति
  • पथिक = राही / मुसाफ़िर / यात्री
  • स्वच्छ = साफ़-सुथरा / पवित्र / निर्मल
  • तरकश = तीर रखने का थैला / साधन
  • साख = इज़्ज़त / सम्मान / प्रतिष्ठा

📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत दार्शनिक, गहरी और प्रेरणा से भरी महा-कविता के माध्यम से कवि ने कुदरत के विभिन्न रूपों का उदाहरण देते हुए मानव जीवन को निरंतर कर्मशील रहने और आगे बढ़ते रहने का एक महान संदेश दिया है। कवि कहते हैं कि इस चराचर जगत में ठहरना किसी भी तत्व की नीति नहीं है; जीवन का दूसरा नाम ही गतिशीलता है। जैसे भगवान सूर्य हर सुबह अपने साथ चमचमाती किरणों का उपहार लेकर निकलते हैं और पूरे आकाश (नभ मण्डल) में अपने प्रचंड तेज और ऊर्जा की तरंग बिखेरते हैं, वैसे ही मनुष्य को भी प्रतिदिन एक नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सूर्य हमें रोज़ मंद-मंद गति से आगे बढ़ते हुए जीवन का एक नया पाठ पढ़ाता है, जिसे देखकर आकाश के नए पक्षी (नव विहंग) भी खुशी से चहकने और झूमने लगते हैं। इसी तरह, नदियाँ भी अपने साथ एक निरंतर प्रवाह और शीतलता की मंद मुस्कान लेकर बहती चली जाती हैं। सदियों से बहती इन नदियों का एकमात्र लक्ष्य सागर से मिलना है, मानो सागर ही उनकी जन्मों की प्यास हो।
जीवन की इस कठिन डगर पर प्रेम के राही (पथिक) भी निश्छल मन से केवल त्याग और बलिदान के पावन मार्ग को जानते हैं। वे मस्ती में झूमते हुए पूरे समाज को नफ़रत भुलाकर केवल प्रेम की सादी भाषा सिखाते हैं। यह संपूर्ण ब्रह्मांड, धरती, चाँद और सितारे भी महज़ भौतिक पिंड नहीं हैं, बल्कि ये सब भी ईश्वर के बनाए प्रेम की अटूट डोर में बंधकर सदियों और शादियों से निरंतर अपनी धुरी पर चले जा रहे हैं। कवि जीवन के संघर्षों को उघाड़ते हुए बड़ी सीख देते हैं कि राह में आने वाली बाधाओं और काँटों से घबराकर इंसान को कभी रुकना नहीं चाहिए, बल्कि अपने हौसले के तरकश को हमेशा मज़बूत रखना चाहिए। जब तक हमारे सीने में अंतिम सांस चल रही है, तब तक हमारे कदम थमने नहीं चाहिए; क्योंकि जब मेहनत कड़क होती है, तो मंज़िलें खुद-ब-खुद घुटने टेक देती हैं।
आज का मनुष्य भी अपने भीतर एक सुंदर आशा और अटूट विश्वास लेकर इस जहान में इधर-उधर भटक रहा है। हमारे अंतर्मन में कई जन्मों की एक गहरी प्यास छिपकर सुलग रही है। इस रचना का मुख्य संदेश यही है कि हमें अपनी सभी कमियों और दुखों को भुलाकर इस जीवन को सुंदर, सुखद और पवित्र (स्वच्छ) बनाना होगा। आपस के सारे वाद-विवाद छोड़कर, पूरे संसार को एक परिवार मानकर सबको एक साथ मिलकर प्रेम के मार्ग पर कदम बढ़ाना होगा। रुकना मौत की निशानी है, और निरंतर मीठे वचनों के साथ कर्म के पथ पर चलते रहना ही जीवन का अंतिम सच है 


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