सुंदर नारी


सुंदर नारी
1. चंचल चपला चुनरी में बा नूर, नज़र नूरानी नगमा,
नगमा में ना कारी बदरिया सर केशुकी लटकाय खड़ी है।
2. अंग फूटे महुआ के जस अधरों से बा टपकता रस,
माथे पे टमटम टिकुली, जस चमकता चन्द खड़ी है।
3. नयना कजरा हिरनी नज़रा, उसमें था एक समुन्दर,
भ्रुकुटि ऐसी धनुष के जैसी, देख तीर कमान चली है।
4. नाक के नथुनिया, कानन नगज़ड़ा पहिरनिया,
ले उमटी साधु वाणी, गरवा में मोतियन माला पड़ी है।
5. स्याम तन भरा यौवन और दातों को टीस रहा मन,
मदमस्त करने वाली जवानी, मदहोश सी अंगड़ाई है।
6. नाभि में नथुनिया, कमरबंद करधनिया, छुतावेली धनिया,
चलके जड़से सोडम रस, पाँव के पैजनिया छनकाय खड़ी है।
7. चन्द सी चमक हर एक अगन, टकटक नयना सरमाय चले,
धम-धम के पाँव चले नारी, मादकता देखा रहे हैं।
8. बिन बारिश के भीगा बदन, सरपट केशुकी झटकाय चले,
काली हुआ मैं बावरी मो खड़े रहूँ, संग प्राण चले हैं।
9. ज्ञानी का ज्ञान छूटा, कामी का काम, ऐसे मुसकाय चले,
सुध-बुध खोकर कवी भी बेवड़ा ख़यालो में पड़ा है।
10. मन प्रीत बने सब सोच रहे, अब साथ रहे मोरे रानी,
सबकी अपनी बात करो ना, पीछे उसके ख़ुदा भी पड़ा है।
सुंदर है वह नारी नूरानी, तब से आगे पड़ी है,
देखा उसे एक बार बस, तब से कागज़ में पड़ी है।

काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • चपला = बिजली / चंचल / बिजली जैसी चमक
  • केशुकी = सुंदर और लंबे बाल / केश राशि
  • महुआ = एक मीठा और नशीला प्राकृतिक फूल / रसदार फल
  • भ्रुकुटि = भौहें / आईब्रो
  • गरवा = गला / कंठ
  • पैजनिया = पैरों के घुँघरू / पायल
  • केशुकी झटकाय = बालों को लहराना / झटकना
  • सुध-बुध = होश-हवास / चेतना

📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत रसपूर्ण, समृद्ध और सजीव प्राकृतिक चित्रण से सराबोर महा-कविता के माध्यम से कवि ने भारतीय लोक-संस्कृति में रची-बसी एक पारंपरिक नारी के अनुपम सौंदर्य, उसके नशीले नैन-नक्श, पारंपरिक आभूषणों और उसके मर्यादित वैभव का बहुत ही मनमोहक और जादुई वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि जब वह सुंदर नारी बिजली (चपला) जैसी चंचल और सुनहरी गोटा लगी चुनरी ओढ़कर निकलती है, तो उसके चेहरे का नूर किसी रूहानी गीत (नगमा) की तरह चारों तरफ बिखर जाता है। उसके सिर पर लहराते हुए लंबे-लंबे काले बाल (केशुकी) ऐसे प्रतीत होते हैं मानो सावन के महीने में आसमान में कोई घनी काली बदरी छा गई हो। उसके अधरों (होठों) की मिठास ऐसी है मानो जंगलों में पककर फूटने वाले महुआ के फूलों से कोई मीठा और नशीला रस टपक रहा हो। उसके मस्तक (माथे) पर सजी हुई वह गोल चमकीली बिंदी (टिकुली) अँधेरी रात में चमकते हुए पूनम के चाँद की तरह मद्धम-मद्धम रोशनी बिखेर रही है। उसकी कजरारी आँखें किसी चंचल हिरनी की तरह मासूम और गहरी हैं, मानो उन नयनों के भीतर भावनाओं का एक पूरा असीम समंदर समाया हुआ हो। उसकी झुकी हुई भौहें (भ्रुकुटि) किसी फौलादी धनुष की तरह कसी हुई हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो कामदेव के तरकश से कोई तेज़ तीर-कमान छूटने के लिए तैयार खड़ा हो।
नारी के पारंपरिक श्रृंगार का सुंदर वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि उसने अपनी नाक में पावन नथुनिया और कानों में रत्नों से जड़े हुए (नगज़ड़ा) झुमके पहन रखे हैं, जिनकी सादगी को देखकर बड़े-बड़े साधु-संतों की वाणी भी उसकी सराहना करने के लिए उमड़ पड़ती है। उसके गोरे गले (गरवा) में पड़ी मोतियों की वह पावन माला उसके सौंदर्य को चार चाँद लगा देती है। उसके सांवले (स्याम) तन पर खिली यह मदमस्त जवानी जब एक मीठी सी अंगड़ाई लेती है, तो देखने वाले का मन पूरी तरह सम्मोहित हो जाता है। उसकी पतली कमर पर सजा हुआ वह पारंपरिक कमरबंद और सोने की करधनी जब उसकी नाभि को छूती है, तो उसकी छटा देखते ही बनती है। जब वह अपने पैरों में बंधी पैजनिया (पायल) को छनकाकर धरती पर कदम बढ़ाती है, तो उसकी मधुर ध्वनि हृदय में रस घोल देती है। उसके अंग-अंग से फूटती वह चाँद जैसी शीतल चमक किसी पावन अगन की तरह चारों तरफ फैलती है, जिसे देखकर राह चलते राहगीरों के नयन भी शर्माकर झुक जाते हैं। जब वह अपने भारी कदमों से धम-धम चलती है, तो उसकी मादकता समूचे वातावरण पर एक मीठा सा नश छा देती है।
कवि उसकी प्राकृतिक रवानगी को उघाड़ते हुए कहते हैं कि बिना किसी सावन की बारिश के भी उसका बदन पसीने की बूंदों से ऐसे भीगा हुआ है मानो वह अभी-अभी नदी में स्नान करके आई हो, और चलते-चलते जब वह अपने गीले बालों (केशुकी) को पीछे की ओर झटकती है, तो मन पूरी तरह बावरा हो जाता है। उसकी एक छोटी सी निश्छल मुस्कान में ऐसा जादुई सम्मोहन है कि उसे देखकर बड़े-बड़े विद्वानों का ज्ञान छूट जाता है और काम करने वाले लोग अपना काम भूलकर उसे निहारने लगते हैं। यहाँ तक कि खुद कवि भी अपनी सुध-बुध खोकर किसी बेवड़े की तरह उसकी कल्पनाओं के गहरे ख्यालों में डूब गया है। समाज का हर व्यक्ति उसके इस पावन रूप को देखकर अपने मन में यही प्रीत सँजोए बैठा है कि काश यह सुंदर नारी मेरे जीवन की रानी बन जाए, परंतु कड़वा सच तो यह है कि उसकी इस अलौकिक सुंदरता के पीछे खुद विधाता और ख़ुदा भी मुग्ध होकर पड़ा है। कविता के अंत में, कवि अपने यथार्थ को प्रकट करते हुए कहते हैं कि उस नूरानी नारी का सौंदर्य इतना शाश्वत और असीम है कि जब मैंने उसे जीवन में केवल एक बार देखा था, तब से उसकी वह छवि मेरे अंतर्मन से निकलकर इस कागज़ के पन्नों पर कविता के रूप में हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गई है। इस रचना का मुख्य संदेश यही है कि प्रकृति और नारी का सौंदर्य ईश्वर की बनाई हुई सबसे अनूठी और पावन कलाकृति है, जिसकी सादगी और मर्यादा का सम्मान करना ही सच्ची साहित्यिक और मानवीय चेतना है 

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