देश करे पुकार
1. दुखों का यह जो मंज़र है, लगता दुखों का समंदर है,
आँधी-तूफ़ान और तीव्र उफ़ान, क्षण-क्षण का ही मंज़र है।
पर सदियों से मैं देख रहा, क्यों विकल यहाँ हर अंतर है?
आँधी-तूफ़ान और तीव्र उफ़ान, क्षण-क्षण का ही मंज़र है।
पर सदियों से मैं देख रहा, क्यों विकल यहाँ हर अंतर है?
2. क्या यह वही पावन भू है, जहाँ हरिश्चंद्र से भूप हुए?
या यह वही पावन थल है, जहाँ बुद्ध और महावीर हुए?
क्या मिथ्या थे वे सब आदर्श, या हम ही सत्य से विमुख हुए?
या यह वही पावन थल है, जहाँ बुद्ध और महावीर हुए?
क्या मिथ्या थे वे सब आदर्श, या हम ही सत्य से विमुख हुए?
3. छोड़ो बीती उन बातों को, वे तो ठहरे काल पुराने,
एक झाँसी वाली रानी थी, सुने शौर्य के जिसके अफ़साने।
धन्य माता जीजाबाई भी, जिन्होंने संकट में मार्ग छाने।
एक झाँसी वाली रानी थी, सुने शौर्य के जिसके अफ़साने।
धन्य माता जीजाबाई भी, जिन्होंने संकट में मार्ग छाने।
4. कुछ वीर हमने भी देखे हैं, जो राष्ट्र-हेतु जाँ वार गए,
आन-बान और गौरव की ख़ातिर, शीश कटा इतिहास अमर कर गए।
कितने नामों को याद करूँ, सब देश-हित सर्वस्व अर्पण कर गए।
आन-बान और गौरव की ख़ातिर, शीश कटा इतिहास अमर कर गए।
कितने नामों को याद करूँ, सब देश-हित सर्वस्व अर्पण कर गए।
5. मज़हब की बातें छोड़ो तुम, भारत से सीखो समभाव रखना,
ना कोई रोष, ना कोई द्वेष, बस प्रीत की पावन दृष्टि रखना।
ये नदियाँ, पर्वत और झरने, सिखाते मन को प्रफुल्लित रखना।
ना कोई रोष, ना कोई द्वेष, बस प्रीत की पावन दृष्टि रखना।
ये नदियाँ, पर्वत और झरने, सिखाते मन को प्रफुल्लित रखना।
6. सब छोड़ो मानवता समझो, यह वैमनस्य की रात बड़ी काली,
इस नफ़रत में क्या नहीं खोया? हर घर ने देखी दुखों की लाली।
दिल पर रख हाथ ज़रा पूछो, क्या तुमको भाती यह मन की ख़ाली?
इस नफ़रत में क्या नहीं खोया? हर घर ने देखी दुखों की लाली।
दिल पर रख हाथ ज़रा पूछो, क्या तुमको भाती यह मन की ख़ाली?
7. सोचो इस पुण्य धरा ने तुमको, हर संकट में संबल दिया,
सौहार्द-प्रेम को सदियों से, इस जीवन का मूलमंत्र किया।
कुछ वक़्त बदलते ही देखो, मानव ने क्यों अतीत भुला दिया?
सौहार्द-प्रेम को सदियों से, इस जीवन का मूलमंत्र किया।
कुछ वक़्त बदलते ही देखो, मानव ने क्यों अतीत भुला दिया?
8. मेरे भी हुए कुछ श्रेष्ठ सखा, जिन्होंने निभाई अद्भुत यारी,
हर आने वाली विपदा को, दो पग पहले ही रोका भारी।
जो कर सकते थे हर संभव, उन्होंने राष्ट्र पे निष्ठा वारी।
हर आने वाली विपदा को, दो पग पहले ही रोका भारी।
जो कर सकते थे हर संभव, उन्होंने राष्ट्र पे निष्ठा वारी।
9. यह भारत वीर-रत्नों का घट, सदियों से इसकी यही शान है,
हर सोए जन को यह जगाए, पर खुद के दुखों से हैरान है।
आशा का संचित बीज लिए, न जाने कब से यह देश परेशान है।
हर सोए जन को यह जगाए, पर खुद के दुखों से हैरान है।
आशा का संचित बीज लिए, न जाने कब से यह देश परेशान है।
10. जीवन का हर कतरा मेरा, अर्पित है बस तेरे लिए,
मत करना नादानी ऐसी, जिससे टूटे सदियों का साथ।
देश करे पुकार, ना करो बँटने की बात!
मत करना नादानी ऐसी, जिससे टूटे सदियों का साथ।
देश करे पुकार, ना करो बँटने की बात!
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- विकल = परेशान / व्याकुल
- अंतर = हृदय / अंतर्मन / दिल
- भूप = राजा / सम्राट
- विमुख = मुँह मोड़ना / अलग होना
- वैमनस्य = आपसी भेदभाव / दुश्मनी
- संबल = सहारा / सहयोग
- संचित = इकट्ठा किया हुआ / सहेजा हुआ
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत ओजस्वी, दार्शनिक और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत कविता के माध्यम से कवि ने समाज में फैल रही नफ़रत, आपसी मतभेदों और कुरीतियों पर गहरा प्रहार करते हुए संपूर्ण जनमानस को एकजुट होने का संदेश दिया है। कवि कहते हैं कि वर्तमान समय में समाज के भीतर दुखों का जो मंज़र दिखाई दे रहा है, वह किसी विशाल समंदर की तरह प्रतीत होता है, जहाँ हर क्षण अशांति और अविश्वास का तूफ़ान उमड़ रहा है। कवि दुखी होकर पूछते हैं कि सदियों से चले आ रहे इस पावन देश में आज हर व्यक्ति का अंतर्मन (अंतर) इतना परेशान और व्याकुल क्यों है? क्या यह वही पवित्र धरती है जहाँ सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसे महान सम्राट हुए, और जहाँ भगवान बुद्ध तथा महावीर स्वामी ने अहिंसा और शांति का संदेश दिया? क्या उनके वे महान नैतिक आदर्श झूठे थे, या आज का आधुनिक मनुष्य ही सत्य के मार्ग से पूरी तरह विमुख हो चुका है?
इस अत्यंत ओजस्वी, दार्शनिक और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत कविता के माध्यम से कवि ने समाज में फैल रही नफ़रत, आपसी मतभेदों और कुरीतियों पर गहरा प्रहार करते हुए संपूर्ण जनमानस को एकजुट होने का संदेश दिया है। कवि कहते हैं कि वर्तमान समय में समाज के भीतर दुखों का जो मंज़र दिखाई दे रहा है, वह किसी विशाल समंदर की तरह प्रतीत होता है, जहाँ हर क्षण अशांति और अविश्वास का तूफ़ान उमड़ रहा है। कवि दुखी होकर पूछते हैं कि सदियों से चले आ रहे इस पावन देश में आज हर व्यक्ति का अंतर्मन (अंतर) इतना परेशान और व्याकुल क्यों है? क्या यह वही पवित्र धरती है जहाँ सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसे महान सम्राट हुए, और जहाँ भगवान बुद्ध तथा महावीर स्वामी ने अहिंसा और शांति का संदेश दिया? क्या उनके वे महान नैतिक आदर्श झूठे थे, या आज का आधुनिक मनुष्य ही सत्य के मार्ग से पूरी तरह विमुख हो चुका है?
कवि अतीत की गौरव गाथा को याद करते हुए कहते हैं कि हमें पुराने दुखों को भुलाकर आगे बढ़ना होगा। यह वही भारत भूमि है जहाँ झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना ने अद्भुत शौर्य का इतिहास लिखा और छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई ने घोर संकट के समय भी समाज को जीने का पक्का मार्ग दिखाया। हमारे देश ने ऐसे वीर क्रांतिकारियों को भी देखा है जो मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी जान हँसते-हँसते वार गए। उन्होंने अपने आत्मसम्मान, आन-बान और गौरव की ख़ातिर शीश कटाकर इतिहास में खुद को अमर कर लिया। देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले इन वीरों का बलिदान हमें सिखाता है कि हमें मज़हब और जाति-धर्म के कड़वे विवादों को छोड़कर 'सर्वधर्म समभाव' की भावना को अपनाना चाहिए। मन से आपसी रोष और द्वेष को मिटाकर केवल प्रेम की पावन दृष्टि रखनी चाहिए, क्योंकि यहाँ के पर्वत, नदियाँ और झरने हमें हर हाल में खुश (प्रफुल्लित) रहना सिखाते हैं।
आपसी दुश्मनी (वैमनस्य) की यह रात बहुत काली है, जिसने नफ़रत की आग में न जाने कितने हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया है। हमें अपने दिल पर हाथ रखकर सोचना होगा कि क्या यह आंतरिक अकेलापन हमें शोभा देता है? इस पुण्य धरा ने हमेशा संकट के समय हमारा सहारा (संबल) बनकर हमारा साथ दिया है। वक़्त बदलते ही मनुष्य ने अपने इस गौरवशाली और त्यागमयी अतीत को क्यों भुला दिया? आज हमारा देश वीर-रत्नों का एक पावन घड़ा है, जो पूरी दुनिया को ज्ञान का मार्ग दिखाता है, परंतु आज वह अपने ही लोगों की आपसी फूट और दुखों से हैरान व परेशान खड़ा है। इस रचना का मुख्य संदेश यही है कि हमारा जीवन इस मातृभूमि के लिए पूरी तरह समर्पित होना चाहिए। हमें कोई भी ऐसी नादानी नहीं करनी चाहिए जिससे सदियों पुराना आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय एकता की डोर टूट जाए। आज यह देश पुकार-पुकार कर यही कह रहा है कि जाति और धर्म के नाम पर आपस में बँटना बंद करो और एकजुट होकर देश की उन्नति के लिए सीना तानकर खड़े हो जाओ