जी ले जिंदगी ख़ुशी से


जी ले जिंदगी खुशी से
1. मुझे सपनों में भी सपने आने लगे,
अब तो तन्हाई में हम गीत गाने लगे।
2. फ़िक्र किसका करूँ ख़ुशी या ग़म का,
क्योंकि सोहबत में अरमाँ जगने लगे।
3. जब मैं उठा और उठ ही गया,
हर कोई मुझे अपना बनाने लगे।
4. मैं देख ही रहा था कि आया याद मुझे,
कि वो लम्हे जिन्हें समेटे मैं लिए जा रहा था।
5. वो लम्हे भी पीछा छुड़ाने लगे,
कशमकश सा होकर रह गया।
6. अपनी शक्ल भी मुझे भुलानी पड़ी,
जिन आईनों के सामने मैं घंटों बिताया करता था।
7. वो आईने भी अब मुझसे शर्माने लगे,
जी ले जिंदगी खुशी से।

काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • तन्हाई = अकेलापन / एकांत
  • फ़िक्र = चिंता / परवाह
  • सोहबत = संगति / साथ / उठना-बैठना
  • अरमाँ = इच्छाएँ / आकांक्षाएँ / मन की चाहत
  • लम्हे = पल / समय का छोटा हिस्सा
  • कशमकश = मानसिक उलझन / दुविधा
  • अक्स (शक्ल) = चेहरा / रूप / परछाईं

📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत मर्मस्पर्शी, रूहानी और दार्शनिक कविता के माध्यम से कवि ने मानव जीवन के अकेलेपन, बदलते हुए सामाजिक रिश्तों और आत्मबोध के गहरे अहसास को बड़े ही भावुक शब्दों में उकेरा है। कविता की शुरुआत एक सकारात्मक बदलाव से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि अब जीवन में एक नया मोड़ आया है और मुझे खुली आँखों से भी सुंदर सपने दिखाई देने लगे हैं। जो अकेलापन (तन्हाई) कभी इंसान को सालता था, अब उस एकांत में मन गुनगुनाने लगा है और गीतों के मधुर स्वर बहने लगे हैं। जब जीवन में किसी सकारात्मक इंसान का साथ या अच्छी संगति (सोहबत) मिलती है, तो मन के भीतर दबे हुए सारे अरमान और इच्छाएँ दोबारा जीवित हो उठती हैं। उस वेला में इंसान को इस बात की परवाह (फ़िक्र) नहीं रहती कि आने वाला समय खुशियाँ लेकर आएगा या ग़म। जब मनुष्य वैचारिक रूप से जाग जाता है और अपनी कमियों से ऊपर उठ जाता है, तो यह समूचा संसार उसे अपना सा लगने लगता है और हर कोई उसे अपना बनाने के लिए आगे बढ़ता है।
परंतु जीवन का रास्ता इतना सीधा नहीं होता; इसमें यादों और बीते कल का एक बहुत बड़ा बोझ भी शामिल होता है। कवि कहते हैं कि अतीत के जिन प्यारे लम्हों और यादों को मैं अपनी झोली में समेटकर पूरी ज़िन्दगी आगे बढ़ रहा था, वक़्त बदलने के साथ वे लम्हे भी अब मुझसे अपना पीछा छुड़ाने लगे हैं। यह स्थिति मन को एक बहुत बड़ी मानसिक उलझन और कशमकश में डाल देती है, जहाँ इंसान खुद को बीच मंझधार में खड़ा पाता है। परिस्थितियों के थपेड़ों के बीच मनुष्य का आत्मसम्मान और उसकी अपनी पहचान इस कदर धुंधली हो जाती है कि उसे आईने में अपनी ही शक्ल पराई और भूली-बिसरी लगने लगती है। जिन आईनों के सामने खड़े होकर इंसान कभी घंटों अपनी सुंदरता को निहारता था, आज वही आईने उसके चेहरे की उदासी और मन के द्वंद्व को देखकर मानो शर्माने लगे हैं। इस खूबसूरत रचना का अंतिम और मुख्य संदेश यही है कि परिस्थिति चाहे कितनी भी उलझी हुई क्यों न हो, और अतीत की यादें चाहे साथ छोड़ दें, मनुष्य को हार नहीं माननी चाहिए। अपने मन के मैल और दुखों को साफ़ करके, हर हाल में अपनी ज़िन्दगी को पूरे खुले दिल और सादगी के साथ 'खुशी से जी लेना' ही इस नश्वर संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और अंतिम सत्य है 

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने