मुझे सपनों में भी सपने आने लगे
अब तो तन्हाई में हम गीत गाने लगे
फ़िक्र किसका करू ख़ुशी या गम का
क्योकि सोहबत में अरमा जगने लगे
जब मै उठा और उठ ही गया
हर कोई मुझे अपना बनाने लगे
मै देख ही रहा था की आया याद मुझे
की वो लम्हे जिन्हें समेटे मै लिए जा रहा था
वो लम्हे भी पीछा छुड़ाने लगे
कश्मकस सा होकर रह गया
अपनी शक्ल भी मुझे भुलानी पड़ी
जिन आईनों के सामने मै घंटो बिताया करता था
वो आईने भी अब मुझसे शर्माने लगी
मास्टर मुकेश
मुझे सपनों में भी सपने आने लगे,
अब तन्हाई में हम गीत गाने लगे।
फ़िक्र किसकी करूँ, खुशी या ग़म की,
सोहबत में अरमान जगने लगे।
जब मैं उठा, तो यूँ लगा जैसे,
हर कोई मुझे अपना बनाने लगे।
मैं देख ही रहा था कि याद आया,
वो लम्हे जिन्हें मैं समेटे चला था,
वो लम्हे भी मुझसे दूर जाने लगे।
कश्मकश में यूँ ही घिरा रह गया,
अपनी ही सूरत मुझे भूलानी पड़ी।
जिन आईनों के सामने घंटों खड़ा था,
वो आईने भी अब मुझसे शर्माने लगे।”
