बच्चों की सभा
1. ये सभा है बच्चों की सभा,
इसमें बड़े और बूढ़ों की दरकार नहीं।
ये सभा है हमारे सुनहरे भविष्य का,
इसमें फालतू लोगों की बकवास नहीं।
इसमें बड़े और बूढ़ों की दरकार नहीं।
ये सभा है हमारे सुनहरे भविष्य का,
इसमें फालतू लोगों की बकवास नहीं।
2. ये सभा है हमारी तुम्हारी पंचायत नहीं,
यहाँ हम अपनी सुनते हैं किसी के बाप की नहीं।
हाँ हम भविष्य को लेकर थोड़ा चिन्तित हैं,
वरना आँधी या तूफ़ान आये किसी का ग़म नहीं।
यहाँ हम अपनी सुनते हैं किसी के बाप की नहीं।
हाँ हम भविष्य को लेकर थोड़ा चिन्तित हैं,
वरना आँधी या तूफ़ान आये किसी का ग़म नहीं।
3. ये सभा है बच्चों की सभा,
इसमें होगा आज अच्छा फ़ैसला।
हम अपना अधिकार किसे सौंपे,
इसी मुद्दे पर होगा आज मसला।
इसमें होगा आज अच्छा फ़ैसला।
हम अपना अधिकार किसे सौंपे,
इसी मुद्दे पर होगा आज मसला।
4. देख-देख कर हालत इस कदर हो गया,
लेकिन सोचा चलो अब कुछ नया होगा।
हमारे विचार फिर से व्यर्थ हो गये,
सुनने वाले हमारे वो सब गुज़र गये।
लेकिन सोचा चलो अब कुछ नया होगा।
हमारे विचार फिर से व्यर्थ हो गये,
सुनने वाले हमारे वो सब गुज़र गये।
5. बच्चे हैं बच्चे किसी के ग़ुलाम नहीं,
ख़ता हूँ तुम्हारा इसमें कोई ऐहसान नहीं।
अपने मन के मालिक हैं हम,
स्वभाव छोड़ दें ये आसान नहीं।
ख़ता हूँ तुम्हारा इसमें कोई ऐहसान नहीं।
अपने मन के मालिक हैं हम,
स्वभाव छोड़ दें ये आसान नहीं।
6. कोई दारू पीता कोई ईमान बेचता,
कोई बीड़ी सिगरेट पीकर उड़ाता धुआँ।
खुद होश में नहीं हैं हमें क्या सम्भालेंगे,
ऐसे लोगों से हम क्या आस लगायेंगे।
कोई बीड़ी सिगरेट पीकर उड़ाता धुआँ।
खुद होश में नहीं हैं हमें क्या सम्भालेंगे,
ऐसे लोगों से हम क्या आस लगायेंगे।
7. क्षति तो सिर्फ व सिर्फ हमारी होती,
ये सच है सभा की बात नहीं थोथी।
सब केवल हमें कहते राम श्याम रूप,
हम बच्चों के प्रति किसी को दया नहीं एक टूक।
ये सच है सभा की बात नहीं थोथी।
सब केवल हमें कहते राम श्याम रूप,
हम बच्चों के प्रति किसी को दया नहीं एक टूक।
8. सत्य हमेशा झुठलाया नहीं जायेगा,
वो सर्द सी आधी रात फिर वापस आयेगा।
लाखों मरे हैं हम करोड़ों और मर जायेंगे,
मौसम से जो बचे ये इंसान हमें खा जायेगा।
वो सर्द सी आधी रात फिर वापस आयेगा।
लाखों मरे हैं हम करोड़ों और मर जायेंगे,
मौसम से जो बचे ये इंसान हमें खा जायेगा।
9. बच्चे हैं हम बच्चे फिर भी अकड़कर रहते,
तुम मार दो धिक्कार दो फिर भी हम प्रेम दिखाते।
हमारी न जात है न कोई धर्म,
बस हम बच्चों के साथ अपना सभा चाहते।
तुम मार दो धिक्कार दो फिर भी हम प्रेम दिखाते।
हमारी न जात है न कोई धर्म,
बस हम बच्चों के साथ अपना सभा चाहते।
10. आना होगा तो बच्चों जैसा आना,
जैसे हम रहते हैं बस वैसे ही रहना।
चुपचाप ख़ामोशी दिल में रखकर,
निश्छल हमारे विचारों को सुनना।
जैसे हम रहते हैं बस वैसे ही रहना।
चुपचाप ख़ामोशी दिल में रखकर,
निश्छल हमारे विचारों को सुनना।
11. दूध और रोटी नहीं दारू को पैसा है,
मंदिर चढ़ाते मेवा मिसी हमारे लिए सिक्के नहीं हैं।
कुत्तों को झेल लेते हमारे लिए फ़ुर्सत नहीं है,
फिर बोलता हूँ सभा है बच्चों की किसी की दरकार नहीं।
मंदिर चढ़ाते मेवा मिसी हमारे लिए सिक्के नहीं हैं।
कुत्तों को झेल लेते हमारे लिए फ़ुर्सत नहीं है,
फिर बोलता हूँ सभा है बच्चों की किसी की दरकार नहीं।
12. हम उनसे तो श्रेष्ठ हैं जिन्हें रोटी में फ़र्क दिखता,
हमारे नज़रिये से देखो सब समान दिखता।
तलाश करते हैं सब उस एक ख़ुदा को,
हमसे सच वह ख़ुदा भी ज़रूर मिलता।
हमारे नज़रिये से देखो सब समान दिखता।
तलाश करते हैं सब उस एक ख़ुदा को,
हमसे सच वह ख़ुदा भी ज़रूर मिलता।
13. ये सभा है बच्चों की संसद की बैठक नहीं,
यहाँ सब मालिक हैं किसी के नौकर नहीं।
ऐ ऊपरवाले इनको हम वर्षों से देख रहे हैं,
अब तू ही देखना हमारी चिन्ता किसी को नहीं।
यहाँ सब मालिक हैं किसी के नौकर नहीं।
ऐ ऊपरवाले इनको हम वर्षों से देख रहे हैं,
अब तू ही देखना हमारी चिन्ता किसी को नहीं।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- दरकार = आवश्यकता / ज़रूरत
- चिन्तित = परेशान / फिक्रमंद
- मसला = मुद्दा / विषय / समस्या का हल
- ख़ता = गलती / भूल / त्रुटि
- आस = आशा / उम्मीद / भरोसा
- क्षति = नुकसान / हानि
- थोथी = खोखली / निरर्थक / बिना किसी सार के
- निश्छल = कपट रहित / साफ़ दिल / पवित्र
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत ओजस्वी, मर्मस्पर्शी और सामाजिक यथार्थ से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने बच्चों की निश्छल चेतना को एक मंच देकर आज के भ्रष्ट, मतलबी और व्यसनी वयस्क समाज पर बेहद तीखा और गंभीर प्रहार किया है। कवि बच्चों के माध्यम से उद्घोष करते हुए कहते हैं कि यह जो हमारी सभा जुटी है, यह केवल मासूम बच्चों की पावन सभा है; इसमें स्वार्थ और कूटनीति की चाल चलने वाले बड़े और बूढ़े लोगों की कोई आवश्यकता (दरकार) नहीं है। यह सभा इस देश के आने वाले सुनहरे और सादे भविष्य की नींव है, जहाँ फालतू और पाखंडी लोगों की बकवास के लिए रत्ती भर भी स्थान नहीं है। यह बच्चों का अपना एक स्वतंत्र मंच है, यह बड़ों की वह पारंपरिक पंचायत नहीं है जहाँ कूटनीति के फैसले थोपे जाते हैं; यहाँ बच्चे केवल अपने अंतर्मन की सुनते हैं और किसी भी अहंकारी व्यक्ति के दबाव में नहीं आते। बच्चे कहते हैं कि हाँ, हम बड़े होते हुए इस समाज की गिरती नैतिकता और अपने भविष्य को लेकर थोड़े परेशान (चिन्तित) ज़रूर हैं, परंतु इसके अलावा हमारे सामने हालातों की चाहे जैसी भी आँधी या तूफ़ान आ जाए, हमें किसी बात का कोई डर या ग़म नहीं है। इस सभा में आज मानव जाति के कल्याण के लिए एक बहुत ही अच्छा और निश्छल फ़ैसला लिया जाएगा कि हम आने वाले समय में अपने अधिकारों की बागडोर किस सच्चे इंसान को सौंपे, इसी मुख्य समस्या (मसले) पर आज यहाँ विचार-विमर्श हो रहा है।
इस अत्यंत ओजस्वी, मर्मस्पर्शी और सामाजिक यथार्थ से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने बच्चों की निश्छल चेतना को एक मंच देकर आज के भ्रष्ट, मतलबी और व्यसनी वयस्क समाज पर बेहद तीखा और गंभीर प्रहार किया है। कवि बच्चों के माध्यम से उद्घोष करते हुए कहते हैं कि यह जो हमारी सभा जुटी है, यह केवल मासूम बच्चों की पावन सभा है; इसमें स्वार्थ और कूटनीति की चाल चलने वाले बड़े और बूढ़े लोगों की कोई आवश्यकता (दरकार) नहीं है। यह सभा इस देश के आने वाले सुनहरे और सादे भविष्य की नींव है, जहाँ फालतू और पाखंडी लोगों की बकवास के लिए रत्ती भर भी स्थान नहीं है। यह बच्चों का अपना एक स्वतंत्र मंच है, यह बड़ों की वह पारंपरिक पंचायत नहीं है जहाँ कूटनीति के फैसले थोपे जाते हैं; यहाँ बच्चे केवल अपने अंतर्मन की सुनते हैं और किसी भी अहंकारी व्यक्ति के दबाव में नहीं आते। बच्चे कहते हैं कि हाँ, हम बड़े होते हुए इस समाज की गिरती नैतिकता और अपने भविष्य को लेकर थोड़े परेशान (चिन्तित) ज़रूर हैं, परंतु इसके अलावा हमारे सामने हालातों की चाहे जैसी भी आँधी या तूफ़ान आ जाए, हमें किसी बात का कोई डर या ग़म नहीं है। इस सभा में आज मानव जाति के कल्याण के लिए एक बहुत ही अच्छा और निश्छल फ़ैसला लिया जाएगा कि हम आने वाले समय में अपने अधिकारों की बागडोर किस सच्चे इंसान को सौंपे, इसी मुख्य समस्या (मसले) पर आज यहाँ विचार-विमर्श हो रहा है।
कवि समाज की वर्तमान दुर्दशा पर गहरा अफ़सोस जताते हुए कहते हैं कि बड़ों की बनाई इस स्वार्थी दुनिया की हालत देख-देखकर बच्चों का मन गहरे दुख से भर गया है। उन्होंने हमेशा यही सोचा था कि चलो अब नए दौर में कुछ अच्छा और नया बदलाव होगा, परंतु बड़ों की कूटनीति के कारण बच्चों के वे सुंदर विचार फिर से पूरी तरह व्यर्थ हो गए। मासूमियत और सच्चाई की भाषा को समझने और सुनने वाले जो सच्चे लोग थे, वे सब अब इस ज़माने से गुज़र चुके हैं। बच्चे स्पष्ट कहते हैं कि हम स्वतंत्र चेतना हैं और किसी के गुलाम नहीं हैं। यदि हमसे बचपन की कोई नादानी या गलती (ख़ता) हो भी जाए, तो उसे माफ़ करना तुम्हारा फ़र्ज़ है, इस पर तुम्हारा कोई ऐहसान नहीं है। हम अपने मन के खुद सच्चे मालिक हैं और हमारे इस सरल व निश्छल स्वभाव को बदल देना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। बड़ों के पाखंड को उघाड़ते हुए बच्चे कहते हैं कि यहाँ कोई शराब (दारू) के नशे में डूबा है तो कोई चंद पैसों के लिए अपना ईमान बेच रहा है; कोई बीड़ी-सिगरेट के कश लगाकर हवा में धुएँ का पाखंड उड़ा रहा है। जो बड़े लोग स्वयं अपने होश में नहीं हैं और विकारों के गुलाम हैं, वे भला इन मासूम बच्चों को क्या नैतिक शिक्षा देंगे और क्या सम्भालेंगे? ऐसे दिशाहीन लोगों से भविष्य के निर्माण की कोई भी आशा (आस) लगाना पूरी तरह निरर्थक है।
वयस्कों के इस स्वार्थी व्यवहार के कारण सबसे बड़ी हानि और नुकसान (क्षति) केवल इन मासूम बच्चों के भविष्य की ही होती है। यह बात पूरी तरह से सच है, यह कोई खोखली या बिना सार की (थोथी) बात नहीं है। दुनिया के लोग केवल ज़ुबान से तो बच्चों को भगवान राम और कृष्ण का बाल-स्वरूप (श्याम रूप) कहकर उनकी झूठी तारीफ़ करते हैं, परंतु जब उनके अधिकारों और संरक्षण की बात आती है, तो बच्चों के प्रति समाज के किसी भी व्यक्ति के दिल में एक टूक भी सच्ची दया दिखाई नहीं देती। कूटनीति का यह क्रूर सत्य हमेशा के लिए झुठलाया नहीं जा सकता कि बड़ों की गलतियों के कारण आने वाला समय फिर से भयानक संकट बनकर वापस आएगा। इतिहास गवाह है कि बड़ों के स्वार्थ के कारण लाखों मासूम पहले ही मारे जा चुके हैं और करोड़ों और मर जाएँगे। यदि बच्चे कुदरत के कड़े मौसम की मार से बच भी गए, तो यह मतलबी इंसान अपने विकारों से उनका भविष्य खा जाएगा। इसके बावजूद, बच्चे अपनी मासूमियत के स्वाभिमान में अकड़कर और सीना तानकर जीते हैं। बड़े चाहे उन्हें कितना भी मारें या समाज की नज़रों में अपमानित (धिक्कार) करें, फिर भी बच्चे बदले में केवल निश्छल प्रेम ही बिखेरते हैं। बच्चों के भीतर न तो कोई झूठी जाति की दीवार होती है और न ही कोई कड़वा धर्म होता है; वे तो केवल आपस में मिलकर अपनी एक पावन सभा चाहते हैं।
कवि बड़ों को सीख देते हुए कहते हैं कि यदि तुम्हें बच्चों की इस पावन दुनिया में आना है, तो कूटनीति के अहंकार को छोड़कर स्वयं एक अबोध बच्चे जैसा निर्मल मन लेकर आना। जैसे बच्चे सादगी से रहते हैं, वैसे ही बिना किसी पाखंड के रहना सीखो। अपने दिल के भीतर ख़ामोशी को धारण करके, बच्चों के इन पवित्र और कपट रहित (निश्छल) विचारों को गहराई से सुनो। आज के समाज का सबसे घिनौना यथार्थ यह है कि बड़ों के पास बच्चों को खिलाने के लिए दूध और रोटी के पैसे भले ही न हों, परंतु शराब (दारू) की दुकान पर उड़ाने के लिए उनके पास हमेशा पैसा रहता है। मंदिरों में भगवान को चढ़ाने के लिए महंगे मेवे और मिष्टान्न ख़रीदने वाले लोगों के पास अपने ही घर के भूखे बच्चों को देने के लिए सादे सिक्के तक नहीं होते। लोग गलियों के आवारा कुत्तों को पालने का शौक तो झेल लेते हैं, परंतु अपने ही बच्चों के साथ दो पल बैठकर बात करने की उनके पास रत्ती भर भी फ़ुरसत नहीं होती। इसी कारण बच्चे पुकारते हैं कि यह हमारी अपनी पवित्र सभा है और हमें किसी स्वार्थी वयस्क की यहाँ कोई ज़रूरत नहीं है। बच्चे उन बड़ों से चरित्र में कहीं ज़्यादा श्रेष्ठ और महान हैं जिन्हें इंसान-इंसान की रोटी और औकात में फ़र्क दिखता है; क्योंकि बच्चों के सादे नज़रिए से देखने पर इस संसार का हर एक जीव बिल्कुल समान दिखाई देता है। दुनिया के अज्ञानी लोग जिस ईश्वर (ख़ुदा) को खोजने के लिए जंगलों और पहाड़ों में भटकते हैं, वह ख़ुदा तो बच्चों के इस साफ़ दिल में पल भर में मिल जाता है। अंत में, कवि कहते हैं कि यह बच्चों की पवित्र सभा है, यह नेताओं के कूटनीतिक दांव-पेचों वाली कोई राजनीतिक संसद की बैठक नहीं है; यहाँ सब अपने मन के स्वतंत्र मालिक हैं, कोई किसी का नौकर नहीं है। बच्चे ईश्वर से गुहार लगाते हुए कहते हैं कि हे ऊपरवाले विधाता, बड़ों के इस पाखंड को हम वर्षों से देख रहे हैं; अब तू ही हमारे भविष्य की रक्षा करना, क्योंकि इस मतलबी दुनिया में हमारे सच्चे विकास की चिंता आज किसी को नहीं है। इस संपूर्ण अमर रचना का मुख्य संदेश यही है कि समाज के झूठे दिखावे, व्यसनों (नशे) और कूटनीतिक पाखंड का पूरी तरह त्याग करके, बच्चों जैसी सादगी, निश्छल प्रेम और समानता के भाव को अपने भीतर जगाना चाहिए, क्योंकि बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनके चरित्र का निर्माण करना ही मानव सभ्यता का सर्वोच्च धर्म और उज्ज्वल भविष्य का एकमात्र सच्चा मार्ग है