एक दिन होगा ही
1. हर नई चीज़ एक दिन पुरानी होगी ही,
जो कल तक बीत गया वह कहानी होगी ही।
देखता नहीं है तू बीत रहा है एक-एक दिन,
जिसका तुझे प्रतीक्षा है वह भी बीत जायेगा एक दिन।
जो कल तक बीत गया वह कहानी होगी ही।
देखता नहीं है तू बीत रहा है एक-एक दिन,
जिसका तुझे प्रतीक्षा है वह भी बीत जायेगा एक दिन।
2. जो आज सत्य है वह एक दिन झूठ होगा ही,
हर उजड़े चमन में एक दिन बहार होगा ही।
पेड़ों के पत्ते भी गिरते हैं एक उद्देश्य से,
जब तक जड़ों में जान है उनमें फलियाँ होंगी ही।
हर उजड़े चमन में एक दिन बहार होगा ही।
पेड़ों के पत्ते भी गिरते हैं एक उद्देश्य से,
जब तक जड़ों में जान है उनमें फलियाँ होंगी ही।
3. संशय से अगर कोई हट गया तो उसका अस्तित्व नहीं,
हताश और निराश व्यक्ति को केवल निराशा मिलेगी ही।
दरिया हो या समुद्र हो या हो आग की नदी,
नित्य रत रहने वाला माझी एक दिन पार होगा ही।
हताश और निराश व्यक्ति को केवल निराशा मिलेगी ही।
दरिया हो या समुद्र हो या हो आग की नदी,
नित्य रत रहने वाला माझी एक दिन पार होगा ही।
4. पीछे रहने वालों का कोई ख़ास कारण नहीं है,
जैसा तुम सोचोगे हो अपने को वैसा होना ही है।
हममें किसी प्रकार की शक्ति की कमी नहीं है,
संकल्पवान व्यक्ति एक दिन तूफ़ान से पार होगा ही।
जैसा तुम सोचोगे हो अपने को वैसा होना ही है।
हममें किसी प्रकार की शक्ति की कमी नहीं है,
संकल्पवान व्यक्ति एक दिन तूफ़ान से पार होगा ही।
5. सर पर नहीं लोग दिल पर बोझ लेकर चलते हैं,
इसलिये उनको दुःख व पीड़ा स्वाभाविक होगी ही।
चाहे जैसे फेंके एक दिन जीकर या मरकर,
पता उन्हें भी है एक दिन इसे फेंकना होगा ही।
इसलिये उनको दुःख व पीड़ा स्वाभाविक होगी ही।
चाहे जैसे फेंके एक दिन जीकर या मरकर,
पता उन्हें भी है एक दिन इसे फेंकना होगा ही।
6. भीड़ में ठहर कब तक तू खामोश रहेगा,
एक दिन किसी विषय पर औरों से वार्ता होगी ही।
मंज़िल पाना है तो खामोश रहना ही पड़ेगा,
चौकन्ना रहते हुए होश में चलना होगा ही।
एक दिन किसी विषय पर औरों से वार्ता होगी ही।
मंज़िल पाना है तो खामोश रहना ही पड़ेगा,
चौकन्ना रहते हुए होश में चलना होगा ही।
7. बचकर चलने वाले एक दिन सामने आ जाते हैं,
कितना पाँव दबाकर चलेगा तू कुछ तो आवाज़ होगी ही।
दूसरों से झूठ बोलने वाले खुद अपने आप से शर्माते हैं,
जब आइनों से क्या छुपाना उससे सच्चाई बयाँ होगी ही।
कितना पाँव दबाकर चलेगा तू कुछ तो आवाज़ होगी ही।
दूसरों से झूठ बोलने वाले खुद अपने आप से शर्माते हैं,
जब आइनों से क्या छुपाना उससे सच्चाई बयाँ होगी ही।
8. खेतों में जाता किसान भी इतना नहीं सोचता,
उसे विश्वास है धूप है तो छाँव होगा ही।
सिर्फ विश्वास के सहारे वह दिन रात मेहनत करता है,
अब तुमही बताओ उसका तो अच्छा होगा ही।
उसे विश्वास है धूप है तो छाँव होगा ही।
सिर्फ विश्वास के सहारे वह दिन रात मेहनत करता है,
अब तुमही बताओ उसका तो अच्छा होगा ही।
9. नित्य रत लगा हुआ व्यक्ति मंज़िल पायेगा ही,
दुनिया एक दिन उसका चरण चूमेगी ही।
हम केवल ईमानदारी से सिर्फ दूसरों की कमियां देखते हैं,
इसलिये वह एक दिन नया इतिहास रच देगा ही।
दुनिया एक दिन उसका चरण चूमेगी ही।
हम केवल ईमानदारी से सिर्फ दूसरों की कमियां देखते हैं,
इसलिये वह एक दिन नया इतिहास रच देगा ही।
10. एक दिन होगा ही यह सत्य नहीं परम सत्य है,
लेकिन जो इसी को जपता है उसका विनाश होगा ही।
साहस लगन धैर्य ये शब्द नहीं कसौटी हैं,
जीवन में जो इसको उतार लेगा वह सफल होगा ही।
लेकिन जो इसी को जपता है उसका विनाश होगा ही।
साहस लगन धैर्य ये शब्द नहीं कसौटी हैं,
जीवन में जो इसको उतार लेगा वह सफल होगा ही।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- बहार = खुशहाली / वसंत ऋतु / रौनक
- उद्देश्य = लक्ष्य / कारण / प्रयोजन
- अस्तित्व = वजूद / पहचान
- नित्य रत = लगातार लगा हुआ / हमेशा कार्यरत रहना
- स्वाभाविक = प्राकृतिक / जो अपने आप हो
- वार्ता = बातचीत / संवाद
- चौकन्ना = सावधान / सतर्क
- कसौटी = परखने का मापदंड / परीक्षा
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत मर्मस्पर्शी, गंभीर और दार्शनिक गहराई से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने समय के परिवर्तनशील चक्र, मानवीय सोच की शक्ति, कर्मवीर के अटूट विश्वास और सफलता के नियमों को १० सुंदर पैराग्राफों में बेहद व्यापक रूप से उकेरा है। कविता की शुरुआत एक अटल सत्य से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि इस संसार में जो कुछ भी आज नया और चकाचौंध से भरा है, वक़्त बदलने पर उसका पुराना होना पूरी तरह निश्चित है। जो समय कल तक बीत चुका है, वह इतिहास की एक सादा कहानी बन चुका है। मनुष्य यदि खुली आँखों से देखे, तो उसका जीवन पल-पल करके निरंतर बीत रहा है। जिन सुनहरे दिनों या मंजिलों की वह बड़ी व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहा है, वे दिन भी एक दिन आकर बीत जाएँगे। संसार का यह भी एक नियम है कि आज जिसे लोग कूटनीतिक सत्य मानते हैं, परिस्थितियाँ बदलने पर वह एक दिन झूठ सिद्ध हो जाता है। परंतु इसके साथ ही एक सुंदर उम्मीद भी जुड़ी है कि जो बाग़ (चमन) आज पूरी तरह उजड़ चुका है, उसमें एक दिन दोबारा बहार की रौनक अवश्य लौटेगी। पेड़ों की डालियों से गिरने वाले पत्ते भी बिना किसी कारण के नहीं गिरते; उनके पीछे प्रकृति का एक गहरा उद्देश्य होता है कि जब तक पेड़ की जड़ों में जीवन की जान बाकी है, तब तक उस पर नए पत्ते और फलियाँ दोबारा मुस्कुराकर खिलेंगी ही।
इस अत्यंत मर्मस्पर्शी, गंभीर और दार्शनिक गहराई से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने समय के परिवर्तनशील चक्र, मानवीय सोच की शक्ति, कर्मवीर के अटूट विश्वास और सफलता के नियमों को १० सुंदर पैराग्राफों में बेहद व्यापक रूप से उकेरा है। कविता की शुरुआत एक अटल सत्य से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि इस संसार में जो कुछ भी आज नया और चकाचौंध से भरा है, वक़्त बदलने पर उसका पुराना होना पूरी तरह निश्चित है। जो समय कल तक बीत चुका है, वह इतिहास की एक सादा कहानी बन चुका है। मनुष्य यदि खुली आँखों से देखे, तो उसका जीवन पल-पल करके निरंतर बीत रहा है। जिन सुनहरे दिनों या मंजिलों की वह बड़ी व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहा है, वे दिन भी एक दिन आकर बीत जाएँगे। संसार का यह भी एक नियम है कि आज जिसे लोग कूटनीतिक सत्य मानते हैं, परिस्थितियाँ बदलने पर वह एक दिन झूठ सिद्ध हो जाता है। परंतु इसके साथ ही एक सुंदर उम्मीद भी जुड़ी है कि जो बाग़ (चमन) आज पूरी तरह उजड़ चुका है, उसमें एक दिन दोबारा बहार की रौनक अवश्य लौटेगी। पेड़ों की डालियों से गिरने वाले पत्ते भी बिना किसी कारण के नहीं गिरते; उनके पीछे प्रकृति का एक गहरा उद्देश्य होता है कि जब तक पेड़ की जड़ों में जीवन की जान बाकी है, तब तक उस पर नए पत्ते और फलियाँ दोबारा मुस्कुराकर खिलेंगी ही।
कवि मानव मन के विश्वास को उघाड़ते हुए आगे कहते हैं कि यदि कोई मनुष्य अपने कर्तव्यों और आत्मबल पर संशय (संदेह) करने लगे, तो समाज में उसका अस्तित्व और वक़्त की साख पूरी तरह मिट जाती है। जो लोग हमेशा हताश और निराश होकर बैठ जाते हैं, उनकी तक़दीर में केवल और केवल निराशा ही हाथ लगती है। इसके विपरीत, रास्ता चाहे गहरी नदी का हो, असीम समुद्र का हो या आग की डगर का क्यों न हो—जो माझी पूरी निष्ठा के साथ हमेशा अपने काम में लगा रहता है (नित्य रत), वह एक दिन हर हाल में इस भवसागर को पार कर लेता है। जीवन की दौड़ में जो लोग पीछे छूट जाते हैं, उनकी नाकामयाबी का कोई बाहरी कारण नहीं होता, बल्कि इंसान जैसा अपने अंतर्मन में सोचता है, वक्त के साथ उसका व्यक्तित्व वैसा ही बन जाता है। ईश्वर ने हम इंसानों के भीतर किसी भी शक्ति या ऊर्जा की कमी नहीं रखी है; एक संकल्पवान और फौलादी इरादों वाला व्यक्ति जीवन में आने वाले बड़े से बड़े तूफ़ान का सीना चीरकर पार निकल जाता है।
कवि समाज की एक बहुत बड़ी विडंबना पर चोट करते हुए कहते हैं कि आज के लोग अपने सिर पर नहीं, बल्कि अपने दिलों पर दुखों और कड़वी यादों का एक भारी बोझ लेकर घूम रहे हैं; इसीलिए उनके जीवन में मानसिक पीड़ा और दुख का होना बिल्कुल स्वाभाविक और प्राकृतिक है। इस कड़वे बोझ को इंसान चाहे जैसे भी ढोए, परंतु उसे यह सच पता है कि मृत्यु के आने पर एक दिन इस भार को यहीं फेंकना ही होगा। कूटनीति की इस भीड़ में कोई भी मनुष्य कब तक पूरी तरह खामोश और अकेला बैठा रहेगा; जीवन में कभी न कभी किसी न किसी मोड़ पर उसे समाज के सामने आकर संवाद (वार्ता) करना ही पड़ेगा। परंतु यदि जीवन में किसी महान मंज़िल को पाना है, तो फालतू के शोर से दूर रहकर अंतर्मन को शांत (खामोश) रखना होगा और हमेशा सावधान (चौकन्ना) रहकर होश में कदम बढ़ाना होगा। जो लोग अपनी जिम्मेदारियों या सच्चाई से बचकर छिपने का प्रयास करते हैं, वक़्त बदलने पर वे भी समाज के सामने आ ही जाते हैं। इंसान चाहे जितना भी पाँव दबाकर सादगी से चले, उसकी धड़कनों और कर्मों की कुछ न कुछ आवाज़ तो बाहर आएगी ही। दूसरों से झूठ बोलने और कूटनीति की चाल चलने वाले लोग बाहर से भले ही जीत जाएँ, परंतु वे रात के एकांत में खुद अपनी ही नज़रों में शर्माते हैं; क्योंकि दिल के आईने से कोई भी सच छिपाया नहीं जा सकता और वहाँ हर एक कर्म की सच्चाई बयाँ होकर ही रहती है।
कवि किसान का एक बहुत ही सुंदर और प्रेरक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि खेतों में कड़ा परिश्रम करने वाला किसान कभी भी व्यर्थ की चिंताओं में अपना दिमाग़ नहीं थकाता। उसे कुदरत के नियम पर पूरा विश्वास होता है कि यदि आज खड़ी दोपहर की कड़ी धूप है, तो शाम को शीतल छाँव का मिलना भी पूरी तरह तय है। इसी सादे विश्वास के सहारे वह दिन-रात खेतों में पसीना बहाता है, और तुम ही सोचो मुकेश भाई, जो इतनी ईमानदारी से मेहनत करेगा, उसका भविष्य तो हर हाल में अच्छा होना ही है। जो व्यक्ति बिना रुके निरंतर अपने कर्मों में लीन रहता है, मंज़िल खुद आकर उसके गले लगती है और यह समूची दुनिया एक दिन उसके पावन चरणों को चूमती है। आज के समाज की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि लोग अपनी कमियों को सुधारने के बजाय केवल दूसरों के चरित्र में कमियां ढूंढने में व्यस्त रहते हैं; जो कर्मवीर इस आदत को छोड़कर खुद पर ध्यान देता है, वह एक दिन नया इतिहास रच देता है। यह बात कि 'एक दिन सब कुछ सही होगा ही'—महज़ एक विचार नहीं बल्कि परम सत्य है; परंतु जो इंसान कर्म करना छोड़कर केवल इसी वाक्य की रट लगाता रहता है और आलस्य में बैठ जाता है, उसका विनाश तय है। जीवन में सफलता पाने के लिए साहस, लगन और धैर्य—ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये इंसान के चरित्र को परखने वाली साक्षात् कसौटी (परीक्षा) हैं। जो भी मनुष्य इन गुणों को अपने व्यावहारिक जीवन में पूरी ईमानदारी से उतार लेता है, वह अंत में एक महान और सफल इंसान बनकर ही उभरता है। इस पूरी रचना का मुख्य संदेश यही है कि समय की नश्वरता को पहचानकर व्यर्थ की चिंताओं और दूसरों की कूटनीति का त्याग करना चाहिए। किसान जैसी सादगी और अटूट विश्वास को अपने भीतर जगाकर, लगातार अपने कर्तव्यों के मार्ग पर बिना रुके आगे बढ़ते रहना ही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ और अंतिम शाश्वत सत्य है