ये क्या किया


ये क्या किया

1. सोच सोच कर एक सोच बदल दिया,
ये क्या एक पिछली सोच को दबा दिया।
अब क्या अब क्या ऐ मेरे हम हमी,
कौन बताये मैं तब सही या अब यही फ़रियाद किया।
2. एक ज़िक्र मैं आज खुद से किया,
जो तुम देख रहे हो वही काम मैं किया।
तो मैं क्या करता तो मैं क्या करता,
तू ही बता मेरे हम हमी कुछ गलत तो न किया।
3. अब न जीने की चाह है न मरने की रार है,
देखा भी न जाता कुछ फेंका भी न जाता।
कैसे कहे ये रात या सुबह अपना होगा,
ना कुछ सपना होगा या मेरे कहने से अपना होगा।
4. आज न जाने मैं किस राह पर हूँ,
ज़मीं पर होने के बावजूद आसमाँ निहारता हूँ।
न यहाँ दो राहें है न कोई राह है,
खुद ठहरने के बावजूद फिर भी बेक़रार हूँ।
5. मैं तन्हा तो नहीं किसकी तन्हाई मुझे छूती है,
दुःख विषाद देख देख न जाने धड़कने क्यूँ रुकी है।
खुद क्या करूँ अब करने को कुछ बचा,
फिर भी पलके झपती भी नहीं जाने नयने किसपे टिकी है।
6. क्या कुछ कर दूँ पर मेरे पास कुछ करने को हो भी,
तुझसे मैं क्या भर लूँ जो तेरे पास कुछ हो भी।
ये कुछ मैं हूँ या मैं ऐसा हो रहा हूँ,
था तो मैं किसी भीड़ में लगता है अब खो रहा हूँ।
7. बच बचा के मैं चला तो आया कुछ न किया,
लेकिन रास्ते भर मैंने न जाने क्यूँ आंसू ही पिया।
ता उम्र जिनके लिये फ़रियाद करता था,
आज उन्हीं को छोड़ दिया,
सच में सच में मैंने आज ये क्या कर दिया।

काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • हम हमी = अंतरात्मा / खुद का वजूद / आंतरिक मन 
  • फ़रियाद = गुहार / दुहाई / शिकायत 
  • ज़िक्र = चर्चा / स्मरण / याद करना 
  • रार = झगड़ा / बहस / विवाद 
  • बेक़रार = व्याकुल / बेचैन / परेशान तन्हा = अकेला / एकाकी 
  • विषाद = गहरा दुख / शोक / उदासी 
  • नयने = आँखें / नयन / चक्षु 
  • ता उम्र = जीवनभर / उम्रभर 

📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत गंभीर, मर्मस्पर्शी और अगाध दार्शनिक गहराई से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने मानव मन की दुविधाओं, विचारों के आपसी द्वंद्व, जीवन के अकेलेपन, कूटनीति के बाज़ार से दूर अपनी अंतरात्मा से किए गए पश्चाताप और अपनों को खोने के गहरे दर्द को ७ सुंदर व लंबे अंतरों में बहुत ही मार्मिक ढंग से उकेरा है। कविता की शुरुआत एक बहुत ही गहरे मानसिक द्वंद्व से होती है, जहाँ कवि कहते हैं कि मैं एकांत में बैठकर बहुत सोच-समझकर अपने ही पुराने विचारों को बदल रहा हूँ। परंतु इस प्रक्रिया में ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो मैंने अपनी ही पुरानी सोच और अंतर्मन की पावन आवाज़ को कूटनीति के वश होकर दबा दिया है। हे मेरे अपने अस्तित्व, मेरे अपने वजूद और मेरी अंतरात्मा (ऐ मेरे हम हमी), अब आगे क्या होगा? कूटनीति के इस बाज़ार में आज मुझे रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं बचा है जो यह साफ़-साफ़ बता सके कि मैं कल सही था या जो आज मैंने अपने विचारों को बदलकर विधाता के सामने फ़रियाद की है, वह सही है। कवि स्वयं से बात करते हुए आगे कहते हैं कि आज मैंने एकांत में बैठकर अपनी ही आत्मा का एक नया स्मरण और ज़िक्र किया है। इस मतलबी दुनिया के लोग मेरे चरित्र और कर्मों में जो कुछ भी देख रहे हैं, हक़ीक़त में मैंने वही काम पूरी सादगी से किया है; इसमें कोई छुपा हुआ पाखंड नहीं है। फिर भला मैं क्या करता, परिस्थितियों के आगे मेरे पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था। हे मेरी अंतरात्मा, तू ही गवाही दे कि मैंने अपने जीवन में किसी कूटनीति के तहत किसी दूसरे जीव का कुछ गलत तो नहीं किया है।
कवि वैराग्य और लाचारी की पराकाष्ठा को उघाड़ते हुए आगे कहते हैं कि अब इस मतलबी दुनिया को देखने के बाद न तो मन में झूठी वासनाओं के साथ जीने की कोई चाहत बची है, और न ही मौत के काल चक्र से लड़ने का कोई व्यर्थ का झगड़ा या रार बची है। समाज की इस स्वार्थी गिरावट को अब इन आँखों से देखा भी नहीं जाता, और अंतर्मन में जो दुखों का अंबार लगा है, उसे बाहर फेंका भी नहीं जाता। जीवन में ऐसा मोड़ आ चुका है जहाँ मैं यह कड़े दावे से कैसे कह दूँ कि आने वाली यह अंधेरी रात या आने वाली कल की नई सुबह पूरी तरह मेरी अपनी होगी; क्योंकि इस भौतिक संसार में इंसान का अपना कुछ भी नहीं है। न तो अब इन आँखों में कोई झूठा सपना बचा है और न ही मेरे खोखले शब्दों के कहने मात्र से यह वक़्त कभी मेरा अपना बनकर ठहरने वाला है। आज मुझे स्वयं नहीं पता कि मैं कूटनीति के चक्रव्यूह में फँसकर न जाने किस अंजान राह पर अकेला चल रहा हूँ। मेरी शारीरिक स्थिति यह है कि मैं ज़मीन पर खड़ा हूँ, परंतु मेरी व्याकुल आत्मा शांति की तलाश में हमेशा इस असीम आकाश और आसमाँ को ही निहारती रहती है। जीवन की इस डगर पर न तो कोई दो राहें बची हैं और न ही आगे बढ़ने का कोई साफ़ रास्ता दिखाई देता है। मैं सांसारिक रूप से पूरी तरह शांत होकर एक जगह ठहर चुका हूँ, परंतु इसके बावजूद मेरा यह मन अंदर से अत्यंत व्याकुल और बेक़रार बना हुआ है।
कवि अकेलेपन के अवसाद को प्रकट करते हुए कहते हैं कि मैं इस भीड़ में अकेला (तन्हा) तो नहीं हूँ, परंतु न जाने इस समाज की कौन सी अदृश्य तन्हाई है जो मेरी रूह को हर पल छूकर ज़ख्मी कर जाती है। चारों तरफ इंसानों के बीच फैले इस गहरे दुख और उदासी (विषाद) को देख-देखकर न जाने क्यों मेरे दिल की धड़कनें पल भर के लिए थम सी जाती हैं। मैं खुद अपने कल्याण के लिए क्या उपाय करूँ, अब इस मतलबी जहान में करने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचा है। हालात इतने कड़े हैं कि विरह के मारे मेरी ये पलकें अब झपकने का नाम भी नहीं लेतीं; न जाने मेरी ये आँखें (नयन किसपे टिके) किस एक सच्चे सहारे की तलाश में टकटकी लगाए शून्य को निहार रही हैं। मन में यह कड़ा सवाल उठता है कि क्या मैं दूसरों के भले के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दूँ, परंतु अफ़सोस कि मेरे पास अब समाज को देने के लिए कुछ बचा ही नहीं है; और हे प्रियतम, मैं तुझसे भी क्या माँग लूँ, जब कूटनीति के कारण तेरे पास भी देने के लिए कुछ शेष नहीं है। मैं स्वयं असमंजस में हूँ कि यह कूटनीतिक रूप मेरा अपना असली रूप है या परिस्थितियों के थपेड़ों के कारण मैं अंदर से ऐसा लाचार होता जा रहा हूँ। इतिहास गवाह है कि अतीत में मैं भी इस संसार की मतलबी भीड़ का एक बड़ा हिस्सा हुआ करता था, परंतु आज आत्म-बोध होने के बाद ऐसा लग रहा है मानो मैं इस भीड़ से पूरी तरह दूर होकर कहीं खो गया हूँ।
कविता के अंत में, कवि पछतावे और वियोग के अंतिम सत्य को उघाड़ते हुए कहते हैं कि मैं इस संसार की कूटनीतिक चालों और मतलबी लोगों से किसी तरह बच-बचाकर अपनी आत्मा को साफ़ बचाकर सुरक्षित निकल तो आया हूँ और मैंने यहाँ उनके प्रपंचों में पड़कर कोई पाप नहीं किया है। परंतु इस एकांत के रास्ते भर चलते-चलते न जाने क्यों मेरा यह प्रेमी हृदय अंदर तक रोता रहा और मैंने लाचारी में केवल अपने ही आंसुओं का कड़वा घूंट पीकर जीवन गुज़ारा है। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा और मर्मस्पर्शी पछतावा है कि उम्रभर (ता उम्र) जिन अपनों के कल्याण के लिए, जिनकी मोहब्बत के लिए मैं विधाता के सामने रो-रोकर फ़रियाद करता रहता था, आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि मैंने स्वयं अपने ही हाथों उन अपनों का साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया। सच में, सच में, मुझे अपनी इस नादानी पर आज भारी अफ़सोस हो रहा है कि मैंने आज अपने वजूद के साथ यह क्या कर दिया। इस संपूर्ण अमर रचना का मुख्य संदेश यही है कि सांसारिक मोह-माया, कूटनीति के रिश्तों, विचारों के झूठे घमंड और इच्छाओं की अंधी दौड़ का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए। अपने अंतःकरण को हमेशा सजग और होश में रखना चाहिए, क्योंकि अपनों का साथ छूट जाने के बाद जीवन में केवल पछतावे के आँसू ही शेष रह जाते हैं। समय रहते अपनी आत्मा को पहचानकर विधाता के ध्यान में लीन होना ही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ और अंतिम शाश्वत मोक्ष है 

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