लगन है लागी
1. जो सब कुछ मेरा तुझी पर लुटाये,
ऐसे तैसे दिन कैसे रैन बिताये।
मोहे प्रीत की लगन है लागी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
ऐसे तैसे दिन कैसे रैन बिताये।
मोहे प्रीत की लगन है लागी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
2. सुध बुध खोये नैना नीर बहाये,
उर अंतर छवि मन में बसाये।
मोहे प्यास मिलन की जागी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
उर अंतर छवि मन में बसाये।
मोहे प्यास मिलन की जागी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
3. तन मेरा मन प्रीत की बानी,
तेरे बिना नहीं और कहानी।
मोहे आस मिलन की जागी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
तेरे बिना नहीं और कहानी।
मोहे आस मिलन की जागी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
4. जीना मरना एक कहानी,
प्रीत बिना सब जग मुरझानी।
कहे कैसे लगन ये लागी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
प्रीत बिना सब जग मुरझानी।
कहे कैसे लगन ये लागी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
5. याद में जीना तेरी याद मरना,
सहज हुआ मेरा ये सब कहना।
जाहिर जग में हुआ कहानी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
सहज हुआ मेरा ये सब कहना।
जाहिर जग में हुआ कहानी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
6. प्रीत की होत न कोई ही बानी,
तुझसे जुडी अब मेरी कहानी।
चलने को साथ मैंने ठानी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
तुझसे जुडी अब मेरी कहानी।
चलने को साथ मैंने ठानी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
7. एक तेरे सिवा मेरा कोई न दूजा,
तेरी करूँ मैं अग्रिम पूजा।
तेरी सुरति चढ़ने लगी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
तेरी करूँ मैं अग्रिम पूजा।
तेरी सुरति चढ़ने लगी,
मोहे प्रीत की लगन है लागी।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- प्रीत = पवित्र प्रेम / ईश्वरीय स्नेह
- रैन = रात / विश्राम का समय
- सुध बुध = होश-आवास / मानसिक चेतना
- नैना नीर = आँखों के आँसू / विरह का जल
- उर अंतर = हृदय के भीतर / अंतःकरण में
- छवि = सुंदर रूप / साक्षात् मूरत
- जग = संसार / समूची दुनिया
- जाहिर = प्रकट होना / सबके सामने आना
- अग्रिम = सबसे पहले / सर्वोच्च स्थान पर
- सुरति = प्रभु का सुमिरन / निरंतर ध्यान / लौ लगना
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत ओजस्वी, मर्मस्पर्शी और सूफ़ियाना रंग में रंगी प्रखर भक्ति रस की महा-कविता के माध्यम से कवि ने विधाता के प्रति अटूट अनुराग, स्वयं के अहंकार को मिटाकर सर्वस्व न्योछावर करने की कला, विरह की पावन मदहोशी और ईश्वर के सुमिरन की असीम शक्ति को ७ सुंदर व लंबे अंतरों में बहुत ही मधुर ब्रज-अवधी शैली में प्रतिपादित किया है। कविता की शुरुआत संपूर्ण समर्पण के संकल्प से होती है, जहाँ खोजी आत्मा अपने प्रियतम (ईश्वर) से पुकार कर कहती है कि मेरी सत्ता में जो कुछ भी मेरा अपना था, वह सांसारिक धन-दौलत और मान-सम्मान का झूठा घमंड मैंने पूरी तरह तुझी पर मुस्कुराकर लुटा दिया है। इस भौतिक संसार की कूटनीति से दूर होकर, तेरे विरह में व्याकुल मेरा यह मन अपने दिन और विरह की कड़वी रातें (रैन) न जाने कैसे-तैसे काट रहा है, सांसारिक सुख अब मुझे रत्ती भर भी नहीं सुहाते। कड़वा और परम पवित्र सच तो यही है कि अब मुझे साक्षात् विधाता के पावन प्रेम (प्रीत) की अटूट लौ और लगन लग चुकी है, जिसके सामने समूचे ज़माने का वैभव फीका है। इस रूहानी लगन के जाग्रत होते ही मैंने इस मतलबी दुनिया की सारी झूठी कूटनीतिक सुध-बुध (होश-आवास) को पूरी तरह खो दिया है, और अंतर्मन की व्याकुलता के कारण मेरी आँखें चौबीसों घंटे केवल विरह के आंसुओं का जल (नैना नीर) बहा रही हैं। मैंने अपने हृदय के भीतर (उर अंतर) केवल और केवल तेरी ही करुणामयी और सुंदर मूरत (छवि) को हमेशा के लिए बसा लिया है। अब मेरी आत्मा में संसार के किसी स्वार्थ की कोई लालसा नहीं बची है, बल्कि मेरी रूह में केवल तुझसे एकाकार होने की एक पावन प्यास जाग्रत हो चुकी है।
इस अत्यंत ओजस्वी, मर्मस्पर्शी और सूफ़ियाना रंग में रंगी प्रखर भक्ति रस की महा-कविता के माध्यम से कवि ने विधाता के प्रति अटूट अनुराग, स्वयं के अहंकार को मिटाकर सर्वस्व न्योछावर करने की कला, विरह की पावन मदहोशी और ईश्वर के सुमिरन की असीम शक्ति को ७ सुंदर व लंबे अंतरों में बहुत ही मधुर ब्रज-अवधी शैली में प्रतिपादित किया है। कविता की शुरुआत संपूर्ण समर्पण के संकल्प से होती है, जहाँ खोजी आत्मा अपने प्रियतम (ईश्वर) से पुकार कर कहती है कि मेरी सत्ता में जो कुछ भी मेरा अपना था, वह सांसारिक धन-दौलत और मान-सम्मान का झूठा घमंड मैंने पूरी तरह तुझी पर मुस्कुराकर लुटा दिया है। इस भौतिक संसार की कूटनीति से दूर होकर, तेरे विरह में व्याकुल मेरा यह मन अपने दिन और विरह की कड़वी रातें (रैन) न जाने कैसे-तैसे काट रहा है, सांसारिक सुख अब मुझे रत्ती भर भी नहीं सुहाते। कड़वा और परम पवित्र सच तो यही है कि अब मुझे साक्षात् विधाता के पावन प्रेम (प्रीत) की अटूट लौ और लगन लग चुकी है, जिसके सामने समूचे ज़माने का वैभव फीका है। इस रूहानी लगन के जाग्रत होते ही मैंने इस मतलबी दुनिया की सारी झूठी कूटनीतिक सुध-बुध (होश-आवास) को पूरी तरह खो दिया है, और अंतर्मन की व्याकुलता के कारण मेरी आँखें चौबीसों घंटे केवल विरह के आंसुओं का जल (नैना नीर) बहा रही हैं। मैंने अपने हृदय के भीतर (उर अंतर) केवल और केवल तेरी ही करुणामयी और सुंदर मूरत (छवि) को हमेशा के लिए बसा लिया है। अब मेरी आत्मा में संसार के किसी स्वार्थ की कोई लालसा नहीं बची है, बल्कि मेरी रूह में केवल तुझसे एकाकार होने की एक पावन प्यास जाग्रत हो चुकी है।
कवि प्रेम की सर्वव्यापकता बयाँ करते हुए आगे कहते हैं कि मेरा यह हाड़-मांस का तन और यह चंचल मन अब पूरी तरह प्रेम की ही पावन बोली (बानी) बन चुका है। तेरे पावन सुमिरन के सिवा अब मेरे इस जीवन की कोई दूसरी सांसारिक कहानी या दास्तान बची ही नहीं है। मेरे अंतःकरण में केवल और केवल तुझसे मिलने की एक अखंड आस और उम्मीद जाग्रत हो चुकी है। इस संसार के बाज़ार में इंसानों का यह जीना और मरना तो महज़ एक छोटी सी कागज़ की कहानी है; क्योंकि सत्य तो यह है कि जिस मनुष्य के जीवन में विधाता के प्रति निश्छल प्रेम नहीं जागा, उस प्रेम के बिना यह समूचा संसार (जग) अंदर से पूरी तरह मुरझाया हुआ और निर्जीव ही दिखाई देता है। मैं शब्दों में भला कैसे बयाँ करूँ कि मेरे भीतर विधाता के प्रति यह पावन लगन किस घड़ी में और कैसे लग गई, परंतु सच यही है कि अब मैं पूरी तरह केवल उसी के रंग में रंग चुका हूँ। अब तो मेरे जीवन का एकमात्र सादा नियम बन चुका है कि तेरी पावन याद में ही मुस्कुराकर जीना है और तेरी ही याद में इस शरीर का त्याग (मरना) करना है। मेरे मुँह से निकलने वाली यह ज्ञान की बात अब बहुत ही सहज और स्वाभाविक हो चुकी है, क्योंकि इसमें कोई कूटनीति का प्रपंच नहीं है। मेरी यह प्रेम कहानी अब इस मतलबी ज़माने के सामने पूरी तरह प्रकट (जाहिर) हो चुकी है, और लोग चाहे जितना मज़ाक उड़ाएँ, मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है।
कवि प्रेम की असीमता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि इस पावन प्रेम को बयाँ करने के लिए संसार की कोई निश्चित भाषा या कूटनीतिक वाणी नहीं होती; यह तो केवल मौन रहकर अंतर्मन से महसूस करने का विषय है। मेरी ज़िन्दगी का एक-एक पल अब केवल तेरी ही सत्ता से पूरी तरह जुड़ चुका है। मैंने कड़ा संकल्प लेकर वक़्त की इस कठिन डगर पर हमेशा केवल तेरे ही साथ चलने की फौलादी प्रतिज्ञा (ठानी) कर ली है। इस समूचे ब्रह्मांड के भीतर एक तेरे पावन नाम के सिवा मेरा कोई दूसरा रक्षक या सगा नहीं है; तू ही मेरा आदि है और तू ही मेरा अंत है। मैं संसार के देवी-देवताओं और पत्थरों की मूर्तियों को पूजने के बजाय, अपने अंतःकरण के सिंहासन पर सबसे पहले और सर्वोच्च स्थान पर (अग्रिम पूजा) केवल तेरी ही सादी इबादत करूँगा। अब मेरी आध्यात्मिक स्थिति यह हो चुकी है कि चौबीसों घंटे मेरे मन पर केवल तेरे ही नाम का पावन सुमिरन और ध्यान (तेरी सुरति) का रंग चढ़ने लगा है, जो वक़्त बदलने पर भी कभी उतर नहीं सकता। इस संपूर्ण अमर रचना का मुख्य संदेश यही है कि सांसारिक मोह-माया, कूटनीति के बाज़ार, मतलबी रिश्तों और धन-दौलत के झूठे घमंड का पूरी तरह परित्याग कर देना चाहिए। अपने अंतःकरण को हमेशा एक छोटे बच्चे की तरह निर्मल और साफ़ रखकर, केवल विधाता की भक्ति की लगन में लीन होना और उनके चरणों में स्वयं को समर्पित करके सादगी से जीना ही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ और अंतिम शाश्वत मोक्ष है