मेरे विद्यालय का पहला दिन


 मेरे विद्यालय का पहला दिन
साँझ का वक़्त और सूर्य की लालिमा बेहद मनोहर छटा बिखेर रही, इस दृश्य को देखकर मैं कुछ बेचैन सा हो गया | कभी कभी हर प्राणी इतना बेचैन हो जाता है कि वह अब करे तो क्या करे काम कई करने को होते है पर काम करने का जी नहीं करता | मन में अजीब सा बेचैनी हलचल हो रही हो वैसी हालत आज मेरी हो गयी
आज मैं अपने आप को बहुत अकेला महसूस कर रहा हूँ एक अजीब उमंग और उल्लास भी है न आज बसंत है न ही कहीं हरियाली प्रतीत हो रही है न कोयल गीत गा रही है न ही आसमां में रंग बिरंगी तितली और चिड़िया मन मस्ती में झूम रहें है आखिर हमने क्या किया कि हमारा मन इतना व्याकुल है हमें ऐसा लग रहा है कि हमें सजा मिल रही है लेकिन ऐसी कोई बात नहीं मौसम कि छटा निराली और मनोहर है तभी हमने आकाश में सूरज को डूबते हुए और पक्षियों को लौटते हुये देखा तो हमारे वैरी हृदय में भी अनायासा सागर कि तरह हिलोरें उठने लगा फिर क्या था हमारे बेचैन दिल को करार आ रहा था क्योंकि हम भी लौट चुके थे बचपन में |
लोग आज भी कहते है "तन बचपन का मन बचपन का "आखिरकार बचपन बचपन होता है बचपन तो सबकी होती है वैसी ही मेरा बचपन था वैसे तो बचपन में तो बहुत घटनाये हुयी है उनमें से एक एक घटना स्पष्टत: याद है मुझे वैसे तो मेरी पढ़ाई घर पर चलती थी क्योंकि हमारे घर में लोग पढ़े लिखे थे इसलिए सामान्य शिक्षा घर पर ही मिली थी जैसे स्वर व्यंजन गिनती पहाड़ा आदि | घर के उस शांत और अनुशासित वातावरण में बैठकर जब बड़े बुज़ुर्ग सवेरे-सवेरे स्लेट पर क ख ग घ लिखना सिखाते थे, तो मन में पढ़ाई के प्रति एक सादा और गहरा कौतूहल जागृत होता था। उस समय की वह कड़क लेकिन प्यार भरी सीख ही थी, जिसने हमारे भीतर अक्षरों और अंकों का एक अटूट और फौलादी आधार खड़ा कर दिया था, जिसका मोल आज भी बहुत अनमोल है।
जुलाई का महिना था मै नामांकन के लिये अपने पिता के छोटे चाचा के साथ पास के विद्यालय में गया और हम सीधे प्रधानाचार्य जी के पास पहुंचे किस कमरे में प्रधानाचार्य बैठे थे | जुलाई की वह उमस भरी दोपहर थी और स्कूल के बड़े से प्रवेश द्वार को लांघते समय मेरे छोटे से जियरे की धड़कनें बहुत तेज़ चल रही थीं। चारों तरफ बच्चों का शोर और कमरों की कतारें देखकर मन असमंजस और कौतूहल की एक नई दुनिया में तैर रहा था। जब चाचा जी मेरा हाथ थामकर उस गलियारे से गुज़रे, तो मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी बहुत बड़े अज्ञात किले में प्रवेश कर रहा हूँ।
उसमें प्रधानाचार्य बिल्कुल अकेले थे हमने उनसे आज्ञा ली और कमरे में प्रवेश किया | प्रधानाचार्य जी से नामांकन के लिए बात हुयी तो प्रधानाचार्य जी ने हमसे कुछ सवाल किये जैसे पहाड़ा कितने तक आता है हमने कहा 20 तक फिर उन्होंने वर्णमाला के बारे में पूछा उसके बाद हमसे पेपर भी पढ़वाया गया हालांकि हमें याद है कि हमने समाचार पत्र बहुत तेज तो नहीं पढ़ा लेकिन फिर भी पढ़ा | जब मैं उनके सम्मुख खड़ा होकर समाचार पत्र की पंक्तियाँ पढ़ रहा था, तो प्रधानाचार्य जी की पैनी और गम्भीर नज़रें मेरे मुख के उतार-चढ़ाव को बहुत ध्यान से परख रही थीं। कमरे का वह सन्नाटा और मेरी सादी सी धीमी पुकार के बीच, मेरी अंतरात्मा पूरी वफ़ादारी से अपनी बुद्धि का प्रदर्शन कर रही थी।
वे जितने भी सवाल पूछे हमने उसके ठीक रो जवाब दिये इसके बाद कुछ क्षण सोचने के बाद प्रधानाचार्य जी हमसे स्वयं पूछे कि "तुम्हारा नामांकन किस कक्षा में कर दू "यह हमारे लिये दुविधा का प्रश्न था लेकिन मैं कुछ समय सोचने के बाद तीसरी कक्षा में नामांकन का अनुरोध किया इसके बाद प्रधानाचार्य जी हमसे फिर पूछे कि " तीसरी में पढ़ लोगे न " उत्तर में मैंने हां कहा और इस प्रकार हमने स्कूल की शिक्षा तीसरी से प्रारम्भ किया | आज लिखते समय ऐसा आभास हो रहा है कि जब प्रधानाचार्य जी ( जगदीश पटेल ) ने हमसे पूछा कि अरे बेटा तुम्हारा नाम किस कक्षा में लिखू तो वह दिन मेरे लिये किसी नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर लेने जैसा ही था | वह एक छोटा सा सादा क्षण था, परंतु उस क्षण ने मेरे समूचे जीवन की दिशा और दशा को हमेशा के लिए एक सुंदर और जाग्रत मार्ग पर मोड़ दिया था।

📚 कहानी में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • लालिमा = संध्या के समय आकाश का लाल रंग / सूरज की लाली 
  • मनोहर छटा = मन को मोह लेने वाली सुंदर सुंदरता / दृश्य 
  • व्याकुल = बेचैन / परेशान / उद्विग्न 
  • अनायासा (अनायास) = अपने आप / अचानक / बिना किसी प्रयास के 
  • करार = सुख / चैन / शांति 
  • स्पष्टत: = बिल्कुल साफ़-साफ़ / साफ तौर पर 
  • नामांकन = स्कूल में दाखिला लेना / एडमिशन 
  • आज्ञा = अनुमति / इज़ाज़त माँगना 
  • दुविधा = असमंजस / मानसिक खींचतान / उलझन 
  • आभास = अहसास होना / महसूस होना 
  • कौतूहल = जानने की तीव्र इच्छा / जिज्ञासा
  • सम्मुख = सामने / प्रत्यक्ष होना
  • झंझट = फालतू की उलझन / प्रपंच
  • मयस्सर = उपलब्ध होना / नसीब होना
  • अनुशासित = नियमों में बंधा हुआ / संयमित
  • विसर्जन = समाप्त कर देना / मिटा देना

📜 इस संस्मरण का विस्तृत विवेचन और मुख्य संदेश:
स्मृतियों के झरोखे से निकली यह पावन कहानी जीवन की उन अमूल्य नीवों पर गहरा प्रकाश डालती है, जहाँ से मनुष्य के चरित्र और उसकी बौद्धिक यात्रा का वास्तविक सूत्रपात होता है। लेखक ने अपनी सादी गद्य शैली के माध्यम से बचपन के उस पावन कालखंड को वर्तमान मशीनी युग के पाखंड से बिल्कुल दूर और स्वतंत्र दिखाया है। साँझ के समय आसमान में फैलने वाली सूर्य की लालिमा और प्रकृति का सुंदर दृश्य जहाँ एक तरफ मन में संसार की क्षणभंगुरता की बेचैनी पैदा करता है, वहीं दूसरी तरफ वह जीवात्मा को अपनी जड़ों (बचपन) की ओर लौट जाने का एक सादा आलिंगन भी प्रदान करता है। बचपन का वह समय कूटनीति के बाज़ारों और इंटरनेट के भ्रमजाल से पूरी तरह अछूता था, जहाँ बड़ों का बड़प्पन और छोटों का लड़कपन ही जीवन का सबसे बड़ा आनंद हुआ करता था। स्कूल के पहले दिन का वह अनुभव जब बच्चा अपने पारिवारिक परिवेश की सादी शिक्षा से निकलकर समाज के एक बहुत बड़े शिक्षा मंदिर के सम्मुख खड़ा होता है, तो उसके भीतर चलने वाला असमंजस और डर पूरी तरह स्वाभाविक है।
इस सुंदर संस्मरण का अंतिम छोर हमें यही शाश्वत सीख देता है कि जीवन में धन-दौलत और बड़े-बड़े आलीशान मुकाम चाहे जितने भी मयस्सर हो जाएँ, परंतु बचपन के उन दिनों की निश्छल मासूमियत और बड़ों के आशीर्वाद की पावन थाप का कोई दूसरा विकल्प संसार के किसी भी बाज़ार में कभी ख़रीदा नहीं जा सकता। अपनी जड़ों से जुड़े रहना और अतीत के उन पावन संघर्षों को सम्मान के साथ याद रखना ही मनुष्य के जीवन की सबसे सुंदर और स्थाई कमाई है।


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