आओ हम शपथ लें
आओ हम शपथ लें कि हम दुनिया बदलकर दिखलाएंगे
1. बहते हुए उस हवा के रुख को मोड़ लाएंगे,
बहती हुई उस नदी की धारा को मोड़ दिखाएंगे।
चलते हुए उस राही के मन को मोह लाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
बहती हुई उस नदी की धारा को मोड़ दिखाएंगे।
चलते हुए उस राही के मन को मोह लाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
2. तुम साथ दो मेरा तो चाँद-तारों को भी लाएंगे,
उस पहाड़ की तरह दृढ़ आदर्श बनकर दिखाएंगे।
अपनी प्रेम की शक्ति से हम दुनिया को सजाकर दिखाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
उस पहाड़ की तरह दृढ़ आदर्श बनकर दिखाएंगे।
अपनी प्रेम की शक्ति से हम दुनिया को सजाकर दिखाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
3. सीखा है यह आदर्श जिससे उसे कभी भूल न पाएंगे,
उस फूल की तरह हम भी सारे जहाँ में महककर दिखाएंगे।
हम भी राम, कृष्ण, महावीर बनकर दिखाएँगे,
आओ हम शपथ लें।
उस फूल की तरह हम भी सारे जहाँ में महककर दिखाएंगे।
हम भी राम, कृष्ण, महावीर बनकर दिखाएँगे,
आओ हम शपथ लें।
4. मिटाकर दिलों से नफ़रत हम नया सवेरा लाएंगे,
शोषित और बेबसों के मुरझाए चेहरों को हँसाएंगे।
एकता की अटूट डोर से इस माटी को सजाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
शोषित और बेबसों के मुरझाए चेहरों को हँसाएंगे।
एकता की अटूट डोर से इस माटी को सजाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
5. अज्ञानता का जो घोर अंधेरा है उसे जड़ से मिटाएंगे,
ज्ञान और सादगी के पावन दीप हर घर में जलाएंगे।
अपने वीर शहीदों के गौरव का मान बढ़ाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
ज्ञान और सादगी के पावन दीप हर घर में जलाएंगे।
अपने वीर शहीदों के गौरव का मान बढ़ाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- शपथ = कड़ा संकल्प / प्रतिज्ञा / क़सम
- रुख = दिशा / बहाव का रास्ता
- राही = मुसाफ़िर / पथिक
- दृढ़ = मज़बूत / अडिग / जो अपनी जगह से न हिले
- जहाँ = संसार / पूरी दुनिया
- माटी = जन्मभूमि / देश की मिट्टी
- गौरव = सम्मान / मान-प्रतिष्ठा / बड़प्पन
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत ओजस्वी और जोश से भरी कविता के माध्यम से कवि ने देश के युवाओं और समाज के हर एक जनमानस के भीतर एक कड़ा संकल्प, देशभक्ति और सकारात्मक बदलाव की अलख जगाने का बुलंद आह्वान किया है। कवि कहते हैं कि आओ, हम सब मिलकर यह पावन प्रतिज्ञा (शथप) लें कि हम अपने कड़े पुरुषार्थ और हौसले के बल पर इस रूढ़िवादी दुनिया की सूरत को बदलकर रख देंगे। हमारे भीतर वह फौलादी इच्छाशक्ति है कि हम बहती हुई विपरीत हवाओं के रुख को भी मोड़ सकते हैं और नदी की तीव्र से तीव्र धाराओं की दिशा बदलने का सामर्थ्य रखते हैं। हम अपने सादे और निश्छल व्यवहार से सत्य की राह पर चलने वाले हर मुसाफ़िर (राही) का मन मोह लेंगे। यदि इस देश का समझदार युवा आपस के भेदभाव को भुलाकर एक-दूसरे का हाथ थाम ले, तो हम आकाश के चाँद-तारों को भी धरती पर लाने का असंभव कार्य कर सकते हैं। हमें अपने जीवन के आदर्शों को पहाड़ की तरह अडिग और मज़बूत बनाना होगा, ताकि कोई भी कूटनीति की चाल हमें डिगा न सके।
इस अत्यंत ओजस्वी और जोश से भरी कविता के माध्यम से कवि ने देश के युवाओं और समाज के हर एक जनमानस के भीतर एक कड़ा संकल्प, देशभक्ति और सकारात्मक बदलाव की अलख जगाने का बुलंद आह्वान किया है। कवि कहते हैं कि आओ, हम सब मिलकर यह पावन प्रतिज्ञा (शथप) लें कि हम अपने कड़े पुरुषार्थ और हौसले के बल पर इस रूढ़िवादी दुनिया की सूरत को बदलकर रख देंगे। हमारे भीतर वह फौलादी इच्छाशक्ति है कि हम बहती हुई विपरीत हवाओं के रुख को भी मोड़ सकते हैं और नदी की तीव्र से तीव्र धाराओं की दिशा बदलने का सामर्थ्य रखते हैं। हम अपने सादे और निश्छल व्यवहार से सत्य की राह पर चलने वाले हर मुसाफ़िर (राही) का मन मोह लेंगे। यदि इस देश का समझदार युवा आपस के भेदभाव को भुलाकर एक-दूसरे का हाथ थाम ले, तो हम आकाश के चाँद-तारों को भी धरती पर लाने का असंभव कार्य कर सकते हैं। हमें अपने जीवन के आदर्शों को पहाड़ की तरह अडिग और मज़बूत बनाना होगा, ताकि कोई भी कूटनीति की चाल हमें डिगा न सके।
अपनी निश्छल प्रेम की शक्ति से हम नफ़रत की आग में जल रही इस दुनिया को एक सुंदर उपवन की तरह सजाकर दिखाएंगे। कवि अपने महान पूर्वजों को नमन करते हुए कहते हैं कि हमने इतिहास के पन्नों से जो पावन संस्कार और आदर्श सीखे हैं, उन्हें हम जीवन की अंतिम सांस तक कभी भूल नहीं पाएंगे। जैसे एक छोटा सा फूल काँटों के बीच रहकर भी पूरे बाग़ को अपनी महक से सराबोर कर देता है, वैसे ही हम भी अपने नेक कर्मों से पूरे संसार (जहाँ) में मानवता की खुशबू बिखेरेंगे। हम इस पावन भारत भूमि पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह मर्यादित, कृष्ण की तरह कर्मयोगी और भगवान महावीर की तरह अहिंसा व करुणा का प्रतीक बनकर दिखाएँगे। समाज में फैले अज्ञानता और कुरीतियों के घोर अंधेरे को मिटाने के लिए हम हर एक झोपड़ी में शिक्षा, चेतना और सादगी के ज्ञानरूपी दीप जलाएंगे और अपने अमर वीर क्रांतिकारियों के पावन त्याग के सम्मान (गौरव) को हमेशा बुलंद रखेंगे। इस रचना का मुख्य संदेश यही है कि स्वार्थ और कायरता का त्याग करके समाज की उन्नति के लिए हमेशा सीना तानकर डटे रहना ही मनुष्य का असली कर्तव्य है
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