बालक की आरज़ू
1. इन छोटे-छोटे हाथ-पाँव की यही है आरज़ू,
ऊपर से छोटे बड़े खिलौनों को कोई रख दे मेरे बाजू।
कोई चाँद लाये कोई तारा लाये,
तब मैं जी लगाकर इनसे खेलूँ।
ऊपर से छोटे बड़े खिलौनों को कोई रख दे मेरे बाजू।
कोई चाँद लाये कोई तारा लाये,
तब मैं जी लगाकर इनसे खेलूँ।
2. माँ मुझे ना चाहिए दूध ना चाहिए काजू,
एक मुझे झूला चाहिए जिस पर मैं झूलूँ।
राजू गोपाल को लेकर मैं चाँद पर जाऊँ,
इसलिए मुझे छुक-छुक करती हुई ट्रेन चाहिए आजू।
एक मुझे झूला चाहिए जिस पर मैं झूलूँ।
राजू गोपाल को लेकर मैं चाँद पर जाऊँ,
इसलिए मुझे छुक-छुक करती हुई ट्रेन चाहिए आजू।
3. कागज़ की कश्ती हो और सावन का पानी,
दादी सुनाए मुझे परियों की कहानी।
तितली के पीछे मैं दौड़ लगाऊँ,
बाग़ों से सुंदर मैं फूल चुन लाऊँ।
दादी सुनाए मुझे परियों की कहानी।
तितली के पीछे मैं दौड़ लगाऊँ,
बाग़ों से सुंदर मैं फूल चुन लाऊँ।
4. आज मेरा खिलौना आया नहीं,
मैंने दूध-रोटी खाया नहीं।
मैं किसी का बाबू नहीं,
आज से किसी का राजू नहीं।
मैंने दूध-रोटी खाया नहीं।
मैं किसी का बाबू नहीं,
आज से किसी का राजू नहीं।
5. पापा जो आयेंगे तो गोदी में उठायेंगे,
रूठे हुए राजू को हँसकर मनायेंगे।
ढेर सारे नए-नए तोहफ़े वो लायेंगे,
सब दुःख भूलकर हम फिर मुस्कायेंगे।
रूठे हुए राजू को हँसकर मनायेंगे।
ढेर सारे नए-नए तोहफ़े वो लायेंगे,
सब दुःख भूलकर हम फिर मुस्कायेंगे।
6. उदास बैठा हूँ मैं हताश बैठा हूँ मैं,
इन छोटे-छोटे हाथ-पाँव को धरे बैठा हूँ।
काश मैं झट बड़ा हो जाऊँ,
ऐसा सपना सजाये बैठा हूँ मैं।
इन छोटे-छोटे हाथ-पाँव को धरे बैठा हूँ।
काश मैं झट बड़ा हो जाऊँ,
ऐसा सपना सजाये बैठा हूँ मैं।
काव्य में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
- आरज़ू = इच्छा / कामना / अभिलाषा
- बाजू = बगल में / पास में
- कश्ती = नाव / नौका
- तोहफ़े = उपहार / भेंट / पुरस्कार
- हताश = निराश / उदास या दुखी होना
- झट = तुरंत / जल्दी से
- काश = एक गहरी इच्छा प्रकट करने वाला शब्द
📜 इस कविता का विस्तृत भावार्थ और मुख्य संदेश:
इस अत्यंत मधुर, कोमल और बाल-मनोविज्ञान से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने एक छोटे से बच्चे के अंतर्मन की निश्छल इच्छाओं, उसकी रूठने-मनाने की सादगी और बड़े होने के उसके अनूठे सपनों को ६ सुंदर पैराग्राफों में बहुत ही सजीव शब्दों में उकेरा है। कवि कहते हैं कि एक नन्हा बालक अपने छोटे-छोटे हाथ-पाँवों को हिलाते हुए मन ही मन यह अभिलाषा (आरज़ू) कर रहा है कि कोई आकर उसके पास (बाजू) में रंग-बिरंगे सुंदर खिलौनों का पूरा ढेर रख दे। बचपन की कल्पनाएँ असीम होती हैं; वह बच्चा चाहता है कि कोई उसके खेलने के लिए साक्षात् आसमान का चंदा और टिमटिमाते तारे तोड़कर ज़मीन पर ले आए, ताकि वह पूरी लगन और खुशी के साथ उनके संग खेल सके। बच्चा अपनी माँ से अपनी मासूम ज़िद व्यक्त करते हुए कहता है कि माँ, अब मुझे खाने के लिए महंगे काजू या दूध की कोई चाहत नहीं है; मेरी एकमात्र इच्छा तो यह है कि मुझे एक सुंदर सा झूला मिल जाए जिस पर बैठकर मैं असीम आसमान की ऊँचाइयों को छू सकूँ। वह अपने प्यारे सखा राजू और गोपाल को साथ लेकर चाँद की सैर पर निकलना चाहता है, और इस अनोखी यात्रा के लिए उसे पटरियों पर छुक-छुक करके दौड़ने वाली एक सुंदर सी खिलौना ट्रेन चाहिए।
इस अत्यंत मधुर, कोमल और बाल-मनोविज्ञान से परिपूर्ण महा-कविता के माध्यम से कवि ने एक छोटे से बच्चे के अंतर्मन की निश्छल इच्छाओं, उसकी रूठने-मनाने की सादगी और बड़े होने के उसके अनूठे सपनों को ६ सुंदर पैराग्राफों में बहुत ही सजीव शब्दों में उकेरा है। कवि कहते हैं कि एक नन्हा बालक अपने छोटे-छोटे हाथ-पाँवों को हिलाते हुए मन ही मन यह अभिलाषा (आरज़ू) कर रहा है कि कोई आकर उसके पास (बाजू) में रंग-बिरंगे सुंदर खिलौनों का पूरा ढेर रख दे। बचपन की कल्पनाएँ असीम होती हैं; वह बच्चा चाहता है कि कोई उसके खेलने के लिए साक्षात् आसमान का चंदा और टिमटिमाते तारे तोड़कर ज़मीन पर ले आए, ताकि वह पूरी लगन और खुशी के साथ उनके संग खेल सके। बच्चा अपनी माँ से अपनी मासूम ज़िद व्यक्त करते हुए कहता है कि माँ, अब मुझे खाने के लिए महंगे काजू या दूध की कोई चाहत नहीं है; मेरी एकमात्र इच्छा तो यह है कि मुझे एक सुंदर सा झूला मिल जाए जिस पर बैठकर मैं असीम आसमान की ऊँचाइयों को छू सकूँ। वह अपने प्यारे सखा राजू और गोपाल को साथ लेकर चाँद की सैर पर निकलना चाहता है, और इस अनोखी यात्रा के लिए उसे पटरियों पर छुक-छुक करके दौड़ने वाली एक सुंदर सी खिलौना ट्रेन चाहिए।
बाल-मन का सौंदर्य कुदरत की सादी चीज़ों में छिपा होता है। बच्चा चाहता है कि बारिश के दिनों में वह कागज़ की नाव (कश्ती) बनाकर सावन के पानी में तैराए, और रात के शांत सन्नाटे में अपनी प्यारी दादी माँ की गोदी में सिर रखकर परियों की अनूठी और जादुई कहानियाँ सुने। उसका चंचल मन बाग़ों में उड़ने वाली रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे दौड़ लगाने के लिए व्याकुल रहता है, ताकि वह वहाँ से अपनी माँ के लिए सुंदर-सुंदर ताज़े फूल चुनकर ला सके। परंतु बालक के मन का भोलापन तब उदासी में बदल जाता है जब उसकी इच्छा पूरी नहीं होती। जब किसी कारणवश आज उसका मनपसंद खिलौना घर नहीं आता, तो वह अपनी माँ से गहरे तक रूठ जाता है। वह गुस्से में दूध-रोटी खाने से साफ़ मना कर देता है और आत्मसम्मान के साथ कहता है कि अब मैं किसी का लाडला बाबू या प्यारा राजू नहीं हूँ। लेकिन बच्चे का यह गुस्सा बहुत क्षणिक होता है; उसे पूरा विश्वास है कि शाम को जब उसके पापा दफ़्तर से घर आएँगे, तो वे अपने लाडले बेटे को तुरंत अपनी स्नेह भरी गोदी में उठा लेंगे। वे अपने रूठे हुए राजू को गले से लगाकर मुस्कुराते हुए मना लेंगे और उसके लिए बाज़ार से ढेर सारे सुंदर-सुंदर उपहार (तोहफ़े) लाएँगे, जिन्हें देखकर वह अपने सारे दुखों को भूलकर दोबारा खिलखिला उठेगा।
खिलौना न मिलने का यह छोटा सा दुख उसके कोमल मन को गहरी उदासी और निराशा (हताश) से भर देता है। वह शांत होकर एक कोने में अपने नन्हें-नन्हें हाथों को गालों पर धरे गुमसुम बैठ जाता है। इस उदासी के बीच भी उसके भीतर एक बहुत ही सुंदर और अनूठा विचार जन्म लेता है। वह बच्चा सोचता है कि ये सारी पाबंदियाँ, डांट-फटकार और खिलौनों के लिए तरसना केवल इसलिए है क्योंकि वह अभी छोटा है। वह विधाता से बड़ी मासूमियत से कामना करता है कि काश वह किसी जादू से तुरंत (झट) बड़ा हो जाए, ताकि उसे अपनी नन्ही इच्छाओं के लिए दूसरों के आगे हाथ न फैलाना पड़े और वह आज़ादी से अपनी दुनिया जी सके। इस खूबसूरत रचना का मुख्य संदेश यही है कि बचपन का संसार भौतिक स्वार्थों से दूर केवल निश्छल प्रेम, सादगी और कल्पनाओं की पावन उड़ान पर टिका होता है। बच्चों की इन मासूम इच्छाओं को गहराई से समझना, उनके बाल-सुलभ अधिकारों का सम्मान करना और उनकी दुनिया की पवित्रता को कूटनीति के पाखंड से सुरक्षित रखना ही समूचे समाज का सबसे बड़ा मानवीय धर्म है