कवि का जीवन और उसकी रचनाये




कवि का जीवन और उसकी रचनाये
वैसे तो सबकी अपनी-अपनी जीवन शैली होती है जैसे आम तौर पर सबकी है | पर कवि का जीवन कुछ बेहतर होता है ,यह भी कहना ठीक न होगा | फिर भी कवि का जीवन कुछ तो होता है | यह कहना बहुत आसान है पर समझाना थोड़ा कठिन ,क्योंकि कवि का जीवन या कविताओं का जीवन आम लोगों से भिन्न होती है | जहाँ तक मैं समझता हूँ कवि सच में भावों का द्रष्टा होता है |
वह सच में किसी अनजानी दुनिया में होता है उसकी दुनिया में सर्व भूत प्राणी आनन्द मग्न होते है | कवि के आदर्शों की अगर बात करें तो वह ख़ूबसूरत होता है मै इसलिये ऐसा नहीं कहता कि सच में आदर्श ख़ूबसूरत होती है | बल्कि इसलिये की कवि की आँख स्वयं अपने आप में एक विराट हृदय होता है | उसी हृदय रूपी आँख से कवि की दुनिया अलग़ होती है
संसार में जितने भी श्रेष्ठ कवि हुये उनकी रचनाओं में देखा जाय तो सिर्फ़ व सिर्फ़ प्रेम का ज़िक्र है | चाहे वह श्रृंगार के रूप में चाहे वह वात्सल्य के रूप में चाहें वह उसका स्वयं के भाव हो या अन्य प्राणी के भाव हो | कवि कैसे स्वयं अपने को विभिन्न स्थानों पर रखकर उन भावों को उद्घाटित करता है कहीं कवि स्वयं पानी बन जाता है तो वही पानी के कल कल के साथ शीतलता का बोध करता है कहीं स्वयं कवि कविता बन जाता है और कविता बन कर कहता है की तुम मुझे जैसा दिखाओ गे वैसा मै दिख जाऊँगा ,कठोर बनाओ की मार्मिक ,स्नेह से लबालब कर दो फिर भी मुझे कोई तकलीफ़ नहीं होगी क्योंकि मेरा यही एक सनातन कर्तव्य है भावों को व्यक्त करना |
जहाँ तक मैं रही हूँ यहाँ दूसरा कोई नहीं होता वहाँ पर कवि का ही अन्य रूप होता है वह कहीं देश पर रोता है कहीं वीरता का आलाप भरता और कहीं नारियों पर विलाप करता और कहीं नारियों का हृदय बनने झूठा ही सही लेकिन प्रयास करता है शायद सफल भी होता है सच ये भी है की कवि कोई प्रयास ही नहीं करता | प्रयास करना तो उसे कहते है जिसे कोई कार्य न आवे वही करे और सफल होवे उसी प्रकार का कहना ठीक होगा अब साँस लेना कोई प्रयास थोड़े ही होगा कवि थोड़ा भी न तो जानत करता न ही उद्वेग को प्राप्त होता है क्योंकि जहाँ जगत ने है वहाँ दिमाग बुद्धि द्वारा किया गया कार्य होगा और कवि ठीक इसके विपरीत होता है वह हृदय के उतरते तरंगों को देखता है |
उसी राग्यात्मकता के उसके बाद शब्दों का रूप दे देता है हाँलाकि जीवन में कुछ घटनाये ऐसे घटी है खुद यकीं नहीं होता | वैसे कई घटनाये मेरे भी साथ हुयी जिसका मात्र उनको देखा और खुद को तसल्ली दिया | पर फिर भी एक कसक होती है वह कसक हमें दूसरों तक घटनाये साझा करने पर मजबूर कर देती है जैसे एक रोज़ मै महाविद्यालय में था | कोई मेरे साथ न था मै अकेला बैठा था | शायद मै प्रतीक्षा में था या नहीं ऐसा कुछ भान नहीं होता ,फिर भी कॉपी के पन्नों पर कुछ पढ़ रहा था कोई एक शब्द ऐसा था | जो मुझे बाँध वह देखते देखते एक वाक्य का रूप ले लिया | तो मैंने सोचा इसे नोट कर लें नहीं तो ये तरंगें खो जाएँगी यह एक कवि की महत्वपूर्ण और गम्भीर समस्या है | फिर मैंने भी वैसा ही किया जैसे बेहोशी में भाव में था पता नहीं लेकिन गुनगुनाने में अच्छा लगा दो बार माँ उसे देखा मैंने मध्य देखते ही देखते दस लाइन बनी होगी !
अन्तःतः मैंने पाया मेरी कलम अन्त के लाइन को पूरा करके रुक गया | फिर मैंने बाद में उसे और कुछ बड़ा करने की कोशिश की पर हुआ नहीं फिर ऐसा ही वही हुआ की वह अपने आप में अधूरा नहीं पूरा है| कई दिन कई महीने बीते उसका शीर्षक आँख मिला तो मीरा है शीर्षक के तलाश में था पर अभी भी मिला नहीं था कुछ लोग ये मेरा नाम उसे पढ़ भी चुके थे थोड़ी तारीफ़ भी किये कहें ,अच्छी है, तू ये सब लिख कैसे लेता है | मैंने कहा छोड़ ये ,इसका भावार्थ बताओ | जिससे भी मैंने पूछा सब यही कहे मुझे नहीं पता तू ही बता | तो उसे लिखा है मैंने कहाँ मुझे नहीं पता इसका भाव क्या पर इतना पता है ,ये बातें इस दुनिया की नहीं अध्यात्म की दुनिया की है।
वैसे तो मैंने एक बात और नोटिस किया की कुछ सारे रचनाये ऐसी है जिनको लिखने के बाद कोई उलट फेर (क्रमबद्धता में परिवर्तन ) नहीं करना पड़ता अर्थात वह सहजता से पूरा हो गया | जैसे अन्य कवि रहे है वैसे तो अपनी धारणा नहीं रही है फिर भी एक बात थी मै शब्दों के पीछे भागा साथ शब्दों रो डोलने का शौक़ भी हो गया जैसे अन्य कवि करते है फिर भी मैंने देखा खुद में एक कवि वाली प्यास नज़र नहीं आयी मुझमे | शायद जो इसलिये की मैं किस किस्म का व्यक्ति हूँ मुझे नहीं पता | पर इतना है की मै आज में विश्वास करता हूँ जो कल पर यकीन नहीं करता | इसलिये बहुत बार ऐसा हुआ की लहरों की भांति भागते हुए | वह शब्द का रूप भी ले लिया और एक आकार के भांति कतार में लग गया | मेरे जानने के बावजूद वे तरंगों की भांति जो भाव रूपी लहरें है जो कहीं लिख न लिया गया तो बाद में वे बिसर ही जाएँगी |
इतना जानकर भी उन लहरों रूपी भावों को कोई शब्द रूप न दिया अर्थात व्यवहार में लिखने का काम न किया | इसको हम क्या कहें इसके लिये हमारे पास कोई उत्तर नहीं | ऐसा नहीं की मैं लिख नहीं सकता या असहाय था फिर भी मैं उन लहरों को देखकर छोड़ दिया | वैसे तो जीवन में तरंगों की लहरें सबके हृदय में उठती है पर हर कोई शब्द रूप नहीं दे पाता और कभी कभी मैंने देखा है की भाव इतने सघन होते है के वे सिर्फ़ व सिर्फ़ देखते ही बनता है एक कवि भी थम सा जाता है इसको हम क्या कहें इसके लिये हमारे पास कोई उत्तर नहीं | ऐसा नहीं की मैं लिख नहीं सकता या असहाय था फिर भी मैं उन लहरों को देखकर छोड़ दिया | वैसे तो जीवन में तरंगों की लहरें सबके हृदय में उठती है पर हर कोई शब्द रूप नहीं दे पाता और कभी कभी मैंने देखा है की भाव इतने सघन होते है के वे सिर्फ़ व सिर्फ़ देखते ही बनता है एक कवि भी थम सा जाता है की अब क्या करे क्या न करे फिर भी कहीं शब्दों का रूप दे ही जाता है | वैसे तो इस भीड़ भरी दुनिया की गाथा ही अलग है हर एक वस्तु या शब्द की एक निश्चित परिभाषा है जैसे कवि या लेखक है तो वह फला फला काम करने के बाद ही कवि | और फला फला लेखन के बाद ही लेखक ऐसी- ऐसी कविता हो वैसी हो यहाँ तक की लोग मरने के बाद भी जाँच पड़ताल उस व्यक्ति की करवाती है |
यह संत था या नहीं कहीं कहाँ चमत्कार किया क्या खाया पीता था कैसे सोता था | कवि था तो वह देश के बारे में नहीं लिखा | बच्चों के बारे में नहीं लिखा ,इसके बाद भी जब लोगों को सुकुन मिल जाय मेरा मानना दूसरी बिल्कुल भिन्न है | कवि तो संत है क्योंकि मनुष्य जाती के साथ पूरी पृथ्वी पर जितने जीव जंतु है सब ऐहसास से पूर्ण है | सारा मानव समाज भावों और कल्पना वाला प्राणी है | सबके अपने भाव है और एक कवि भी उसके हृदय में जो भाव होता है उसे ही प्रगट करता है | पोथा रट्टा चार चोखा अक्षर रो पूर्ण करके और यही काम एक आम व्यक्ति नहीं हो पाता ऐसा नहीं की उसके पास भाव नहीं होता या वह भाव विहीन होता है |
थोड़े कवि अपना कर्तव्य समझ कर रचनाये करते है थोड़े कुछ स्वयं के आनन्द के लिये रचनाये करते है कुछ थोड़े आने वालों के लिये एक धरोहर दे जाते है जो भी हो सकता है की वो श्रेष्ठ हो या त्याग हो त्याग भी तो बहता है इसमें कोई फ़र्क पड़ता है की मनुष्य एक है या दस यह कह जायेगा हमेशा कवि | आँख समाज में अज़ीब रफ़्तार है जिसकी जितनी अधिक चर्चा है वह उतना बड़ा कवि जिसका चर्चा नहीं वह एक 'ज़िस्की चर्चा' नहीं चाहे वह अक्षरों में नाम न हो या अंतिम | वैसे राय ये भी है की हिंदी का बहुत अधिक विकास नहीं हुआ है क्योंकि भीम ए० ओ० अंतिम वर्ष में हिंदी छोड़ दिया साथ ही मेरी प्रारम्भिक शिक्षा गणित व विज्ञान की थी इसलिये हिंदी को ज़्यादा महत्व दें पाया न ही हिंदी में बेहतर सीख पाया |
हाँ जब मैंने लिखने की शुरुआत की मुझे भरोसा ही नहीं था की मै कविता भी लिख सकता हूँ शायद मै वक्त 12वीं में था जब किसी तरह से मेरी पहली रचना "आओ हम शपथ ले " पूरा किया तब शायद मैं 17-18 साल का रहा होगा उसके बाद मैं "नेता जी" के बारे में लिखा उस वक्त चुनाव थी उसके बाद मैंने एक रचना "हमारा है किसान "| मैंने एक बात उस वक्त नोट किया जब किसी लिखे हुए मैं अपनी रचनाओं को कुछ व्यक्तियों को सुनाने लगा क्योंकि मुझे यह ज्ञात हो गया था की अच्छे बुरे का विचार दूसरों से ही मिलता है |
वैसे तो मैं कई कवियों के बारे में जनता हूँ की वो लिखने के बाद बेहतर से बेहतर विद्वानों को दिखाने थे जिससे मुझे भी बोध हुआ की कम से कम एक व्यक्ति को चुनौती दी जायेगा मेरे जीवन की सबसे बड़ी समस्या रही फिर भी भगवान के दया से वो भी हुआ | वैसे तो साधु संतो का आदर करना शायद मेरे खून में था या फिर भी मैं अपने गाँव में ही आश्रम के भगवान प्रेमी (गोपाल दास ) पाया को कई दिनों तक नहीं दिखाया उनसे हमारी दोस्ती थी और ये भी बात नहीं की मैं वहाँ नहीं जा रहा था | यू कह लीजिये प्रेम ही ऐसा है उनसे | किसी दिन संजोग बना उनसे मै कुछ कहाँ और रचनाओं का ज़िक्र किया फिर अगले दिन रो मै उनको हर रोज़ दोपहर के समय एक दो या तीन रचनाये दिखाता | वो हमारे रचनाओं को पढ़ते और जो कुछ दोष होता उसको मुझसे ठीक करवाते |
एक बात मैं अपने हृदय में देखा मुझे रचनाओं की अभिलाषा न थी इसके बाद भी न जाने कैसे ये सब लिख दिया | अभिलाषा न होने के कारण या कवि बनने दुनिया के लिए कल्पना करना ऐसी कोई आकांक्षा न होने कारण न तो मैं किसी विद्वानों से मिला न ही किसी हिंदी बोर्ड कार्यालय का चक्कर लगाया | ये सब है की विद्वानों के अभाव में मेरे रचनाओं में दोष देखने को मिल सकता है | नहीं भी मिल सकता है मुझे नहीं पता | लेकिन हृदय में एक तसल्ली मिलती है कि अब लगभग सवा सौ जो लिखता हूँ | लेखन में निखार भी आया जिसका श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं जाता है |
जिनके द्वारा मेरे रचनाओं के छोटे बड़े समस्याओं का निदान हो जाता है | हमारा एक जो बहुत बड़ी समस्या था रचनाओं के बाबत उसके हल के रूप हमारे चाचा महोदय गोपालदास जी रूप में मिल गया था | उन्होनें मैं चाहता हूँ कहा हूँ एक बात बार-बार मुझसे बोलते थे तुम्हारी भाव बड़े अच्छे है | ये सच है कि चाचा के मार्गदर्शन में मुझे लगभग रचनाओं का सही बोध हुआ इसके काम किस प्रकार के रचनाओं में किस प्रकार के शब्द रखने चाहिये | मै ये स्पष्ट यह कह सकता हूँ कि अगर मैं तलवार हूँ तो उस पर धार बही ने ही दिया |
एक कवि के बारे में ये कुछ भी कहना आसान न होगा | मैं कवि तो नहीं हूँ फिर भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ | इसका गूढ़ अनुभव भी है कवि को जानना है तो उसके रचनाओं के बारे में जानना होगा | उसके जीवन में जो भी उतार चढ़ाव होंगे उसके रचनाओं में साफ़ साफ़ झलकेंगे इसमें कोई संदेह नहीं क्योंकि हर रचना उसका ही अभिव्य रूप ही होता है | एक कवि चाहकर भी स्वयं को खुद के रचनाओं से अलग नहीं कर सकता है | जाने अंजाने में वह कवि ही रचनाओं में होता है मेरा खुद का अनुभव है कि किसी भी रचनाकार के व्यवहार के जीवन को देखकर खुद भी अंदाज़ा लगाया जा सकता होगा क्योंकि एक कवि जो होता है वह दिखता नहीं उसकी पहचान उसकी रचनाओं से हो सकता है |
इसका मतलब यह की उसके रचनाओं के माध्यम से कुछ हद तक अनुमान लगाया जा सकता है | पर एक कवि के बारे में स्वयं उससे बेहतर शायद कोई नहीं जान सकता है। उसकी दुनिया भी ऐसी होती है तू समझ लीजिये एक कागज़ कलम के साथ में एक बन्द कमरा जहाँ पर कवि होगा और सिर्फ़ उसकी दुनिया | मैंने ये स्वयं जाना है कि कविता के लिये दृश्य बोध जरुरी है लेकिन स्वयं इस अपवाद तो नहीं पर कल्पना मात्र से भी सारे रचनाओं को किया है | और सही भी है ये सभी कवि या लेखक यही करते भी है |
लेकिन कुछ रचनाये बगैर दृश्य के समझ नहीं जिसमे प्रकति मुख्य है | वही कुछ रचनाये बगैर अनुभव के सम्भव नहीं हो पायेगा | मेरी सारी की सारी रचनाये बंद कमरे में कल्पना मात्र के सहारे हुयी है | चाहे वह श्रृंगार प्रधान हो या प्रकृति चित्रण वाले गृह बोध राहों हो । रचनाये करने के बाद मैंने पाया की जो मै लिखा हूँ उससे मैं मज़बूर हूँ जहाँ पर एक गवाह की भांति जैसी सारी घटनाये मेरे सामने हुयी हो जैसे "बारिश का एक दिन " कविता में मुझे लगता है की मैं बारिश में उसे भीग कर लिखा हूँ | "बसन्त बयार " में मै बसन्त का एक हिस्सा बन जाता हूँ और चिड़ियों की भांति चहक कर कहता हूँ | मुझे याद है जब मै किसी शीर्षक पर रचना कर रहा था | वह दोपहर का वक्त था मै घर आया जिस घर में मैं रहता हूँ वह कच्ची ही या ऐसे रामजीये मेरा सारा मकान कच्ची मिट्टी का है | मै घर के भीतर गया जहाँ दिन प्रकाश भी नहीं पहुँच पाता है |
वहाँ मै प्रकाश किया कुछ और ही रचनात्मक चल रही थी मैंने सोचा की उसी रचना को पूरा कर दूँ उसी के प्रयास में था भी लेकिन मैं कुछ कह नहीं पा रहा हूँ ऐसा मुझे लगा । फिर अचानक मैंने देखा भीतर हृदय में एक लहरें उठने लगी वह लहरें दिल की थी | मेरे और दिल की बात चीत थी और उस दिन "हाल दिल खुद से कहूँ " रचना पूरी हुई लेकिन इसके पहले जो शुरू हुआ था रचना वह उस दिन पूरा न हुआ | उस दिन मैंने एक नया चीज़ नोट किया जहाँ मैं गहरे नशे में हूँ मेरी आँखें लाल मेरी समझ बुझ खो गयी मुझे कुछ भी नहीं पता मेरी हालत बेहोशी के भांति गयी थी मैं स्वयं में ओझर शायद वो ही ऐसा अनुभव हुवा | एक पहचान वाला व्यक्ति अचानक ख़ामोश जाता है तो लोग उसे बीमार समझते है या उसे निष्क्रिय समझते है |
कुछ देर पहले सम्भव न था ऐसा क्यों होता है ,कुछ कहा नहीं जा सकता | भले ही एक रचना एक बार में पूरी न हो फिर भी जीवटनी भाव उठती होगी तब तक चैन से रहने नहीं देती है ,जब तक उसे संग्रहित न किया जाय चाहे वह बार लाइन या सिर्फ़ दो लाइन ही क्यों न हो या फिर उसे खो दिया जाय |
मेरा खुद का अनुभव है की जितना सहज है किसी भाव को संग्रहित कर लेना या कागज़ के पन्नों पर उतार लेना इससे कही कठिन कार्य है उसे भूलने का प्रयास करना शायद यह सच हो पाता है क्योंकि न चाहते हुये पूरा 'चित्त उन्हीं शब्दों या भावों पर होता है इन भावों से पार थोड़ा मुश्किल है पर असम्भव नहीं फिर यदि हम चाहे तो यह बाल रूपी स्त्री कुछ दूर तक हमारे अंतर मन में रहने के साथ साथ न चाहते हुये पीछा भी करती है | ऐसी बहुत सारी घटनाये मेरे भी साथ हुयी यद्यपि मै गर्मी के दिनों में आसमान के नीचे सोता हूँ जिसने नीड़ ने तारे के साथ चन्द्रमा का दर्शन हो ही जाता है |
चन्द्रमा न भी रहे तो तारे के साथ उस विराट आसमाँ को देखते ही बनता है उन क्षणों में बहुत बार रचनाओं की तरंगे मेरे भीतर उठने के साथ- साथ थोड़ा बहुत बेचैन तो कर ही देती है बेचैन इसलिए उप भावों को संयोजा जाय | मज़ा तो इस बात में है की शुरू में जो भाव होते है वे हृदय में कविता रूप लेकर दो चार लाइन ही होते है पर जब उन्हीं भावों को पन्नों पर उतरा जाता है तो वह 40 से 50 या उससे अधिक भी होता है | मैंने स्वयं यह भी देखा है परन्तु किसी कारण वह छूटा तो भरोसा नहीं अब पूरा भाले कदम क्षण भी हो सकता है कई सालों इसलिए जब भी मैं रचनाये तो बहुत किया जिसमें से रो रचना है "चाँदनी रात "यह रचना रात में ही हुआ वो भी मोबाईल के प्रकाश में क्योंकि घर पर मेरी मम्मी या अन्य लोगों को पता न चले क्योंकि हमारी माता जी मुझे लेकर ज़्यादा फिक्रमंद रहती है ।
"चाँदनी रात " रचना में जो भी भाव है वो सिर्फ़ व सिर्फ़ अनुभव का विषय है एक अज़ीब अनुभव यहाँ रचना रो बहुत ही छोटी है | लगभग 15-16 लाइन का पर मुझे ऐसा लगा की जो भी हूँ वह अपने आप में पूरा है | मुझे ऐसा भी लगता है की जो थोड़ा बहुत भी प्रेम करते है किसी से भी उनको चाँद तारे बड़े प्रिय लगते है अगर मैं सच कहूँ तो ऐसा होना भी चाहिये ,यद्यपि संसार में अगर कुछ करने को है तो वह प्रेम ही है अगर कुछ किया जा सकता है तो वह है प्रेम और किसी को कुछ दिया जा सकता है तो वह है प्रेम |
इसके बाद सारे कृत कार्य व्यर्थ ही है नाशवान है यही अंतिम सत्य भी है और पहला सत्य भी । इस कविता में यह संकेत है की चाँदनी रात क्या होती है न वह फूलों , न ही कोई रंग न ही कोई वस्तु या पदार्थ फिर भी उस रात या चाँदनी रात की बातें हर जगह होती है | 'ना कोई फूलों सा गंध उसमें ,ना कोई रंग उसमें ना कलियों सी कोई छोटी राज, फिर भी त्रिभुवन में उसी की होती बात , बड़ी भोली बातें है |
इसमें एक लाइन है रसिकों को कुछ ना भाये उसके बिना कुछ रास ना आये | इस संसार में बहुत ऐसे भी है जिनको रात से डर भी लगता है , तो बेचारी चाँदनी रात को क्या देख पायेंगे जो किसी भी तरह से देख पायेगे और जो किसी भी तरह से देखा ,थोड़ा बहुत अपना नाता जोड़ा उनको वह अनुभूति ज़रूर प्राप्त होगी क्योंकि मनुष्य जाति का स्वभाव ही प्रेम है उसका अस्तित्व ही प्रेम है जैसे अबोध बालक सैकड़ो माँ के भीड़ में चुप रहने के बावजूद अपने माँ को पहचान लेता है । सैकड़ो गोपी के बीच में अपने माँ के होने का आहट बिना देखे बबड़ूआ पहचान लेता है |
वैसे ही व्यक्ति के हृदय में पड़े हुए उसका खुद का व्यक्तित्व सामने आने लगता है जब थोडा सा भाव प्रेम का मिलने लगता या थोडा प्रिय मिलने पर | ऐसा मैं इसलिये नहीं कह रहा हूँ कि मुझे एक कवि होने का घमंड है या मैं यह कह रहा हूँ बल्कि मुझे मुख की प्रेम की चाह है ऐसा मैं इसलिये बोल रहा हूँ कि ऐसा मनुष्य का स्वभाव है ऐसा होना ही चाहिए सच यह भी है कि ऐसा होता भी है |
वह भी सबके साथ चाहे वह निरक्षर हो या वह विधर्मी ही क्यों न हो वह भी सुनता है पर वह इसे भ्रम समझ कर भुला देता है। इन्हें प्रेमी की छवि दूर करने का प्रयास करता है अपने रचनाओं के द्वारा हालाँकि यह भाव उस कवि के होते हैं फिर भी वह औरों को जमा सकता है जीता सकता है | मैंने देखा एक हमारे भाई साहब थे , केवल वही नहीं बहुत सारे लोग ही सकते हैं जो कुछ बातें पर विश्वास नहीं करते है,और उनको खुद पर यक़ीन होता है की वो ऐसा नहीं ऐसा उनका मानना होता है की प्रेम के लिये वस्तु की आवश्यकता होती है जब वही एक दिन एक लाइन मेरे द्वारा सुने ,
"चंदा आया चंदा आया
अपने साथ उजियारा लाया
शीतल मंद श्यामल जैसी
एक पाश पूरा तीन तैसी
रब बच्चों का प्यारा मामा
ढेर सारा खिलौना लाया"
तो बोल उठे बहुत अच्छा है मैंने कहाँ भाई साहब ये बातें तो महज़ झूठी बातें है | चंदा न तो आता है न ही कही जाता है और रात तो ठीक पर गंदा खिलौना कहाँ से लाएगा उससे तो ये भी नहीं पता की खिलौने का बाज़ार कहाँ है । फिर वो तय बड़े मैंने उनसे कहाँ भाई साहब ये आम को क्यू अच्छे लगे उन्होंने कहाँ क्यों अच्छे लगे पता नहीं छू |
मैंने पीछे कवि प्रदीप की की चर्चा की है उन्ही के बारे में यहाँ पढ़ है उन्होंने कहाँ था की जो कवि बच्चों के लिये कुछ नहीं लिखता वह कवि अभागा होता है मैंने उनके विचारो को थोडा समझने का प्रयास किया तो मुझे लगा की उनकी बात सही है । बच्चो के लिये लिखना कोई आसान काम नहीं है मैंने तो शुरू में अर्थात लेखनी के शुरुआत के समय में ही बच्चों पर लिखा था पर इनकी बातें समझने के बाद कुछ और भी लिखे |
वैसे तो बच्चों के लिये ज़्यादा रचनाये नहीं कर पाया हूँ जितने अब तक होने भी तो गिनती के लगभग आठ या दस होगा | फिर भी मेरा मानना है की बच्चों के लिये लिखना बहुत बड़ी बात है ।मित्रों मैं एक बात आप से स्पष्ट कर दूँ की मुझे यह मुक़ाम उपन्यास लिखने,उतने समय में सर्व कविता की रचना कर सकता हूँ साथ ही साथ मुझे कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा भाव देना अच्छा लगता है पर जो आप पढ़ रहे है शीर्षक "कवि की जीवन और उसकी रचनाये "मैंने क्यू लिखा इसका भी मुझे नहीं पता नहीं और मुझे ऐसा लगता है की मैंने इसके लिये थोडा सा प्रयास भी नहीं किया बस एक दिन मैं बैठा था अचानक अपनी कॉपी उठाई फिर मैंने सोचा कवियों की जीवन कैसा अजीब होती है | आखिर उनकी पहली बार क्या है ,एक श्रेष्ठ कवि को क्या चाहिए |
यह कह पाना मेरे लिये भी बहुत कठिन ही नहीं असम्भव है बस यह कह सकता हूँ की उनकी मौज उनकी रचना है। यद्यपि आज कल एक नया ढंग बन गया है, लोग लिखते है लिखने के बाद उद्धेश्य के पैसों की उम्मीद में की इसमें खुद को पैसा व् प्रसिद्धि मिल जाय । जबकि एक श्रेष्ठ कवि को यह सब नहीं चाहिए होता है | जैसे महाकवि तुलसीदास जी को यह दुनिया क्या दे सकती है उन्होंने रामचरित मानस विनय पत्रिका आदि रचनाये समाज को दिया | कहने को हम कह सकते है की गोस्वामी महाराज पूजनीय व् बंदनीय है उनके लिये लिखने के बाद यहाँ पर आदर श्रद्धा है | पर सच यह है की जो उन्होंने दिया उसके बदले में वे सब कुछ मेरे हिसाब से उन सब कुछ भी नहीं दी ही नहीं जा सकता |
मुझे तो बड़ा आश्चर्य लगता है की ये बातें जो मानस में है अद्वितीय है इसे कैसे महाराज जी ने दिया । हालांकि यह भी सत्य है की यह रास-भगवत कृपा से हुआ है जितना यह रास है उतना यह भी रास है की यह सारी बातें उनके ही अंतःकरण से प्रस्फुटित हुयी थिन भाव दशा में ही इसका दर्शन किये होंगे | यह सच में किसी आश्चर्य से कम नहीं मित्रो कभी कभी मुझे लगता है की अगर संसार में कवि न हो तो क्या होगा |
यह सच है की दुनिया विरान हो जायेगी | इस दुनिया से श्रृंगार ख़त्म हो जायेगा हालांकि कवि का स्वभाव है मानव समाज के विभिन्न पहलुओं को उकेरना या सजाना सँवारना या यह उद्घोष करना की किसी व्यक्ति वस्तु की किस दिशा में क्या भाव होता है यह ऐहसास कवियों के माध्यम से ही मिलता है की पानी क्या कहता है ,देश क्या कहता है देश की आकांक्षा क्या है इसकी गरिमा क्या होनी चाहिए |
ये सब चीजें कवि ही अपने भावों द्वारा प्रस्तुत करता है लेकिन सच ये भी है की ये विचार या भाव अपने धरातल पर ठीक बैठता है । कवि पानी पानी के बारे कहता है तो वह कवि व्यक्ति न होकर पानी बन जाता है देश का हृदय भी कही हो जाता है | ये सब महज़ एक बात ही नहीं बल्कि सत्य की कसौटी पर भी सत्य होता है कोई कितना ही इसे झुठला दे | एक रचनाकार होने के नाते मैं यह कह सकता हूँ कि "एक कवि का जीवन शायद उसकी खुद की जीवन न होकर सम्पूर्ण संसार का जीवन होता है" उसका जीवन बहुत सुंदर होता है वह संसार के दुख को देखता है साथ ही साथ उसी संसार से रस की अनुभूति करता है, कही कलेश, कही प्रेम, कही कवि की खुद की बात ,कही पर देश की आवाज़ ,कही पर देश की शान आदि रूपों में कवि ही प्रतीत होता है, जो अपने आप में विराट होने का संकेत है |
सम्भवत: यह कहना ठीक ही होगा कि कवि का जीवन आमतौर के व्यक्ति से भिन्न होता है श्रेष्ठ होता है ,क्यूंकि मेरा यह मानना है की संसार में सारे काम ऐसा नहीं की सिखाये जाने पर न किया जा सके पर यही एक ऐसा काम है जो सिखाने पर भी कोई सीख ले यह सम्भव नहीं अगर जबरदस्ती किया भी गया तो वह बेजान सी जान पड़ती है उसमें रंगत न होगी ,उसमे रस न होगे अर्थात कोरा कागज दिनकर नहीं हो सकता मैथली शरण गुप्त न होगा ,राम चन्द्र शुक्ल न होगा, भारतेन्दु न होगा, आदि | होने को तो सब में संसार में सब अद्वितीय है किसी के तरह कोई न होगा पर कवि के विधा में इनके जैसा कोई न होगा |
उनकी रचनाओं में जो धार है, प्यार है, श्रृंगार है, फटकार है ये चीजें जबरदस्ती किसी कवि के द्वारा नहीं हो सकता शायद वह इसलिए की प्रकृति उनको एक रचनाकार के रूप न चुना हो | अब मैं आयेदिन देखता हूँ पेपर में पढ़ने के बाद मुझे पता चलता है की यह उक्त पोस्ट गद्यांश नही पद्यांश है,किसी कवि ने लिखा है | मुझे तो जरा सा समझ नहीं होता की अब के समय में ये हो क्या रहा है जो कविता पाठक ऐसा तनिक भाव नहीं आ रहा अतः मैं गद्यांश पढ़ रहा था जब तक की वह कोरी पूरी न हो जाये ये गद्यांश नहीं पद्यांश है । एक कवि के बारे में मैं जहाँ जहाँ तक समझता हूँ जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ की राय में एक कवि आदरणीय है, वंदनीय है, पूजनीय है |
एक सच्चा कवि
1. रब के बनाई इस दुनिया में कोई एक बेख़ौफ़ सोता,
खुद से बातें करता अपने ही हर जगह ही होता।
ना खुद की परवाह करता, ना किसी से रुसवाई रखता,
आकाश को घड़े में सहज भर दे ऐसा एक सच्चा कवि ही होता।
2. जीवन को खूबसूरत रंगों से भर देता,
किसी और का कोई ऐहसान न लेता।
है क्या उसकी रज़ा है क्या उसकी मज़ा,
अपने भावो से मानवता का त्रास हर लेता।
3. जीवन के मर्मों का उसे भी भान होता है,
मनोरंजन ही नहीं उसके द्वारा मानवता का उत्थान होता है।
सदियाँ संजोये खुद को आईना दिखाये,
एक कवि दरियाँ में माँझी के लिये पतवार होता है।
4. कभी हँसता कभी रोता कभी बहारो पर जां निसार करता,
फूल ही नहीं वह काँटों से बेहद प्यार करता।
मुफ़्त में नहीं मिलती ऐसी जीवन उसका भी भान होता,
सोने वाले जाग जाये ऐसा वह प्रचंड हुंकार भरता।
5. कवि कवि ही होता अंततः विचारों में खोता,
ना उसके लिए सरहदें ना ही वह किसी का ग़ुलाम होता।
खुद के दुनिया का मालिक होता ना ही कभी बेहोश होता,
उसके फूल उसके चमन उसके ही नज़रों से बहार होता।
आओ हम शपथ लें कि हम दुनिया बदलकर दिखलाएंगे
1. बहते हुए उस हवा के रुख को मोड़ लाएंगे,
बहती हुई उस नदी की धारा को मोड़ दिखाएंगे।
चलते हुए उस राही के मन को मोह लाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
2. तुम साथ दो मेरा तो चाँद-तारों को भी लाएंगे,
उस पहाड़ की तरह दृढ़ आदर्श बनकर दिखाएंगे।
अपनी प्रेम की शक्ति से हम दुनिया को सजाकर दिखाएंगे,
आओ हम शपथ लें।
3. सीखा है यह आदर्श जिससे उसे कभी भूल न पाएंगे,
उस फूल की तरह हम भी सारे जहाँ में महककर दिखाएंगे।
हम भी राम, कृष्ण, महावीर बनकर दिखाएँगे,
आओ हम शपथ लें।
🎨 कहानी में आए शब्दों के अर्थ (Word Meanings):
  • द्रष्टा = साक्षात् देखने वाला / गवाह 
  • मार्मिक = दिल को छू लेने वाला / भावुक 
  • आलाप = पुकार / राग अलापना 
  • उद्वेग = व्याकुलता / घबराहट / मानसिक हलचल 
  • राग्यात्मकता = संगीतमय प्रेम / रवानगी 
  • भान = अहसास होना / ज्ञान होना / सुधि 
  • अक्स = परछाई / आईने में दिखने वाला रूप 
  • बिसर = भूल जाना / विस्मृत होना 
  • सघन = बहुत गहरे / घने 
  • विधा = विधा / लेखन की कला (जैसे गद्य या पद्य) 
  • बहार = वसंत ऋतु / खुशियाँ 
  • तकब्बुर = घमंड / अहंकार / अकड़ 
  • तिलिस्म = जादू / छलावा / मायाजाल 
  • खाक-ए-निसार = मिट्टी में विलीन हो जाना 
  • मलाल = अफ़सोस / पछतावा / दुख 
  • रज़ा-ए-इलाही = विधाता की पावन इच्छा 
  • बातिन = अंतर्मन / छुपा हुआ अंतःकरण 
  • अना = 'मैं' का कड़वा भाव / अहंकार 
  • मियाद-ए-ज़िंदगी = साँसों की निश्चित गिनती / उम्र 
  • विर्द-ए-ज़ुबाँ = जीभ पर रटना / निरंतर सुमिरन 
  • मुश्त-ए-खाक = मुट्ठी भर धूल / सादी मिट्टी 
  • हुस्न-ए-अमल = अच्छे कर्मों की ख़ूबसूरत विरासत 

📜 इस महा-निबंध का सर्वोच्च दार्शनिक निष्कर्ष व मूल संदेश:
कलम और अंतःकरण का यह गहरा विमर्श इसी अंतिम सच को उघाड़ता है कि इस कलयुगी समाज में आलीशान महलों और पैसों की अंधी दौड़ के पीछे भागने वाले अज्ञानी कभी भी एक रचनाकार के भीतर सुलगने वाली इस अमिट और पवित्र प्यास के वास्तविक गौरव को छू तक नहीं सकते। समय के इस निश्चित मुसाफ़िरखाने से विदा होने के बाद किसी भी इंसान की भौतिक धन-दौलत उसके साथ परलोक नहीं जाएगी; केवल कागज़ पर बिखरी हुई इन रूहानी पंक्तियों की दिव्य खुशबू, समाज को जाग्रत करने वाली प्रचंड हुंकार और मानवता के कल्याण के लिए उठाई गई यह पावन आवाज़ ही आने वाले युगों में उसकी अमर पहचान बनकर सदा गूँजती रहेगी। अपनी कल्पना की शक्ति से इस मतलबी दुनिया का हर एक भ्रम तोड़ना, खुद को विधाता की रज़ा में विलीन करना और अपनी लेखनी को समाज के सुधार में पूरी ईमानदारी से समर्पित कर देना ही एक सच्चे सृजनकर्ता की वास्तविक नियति और उसकी कला का असली पुरस्कार है।
 

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